close

खास खबरें सिर्फ आपके लिए...हम खासतौर से आपके लिए कुछ चुनिंदा खबरें लाए हैं. इन्हें सीधे अपने मेलबाक्स में प्राप्त करें.

World Cup में हार के बाद टूट सकती है शास्त्री-कोहली की जोड़ी, सिलेक्टर्स को भी देने होंगे जवाब

कोच रवि शास्त्री और कप्तान विराट कोहली की जोड़ी भारतीय क्रिकेट में 4 साल से सारे फैसले ले रही है. 

World Cup में हार के बाद टूट सकती है शास्त्री-कोहली की जोड़ी, सिलेक्टर्स को भी देने होंगे जवाब
रवि शास्त्री 2015 के विश्व कप में भी भारतीय टीम के डायरेक्टर थे. तब टीम के कप्तान एमएस धोनी और उप कप्तान विराट कोहली थे. (फोटो: ANI)

नई दिल्ली: ‘कोहली एंड कंपनी’ की विश्व कप (World Cup 2019) के सेमीफाइनल में हार के साथ ही भारतीय क्रिकेट में कई सवाल उठ खड़े हुए है. ये सवाल दूर तक जा रहे हैं और इनके दायरे में कप्तान विराट कोहली (Virat Kohli) से लेकर कोच रवि शास्त्री (Ravi Shastri) तक आ रहे हैं. कोच और कप्तान की यह जोड़ी भारतीय क्रिकेट में पिछले चार साल से सारे फैसले ले रही है. इस जोड़ी की ताकत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि चयनकर्ता भले ही किसी खिलाड़ी को चुन रहे हों, जब तक उस नाम को विराट-शास्त्री की मुहर ना लग जाए, तब तक उसका चयन नहीं होता. नंबर-4 पर अंबाती रायडू पर मयंक अग्रवाल को वरीयता दिया जाना इसका एक सबूत भर है. ऐसे कई वाक्ये हैं, जब विराट-शास्त्री भारत के अन्य दिग्गजों पर भारी पड़ी है. 

जब तक टीम जीत रही है, तब तक विराट कोहली और रवि शास्त्री के नेतृत्व को इसकी तारीफ मिली. मिलनी भी चाहिए. लेकिन जब टीम हार गई है तो इसकी जिम्मेदारी भी उसी नेतृत्व को लेनी ही होगी. भारतीय टीम जब इस वर्ल्ड कप में उतरी तो उसके पास नंबर-4 के लिए परफेक्ट बल्लेबाज नहीं था और यह बात कप्तान और कोच को दो साल पहले से पता थी. उसने इस नंबर पर दो साल में कम से कम 10 बल्लेबाजों को आजमाया और इसके बाद विश्व कप में विजय शंकर जैसे नौसिखिए के उतरे. ऋषभ पंत और हार्दिक पांड्या भी इसी नंबर पर उतरे.

यह भी पढ़ें: World Cup 2019: भारत ने सेमीफाइनल हारते ही कर ली पाकिस्तान के रिकॉर्ड की बराबरी

जडेजा, कुलदीप और चहल...
इसी तरह भारतीय कप्तान और कोच की जोड़ी ने दो साल पहले ऑफ स्पिनर अश्विन और बाएं हाथ के स्पिनर रवींद्र जडेजा को इसलिए टीम से बाहर कराया क्योंकि वे रिस्ट स्पिनर टीम में चाहते थे. लेकिन विश्व कप के सेमीफाइनल और इससे एक मैच पहले भी रवींद्र जडेजा टीम में खेलते नजर आए. यकीनन, प्लेइंग इलेवन में चयन विरोधी टीम, मैदान, पिच और परिस्थिति के अनुसार होता है. लेकिन यह तो पूछा ही जाएगा कि जडेजा की कीमत पर कुलदीप यादव का चयन कितना सही था. 
 

ravindra
रवींद्र जडेजा ने न्यूजीलैंड के खिलाफ 77 रन बनाए. (फोटो: ANI) 

केएल राहुल पर भी कन्फ्यूजन
केएल राहुल पर जरूरत से ज्यादा भरोसा जताना और फिर उनके बैटिंग क्रम से छेड़छाड़ कर उनका आत्मबल कम करना किस बात का संकेत है. इसका जवाब कौन देगा कि जब वे तीसरे ओपनर के तौर पर चुने गए थे तो उन्हें नंबर-4 पर क्यों खिलाया गया. और भी सवाल हैं, जो आने वाले समय में कप्तान और कोच की जोड़ी से पूछे जाएंगे. चयनकर्ताओं से भी यह पूछा जाएगा कि अगर वे एक साल पहले से किसी खिलाड़ी को किसी क्रम के लिए तैयार करते हैं और उस पर भरोसा जताते हैं तो वह अचानक कैसे फेल हो जाता है. अंबाती रायडू इसका उदाहरण हैं. 
 

MS Dhoni
एमएस धोनी न्यूजीलैंड के खिलाफ रन आउट होने के बाद. (फोटो: IANS) 

एमएस धोनी का बैटिंग ऑर्डर
विश्व कप में सबसे अधिक चर्चा महेंद्र सिंह धोनी की रही है. यह वही खिलाड़ी है, जिसनें हमें वनडे और टी20 वर्ल्ड कप जिताया है. 2011 का वर्ल्ड कप फाइनल कौन भूल सकता है जब धोनी ने खुद को प्रमोट कर युवराज से पहले बैटिंग करने चले आए थे. लेकिन आखिर न्यूजीलैंड के खिलाफ वही खिलाड़ी सातवें नंबर पर बैटिंग करने आया. यह तो पूछा ही जाएगा कि जब भारतीय टीम लगातार विकेट गंवाकर दबाव में थी और भारत के सबसे भरोसेमंद खिलाड़ी का बैटिंग ऑर्डर क्यों नीचे किया गया. सौरव गांगुली, सचिन तेंदुलकर से लेकर वीवीएस लक्ष्मण तक ने माना कि धोनी को बाद में बैटिंग करना आत्मघाती निर्णय था. 

Ravi Shastri 30
भारत और न्यूजीलैंड के मुकाबले के दौरान रवि शास्त्री. (फोटो: Reuters) 

 

रवि शास्त्री का कार्यकाल बढ़ा
जब तक परिणाम आपके पक्ष में आ रहे होते हैं तब तक आप सवालों से बचते रहते हैं. लेकिन अब कोच रवि शास्त्री, कोचिंग स्टाफ और कप्तान इन सवालों से नहीं बच पाएंगे. विराट कोहली की कप्तानी पर भले ही बड़ा सवाल ना आए. लेकिन यह लगभग तय है कि रवि शास्त्री का कार्यकाल आगे ना बढ़ाया जाए. हालांकि, यहां यह बताना जरूरी है कि उनका कार्यकाल 45 दिन के लिए बढ़ाया जा चुका है. ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि उनका कार्यकाल ऐसे समय में खत्म हो रहा था, जब नया कोच चुनने के लिए कम वक्त था. लेकिन उन्हें पूर्णकालिक कार्यकाल मिलने की गुंजाइश नहीं है.