2040 तक महासागरों में डंप प्लास्टिक कचरा 3 गुना होने का अनुमान! जानें क्या होंगे खतरे

फूड कंटेनर्स और ऑनलाइन डिलीवरी की मांग में बेतहाशा बढ़त होने के चलते दुनियाभर की लैंडफिल साइट्स का पहाड़ ऊंचा होता जा रहा है.

2040 तक महासागरों में डंप प्लास्टिक कचरा 3 गुना होने का अनुमान! जानें क्या होंगे खतरे
फाइल फोटो | फोटो साभार: रॉयटर्स

नई दिल्ली: दुनियाभर में महासागरों (Oceans) में पहले से कई मीट्रिक टन प्लास्टिक कचरा तैर रहा है. विश्व के अलग-अलग हिस्सों में समुद्री जीवन को बचाने और महासागरों को साफ करने की मुहिम बीते कई सालों से चलाई जा रही है लेकिन कोरोना महामारी के इस दौर में अचानक सिंगल यूज प्लास्टिक की खपत में बेतहाशा बढ़त होना भी किसी खतरनाक चिंता से कम नहीं है.

एक स्टडी में इससे जुड़ा खुलासा हुआ है कि आने वाले 20 सालों में समुद्रों में तैरने वाला प्लास्टिक कचरा तीन गुना तक बढ़ सकता है. गुरुवार को प्रकाशित एक स्टडी की रिपोर्ट में कहा गया कि ऐसा गजब होने से रोकने के लिए दुनियाभर की सरकारों के साथ बड़ी कंपनियों को भी एक साथ मोर्चे पर आना होगा.

गैर सरकारी संगठन इंटरनेशनल सॉलिड वेस्ट एसोशिएशन के मुताबिक कोरोना काल में सिंगल यूज प्लास्टिक की खपत तेजी से बढ़ी है. वहीं एशिया के सुदूरवर्ती तटों में फेस मास्क और रबड़ से बने दस्तानों को बड़ी तादाद में देखा जा रहा है. फूड कंटेनर्स और ऑनलाइन डिलीवरी की मांग में बेतहाशा बढ़त होने के चलते दुनियाभर की लैंडफिल साइट्स का पहाड़ ऊंचा होता जा रहा है.

नए शोध में वैज्ञानिकों के साथ इंडस्ट्री के जानकारों ने प्यू चैरिटेबल ट्रस्ट और सिस्टम IQ जैसी संस्थानों के हवाले से महासागरों को बचाने का तरीका भी बताया गया है. जिससे समुद्र में जाने वाले प्रस्तावित 80 फीसदी से ज्यादा प्लास्टिक को रोका जा सकता है. इस स्टडी में प्लास्टिक वेस्ट के संकट से उबरने के लिए विस्तृत रोडमैप तैयार करने के साथ रणनीति को भी साझा किया गया है.

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अगर समय रहते जरूरी कदम नहीं उठाए गए तो दुनियाभर के महासागरों में डंप होने वाली प्लास्टिक की अनुमानित मात्रा हर साल 11 मिलियन टन से 29 मिलियन टन तक बढ़ जाएगी, जिसके कारण 2040 तक समुद्र में करीब 600 मिलियन टन गंदगी बढ़ सकती है.

जर्नल साइंस की रिपोर्ट के मुताबिक ये कचरा 30 लाख ब्लू व्हेल्स के वजन के बराबर होगा. स्टडी के सह लेखक और प्यू के वरिष्ठ प्रबंधक विनी लेउ के मुताबिक 'प्लास्टिक प्रदूषण के बुरे असर से कोई नहीं बच सकता है ये सिर्फ आपकी या मेरी समस्या नहीं बल्कि पूरी दुनिया पर इसका असर होगा. अगर हमने कोई कोशिश नहीं की तो हालात और बुरे हो सकते हैं.'

स्टडी में पेश किए गए रोडमैप में प्लास्टिक प्रोडक्शन की जगह किसी अन्य पदार्थ पर निर्भर होने, रिसाइकिल केंद्रों की संख्या और क्षमता बढ़ाने, विकसित देशों को सहयोग देने और सिखाने में लगने वाले अरबों डॉलर के खर्च का जिक्र मौजूद है. इस काम में एनर्जी इंडस्ट्री को अपने कार्यक्षेत्र में बड़ा बदलाव करते हुए यूटर्न लेना पड़ेगा क्योंकि यहां प्लास्टिक आउटपुट को बढ़ावा देने के लिए दुनियाभर में केमिकल प्लांट्स पर जोर दिया जाता रहा है.

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1950 के बाद से प्लास्टिक का सालाना उत्पादन तेजी से बढ़ा है और वैश्विक उत्पादन की बात करें तो पहले ये 2 मिलियन टन हुआ फिर 2017 में ये आंकड़ा 348 मिलियन टन हुआ और अब 2040 तक इस आंकड़े के दो गुना बढ़त का अनुमान है. बड़े प्लास्टिक निर्माताओं में एक्सनमोबिल, डाउ और शेवरन फिलिफ केमिकल का नाम आता है और इनके मुताबिक वो उत्पादन बढ़ने के बावजूद प्लास्टिक प्रदूषण को कम करने के लिए प्रतिबद्ध हैं. जिस प्रोजेक्ट पर वो फंड देकर मदद करते हैं उसका फोकस वेस्ट मैनेजमेंट पर रहता है.

स्टडी पेपकर में सरकारों को नए प्लास्टिक उत्पादन से जुड़े नियमों को और सख्त करने का सुझाव दिया गया है ताकि सभी पक्ष फिर से इस्तेमाल हो सकने वाले विकल्पों पर एक साथ काम करें. प्लास्टिक इंडस्ट्री ने भी सिंगल यूज प्लास्टिक को बैन से बचाने के लिए तेजी से मुहिम चलाई. वहीं कुछ सबसे बड़े प्लास्टिक खरीददारों में कोका-कोला, पेप्सीको, नेस्ले और यूनिलिवर जैसी कंपनियां हैं, उन्होने भी भरोसा दिलाया है कि भविष्य में वो बड़े पैमाने पर रिसाइकिल कंटेट पर जोर देंगी.

स्टडी में ये भी पाया गया कि वर्तमान सरकारें और कॉर्पोरेट घरानों के वायदों के मुताबिक 2040 तक बढ़ने वाले प्रस्तावित प्लास्टिक कचरे का सिर्फ 7 फीसदी ही समुद्र में जाने से रोका जा सकेगा. स्टडी में ये भी सामने आया कि अनुमानित समुद्री प्लास्टिक के बहाव को 80 फीसदी तक कम करने के लिए कागज या अन्य कंपोज होने वाले विकल्पों पर निर्भर होने के साथ सिंगल यूज प्लास्टिक पर निर्भरता घटाने के साथ किसी भी पैकिंग में काम आने वाला सामान ऐसे मेटेरियल से बनाने पर जोर दिया जाए जिसका दोबारा इस्तेमाल हो सके.

एनजीओ के ग्लोबल कॉर्डिनेटर वॉन के मुताबिक उनका फोकस किसी भी तरह की प्लास्टिक के उत्पादन और उपभोग से परहेज करने की अपील पर रहता है. अगर इंडस्ट्री को इसी तरह काम करने दिया गया तो 2040 तक समुद्रों में डंप प्लास्टिक और भी गंभीर समस्या बन जाएगी जिसका हल निकालना आसान नहीं होगा.