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'डिजिटल क्रांति के बाद कूल और गांधीगिरी जैसे शब्द भाषा के अंग बन गए'

डिजिटल क्रांति के कारण वर्तमान समय में हर सुविधा और सेवा केवल एक क्लिक या टच पर उपलब्ध है. इस डिजिटलीकरण से हिन्दी भी अछूती नहीं रही है. अब तो गूगल भी हिंदी में बोलता है.

'डिजिटल क्रांति के बाद कूल और गांधीगिरी जैसे शब्द भाषा के अंग बन गए'

नई दिल्ली : डिजिटल क्रांति के कारण वर्तमान समय में हर सुविधा और सेवा केवल एक क्लिक या टच पर उपलब्ध है. इस डिजिटलीकरण से हिन्दी भी अछूती नहीं रही है. अब तो गूगल भी हिंदी में बोलता है. डिजिटली हिन्दी में काम करना बहुत समय तक मुश्किल था लेकिन स्थिति ने नई करवट ली है. धीरे-धीरे हर चीज के डिजिटल होने कारण जहां एक ओर बहुत सकारात्मक असर देखने को मिला है वहीं बहुत सारी चुनौतियां भी खड़ी हो गई है.

डिजिटल क्रांति और हिंदी विषय पर चर्चा करने के लिए उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान लखनऊ, श्री गुरू तेग बहादुर खालसा कॉलेज और दिल्ली विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वाधान में दो दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया. संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र में बालेंदु दाधीच ने हिंदी एवं भारतीय भाषाओँ पर डिजिटल क्रांति के सकारात्मक प्रभावों की चर्चा करते हुए चुनौतियों पर भी चर्चा की. उन्होंने कहा कि अब भारतीय भाषाओं को केवल पश्चिमी देशों की प्रोद्योगिकी के उपभोक्ता बनकर ही नहीं रहना.

विशेष वक्तव्य में थावे विद्यापीठ बिहार के कुलाधिपति प्रो. केएन तिवारी ने कहा नई प्रोद्योगिकी से उपजे प्रश्नों पर चिंता जताते हुए कहा कि अब चिंतन एवं विचार के लिए समय कम बचा है. अध्यक्षीय भाषण में श्री गुरू तेगबहादुर खालसा कॉलेज प्रबंध समिति के अध्यक्ष सरदार तरलोचन सिंह ने हिंदी के साथ भारतीय भाषाओं के विकास की बात उठाई. स्वागत वक्तव्य में श्री गुरू तेगबहादुर खालसा कॉलेज के प्राचार्य डॉ. जसविंदर सिंह ने अतिथियों का स्वागत करते हुए डिजिटल दुनिया के विस्तार के विभिन्न आयामों से परिचित कराया.

समापन वक्तव्य में डॉ. स्मिता मिश्र ने कहा कि पहले हिंदी एवं भारतीय भाषी को कंप्यूटर पर काम करने के लिए मशक्कत करनी पड़ती थी. लेकिन अब भारत के बड़े बाजार को देखते हुए गूगल अलेक्सा को भी हिंदी बोलनी पड़ रही है. पहले तकनीकी सत्र विषय 'डिजिटल यूनिकोडिंग: हिन्दी चली नई चाल' पर आधारित रहा. इस दौरान बालेन्दु दाधीच, डॉ. विजय कुमार मल्होत्रा, प्रो. संजीव भानावत और अलका सिन्हा ने शिक्षा, कॉर्पोरेट एवं भाषा के स्तर पर आए बदलावों की चर्चा की.

दूसरा सत्र में 'सोशल मीडिया में हिंदी: लाइक, व्यू और फॉरवर्ड' विषय पर चर्चा के लिए प्रो. कुमुद शर्मा, प्रशांत उमराव, प्रो. अरुण भगत और आशेष कुमार अंशु मौजूद रहे. दूसरे दिन का प्रथम सत्र डिजिटल मीडिया में भाषायी परिदृश्य' पर केंद्रित रहा. इस दौरान वक्ताओं ने कहा कि हर शब्द के गहरे अर्थ होते हैं. इसलिए शब्दों का सही प्रयोग आवश्यक है. दिनेश श्रीनेत ने कहा कि कूल और गांधीगिरी जैसे शब्द पहले नहीं थे जो अब भाषा का अभिन्न अंग बनते जा रहे हैं. डिजिटल माध्यम लेखक और पाठक को जोड़ने का काम करता है.

विशेष सत्र में सईद अंसारी ने कहा युवा डिजिटल प्लेटफार्म से भी नौकरियां प्राप्त कर सकते हैं. डॉ. जसविंदर सिंह ने कहा कि डिजिटल प्लेटफार्म का सही प्रयोग जरूरी है. 'डिजिटल दौर का हिन्दी सिनेमा: हिंदी जरूरी या मजबूरी' पर दया शंकर मिश्र ने कहा डिजिटल पूर्व और डिजिटल सिनेमा के बदलावों को रेखांकित करते हुए कहा कि क्लासिक सिनेमा में भी अभद्रताएं थीं नायिक को लुभाने के लिए नायक द्वारा उसे छेड़ा जाना आवश्यक था. नया सिनेमा ज्यादा बोल्ड है, उसमें पारंपरिक फ़िल्टर कमज़ोर हो गए हैं.