DNA ANALYSIS: PM नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग के बीच क्या अंतर है?

आपने कभी शी जिनपिंग को दुर्गम इलाकों में जाकर अपने सैनिकों से मुलाकात करते हुए नहीं देखा होगा. जबकि प्रधानमंत्री मोदी कभी कश्मीर जाकर तो कभी दुनिया के सबसे ऊंचे मैदान सियाचिन पर जाकर देश के सैनिकों के साथ दीवाली जैसे त्योहार मनाते हैं.

DNA ANALYSIS: PM नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग के बीच क्या अंतर है?

नई दिल्ली: एयर कंडीशन्ड कमरे में बैठकर सेना को दिशा निर्देश देना आसान होता है. लेकिन लद्दाख जैसे दुर्गम इलाकों में जाकर अपनी सेना का हौसला बढ़ाना कोई मामूली बात नहीं है. हम ऐसा क्यों कह रहे हैं इसे समझने के लिए लद्दाख के मौसम और परिस्थितियों पर नजर डालनी चाहिए. प्रधानमंत्री मोदी ने जिस जगह पर सैनिकों को संबोधित किया और जहां सैन्य अधिकारियों से मिलकर स्थितियों को करीब से समझा वो जगह 11 हजार फीट की ऊंचाई पर है.

आम तौर पर एक स्वस्थ व्यक्ति भी जब लेह में 11 हजार फीट की ऊंचाई पर पहुंचता है तो उसे खुद को मौसम के अनुकूल बनाने में कम से कम 2 दिन का समय लगता है. इतनी ऊंचाई पर ना सिर्फ ऑक्सीजन की कमी हो जाती है. बल्कि सूखी और ठंडी हवा के साथ सूर्य की तीखी रौशनी भी परेशान करती है. इतनी ऊंचाई पर लोगों को अक्सर सिरदर्द, उल्टी, थकावट और चक्कर आने की शिकायत हो जाती है. इसे हाई अल्टीट्यूड सिकनेस (High Altitude Sickness) कहा जाता है.

लेकिन 69 साल के प्रधानमंत्री मोदी ने लेह पहुंचते ही सैनिकों से मुलाकात की, तनावपूर्ण परिस्थितियों को समझा और करीब आधे घंटे तक भाषण भी दिया.

जिस उम्र में अक्सर लोग कुछ कदम चलकर थक जाते हैं उस उम्र में 11 हजार फीट की ऊंचाई पर पहुंचकर देश और सैनिकों का हौसला बढ़ाना. ये बताता है कि प्रधानमंत्री मोदी ना सिर्फ शारीरिक रूप से स्वस्थ हैं बल्कि वो देश के लिए मुश्किल परिस्थितियों का सामना करने से भी घबराते नहीं हैं.

प्रधानमंत्री मोदी 69 वर्ष के हैं जबकि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की उम्र 67 साल है. यानी शी जिनपिंग नरेंद्र मोदी से 2 साल छोटे हैं. नरेंद्र मोदी एक लोकतांत्रिक देश के प्रधानमंत्री हैं जबकि शी जिनपिंग की स्थिति करीब-करीब एक तानाशाह वाली है. करीब 21 लाख सैनिकों के साथ चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी दुनिया की सबसे बड़ी सेना है और शी जिनपिंग इसके सुप्रीम कमांडर हैं. लेकिन आपने कभी शी जिनपिंग को इस तरह से दुर्गम इलाकों में जाकर अपने सैनिकों से मुलाकात करते हुए नहीं देखा होगा. जबकि प्रधानमंत्री मोदी कभी कश्मीर जाकर तो कभी दुनिया के सबसे ऊंचे मैदान सियाचिन पर जाकर देश के सैनिकों के साथ दीवाली जैसे त्योहार मनाते हैं. इसलिए आज आपको इन दोनों नेताओं के व्यक्तित्व को भी करीब से समझना चाहिए.

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पहला अंतर ये है कि प्रधानमंत्री मोदी लोकतांत्रिक नेता हैं जबकि शी जिनपिंग तानाशाह हैं. प्रधानमंत्री मोदी पूरे देश की पसंद हैं इसलिए वो 137 करोड़ भारतीयों का नेतृत्व कर रहें हैं. जबकि शी जिनपिंग कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता हैं और उनके लिए उनके स्वार्थ से बड़ा कुछ नहीं है.

दूसरा अंतर ये है कि शी जिनपिंग ने गलवान में मारे गए अपने सैनिकों पर एक शब्द तक नहीं कहा जबकि प्रधानमंत्री मोदी पहले दिन से अपने सैनिकों के साथ खड़े हैं.

तीसरा अंतर ये है कि Covid 19 के दौरान चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग कहीं दिखाई नहीं दिए जबकि प्रधानमंत्री मोदी ने इस संकट के दौरान फ्रंट से लीड किया. चीन में कोरोना वायरस दिसंबर के अंत से फैलने लगा था लेकिन जिनपिंग घर से बाहर नहीं निकले और लंबे इंतजार के बाद 10 फरवरी को पहली बार उन्होंने बीजिंग के एक जिले का दौरा किया. जबकि इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने 6 बार देश को संबोधित किया.

दोनों नेताओं के बीच चौथा अंतर ये है कि शी जिनपिंग मुश्किल समय में अपने दोस्तों और पड़ोसियों को धोखा देते हैं जबकि प्रधानमंत्री मोदी सबको साथ लेकर चलते रहे हैं. Covid 19 के दौर में भारत दूसरे देशों की मदद के लिए आगे आया और SAARC समेत कई देशों को भारत ने मदद पहुंचाई. यहां तक कि भारत चीन जैसे देश की भी मदद करने से पीछे नहीं हटा. इस दौरान भारत ने चीन को 2 करोड़ रुपये की कीमत की 15 टन राहत सामग्री भेजी. लेकिन इसके बदले में चीन ने ना सिर्फ हमें खराब क्वालिटी की PPE किट्स बेची बल्कि हमारी जमीन भी हड़पने की कोशिश की.

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इतना ही नहीं भारत ने मुश्किल समय में पूरी दुनिया को Hyrdroxy Chloro-quin जैसी दवाएं भेजी, जबकि चीन Covid 19 के मामले में अपनी जिम्मेदारियों से दूर भागता रहा. इतना ही नहीं, संकट का फायदा उठाकर दुनिया के अलग-अलग देशों की कमजोर अर्थव्यवस्थाओं पर कब्जा करता रहा. इसके विपरित भारत पूरी दुनिया को साथ लाने की कोशिश में जुटा रहा और इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने करीब 36 अंतरराष्ट्रीय नेताओं से बात की.

पांचवा अंतर ये है कि प्रधानमंत्री मोदी विकासवादी नेता हैं जबकि शी जिनपिंग विस्तारवादी नेता हैं. प्रधानमंत्री मोदी साफ शब्दों में कह चुके हैं कि भारत हमेशा दूसरे देशों की संप्रभुता का सम्मान करता है और भारत के लिए विस्तार नहीं बल्कि विकास प्राथमिकता है. जबकि शी जिनपिंग सिर्फ विस्तारवाद के नशे में डूबे हैं और वो भारत की नहीं बल्कि ताइवान, जापान, वियतनाम और फिलिपींस समेत करीब 18 देशों पर कब्जा करना चाहते हैं.

प्रधानमंत्री मोदी ने शुक्रवार को बिना नाम लिए चीन की इस विस्तारवाद पॉलिसी की पोल खोल दी. उन्होंने कहा कि विस्तारवाद मानवता का सबसे बड़ा दुश्मन है और सिर्फ विकासवाद के जरिए ही इसे रोका जा सकता है.

प्रधानमंत्री मोदी जब भी दुश्मनों पर हमला बोलते हैं तो वो कई बार बिना उनका नाम लिए ही पूरी दुनिया को जरूरी संदेश दे देते हैं. सितंबर 2019 में जब उन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाषण दिया था तब उन्होंने एक बार भी पाकिस्तान का नाम नहीं लिया था. लेकिन फिर भी उन्होंने दुनिया को साफ-साफ शब्दों में समझा दिया था कि पूरी दुनिया को आतंकवाद फैलाने वालों के खिलाफ एकजुट होकर लड़ना ही होगा.

हम आपको दो तस्वीरें एक साथ दिखा रहे हैं. एक तस्वीर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की है जिन्होंने आज फॉर्वर्ड पोस्ट पर जाकर सैनिकों से मुलाकात की और दूसरी तस्वीर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की है. जो एक जीप में सवार होकर अपने सैनिकों का निरीक्षण कर रहे थे. 

ये दोनों तस्वीरें देखकर आप समझ गए होंगे कि खुद को सेना का सुप्रीम कमांडर मानने वाले नेता और सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहने वाले नेता में क्या फर्क होता है. सैनिकों के बीच प्रधानमंत्री मोदी की मौजूदगी में कोई नाटकीयता नहीं है. वो सहज भाव से सैनिकों से मिल रहे हैं उन्हें सम्मान दे रहे हैं जबकि शी जिनपिंग सिर्फ वीडियो शूट कराने के लिए सेना की वर्दी पहनकर सैनिकों के बीच पहुंचते हैं और उनका निरीक्षण करते हैं.

इसीलिए चीन की सेना को वीडियो शूट करने में माहिर सेना माना जाता है. जबकि भारत की सेना दुश्मन को शूट करने के लिए जानी जाती है.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन, दुनिया के दो ऐसे प्रमुख नेता हैं, जो अपने सैनिकों का मनोबल बढ़ाने के लिए अक्सर उनके बीच पहुंच जाते हैं.

कई बार देखा गया है कि राष्ट्रपति ट्रंप अचानक इराक और अफगानिस्तान में अमेरिकी सैन्य अड्डों पर पहुंच गए और वहां पर तैनात अमेरिका के सैनिकों से मिले. ऐसे दौरे पूर्व निर्धारित नहीं होते और इनके बारे में किसी को भनक नहीं लगती.

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन भी अक्सर यही करते हैं. चाहे सीरिया की लड़ाई हो या फिर यूक्रेन के साथ विवाद हो, पुतिन कई बार अचानक रूस के सैन्य अड्डों पर पहुंचे और वहां पर सैनिकों का मनोबल बढ़ाया.

पिछले कई हफ्तों से चीन का सरकारी मीडिया भारत को डरा रहा था. वो चीन की सेना के वीडियो दिखा रहा था और ये बता रहा था कि चीन की सेना कितनी शक्तिशाली है. लेकिन ऐसे सैकड़ों वीडियोज पर भारत की सिर्फ एक तस्वीर भारी पड़ गई. और वो तस्वीर है- लद्दाख में जवानों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर.

प्रधानमंत्री के इस लद्दाख दौरे के बाद चीन किस तरह से परेशान है, इसे चीन की प्रतिक्रिया से समझा जा सकता है. प्रधानमंत्री की विस्तारवाद वाली बात पर चीन अब सफाई दे रहा है. भारत में चीन के दूतावास ने कहा है कि चीन को विस्तारवादी देश के तौर पर देखने का कोई आधार नहीं है. चीन ने अपने 14 पड़ोसी देशों में से 12 देशों के साथ बातचीत के जरिए सीमा विवाद सुलझाए हैं और सीमा को आपसी सहयोग के रूप में बदला है. उधर, चीन के विदेश मंत्रालय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लद्दाख दौरे पर ये कहा है कि मौजूदा तनाव को कम करने के लिए भारत और चीन के बीच सैन्य और कूटनीतिक माध्यम से बातचीत चल रही है. इसलिए किसी पक्ष को सीमा की स्थितियों को जटिल बनाने वाले कदम नहीं उठाने चाहिए. 

कुल मिलाकर चीन बैकफुट पर दिख रहा है. क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अब एक तरह से गेंद चीन के पाले में डाल दी है. अब चीन को तय करना है कि उसे शांति चाहिए या युद्ध चाहिए. क्योंकि भारत अब हर तरह से चीन का सामना करने के लिए तैयार है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लद्दाख दौरे से चीन बहुत परेशान है. चीन के सरकारी मीडिया में भी प्रधानमंत्री मोदी के लद्दाख दौरे की चर्चा है. चीन की सरकार के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स में तो ये कहा गया है कि प्रधानमंत्री मोदी, सीमा पर सैनिकों से जाकर इसलिए मिले हैं, क्योंकि वो, कोरोना वायरस और अर्थव्यवस्था के मुद्दे से देश की जनता का ध्यान हटाना चाहते हैं. कल तक यही ग्लोबल टाइम्स कह रहा था कि चीन की सेना के सामने भारत बहुत कमजोर है, और भारत, चीन से लड़ नहीं सकता. लेकिन आज जब भारत ने अपना दृढ़ निश्चय दिखाया है, तो ग्लोबल टाइम्स जैसे मुखपत्र दूसरी ही बातें करने लगे हैं.

जब किसी देश का सर्वोच्च नेता, खुद मोर्चे पर जाकर अपनी सेना के साथ खड़ा हो जाता है और उनका हौसला बढ़ाता है. तो पूरे देश का आत्मविश्वास बढ़ जाता है. आप सोचिए, गलवान घाटी में शहीद हुए जवानों के परिवारों को आज कितनी हिम्मत मिली होगी. गलवान में शहीद कर्नल संतोष बाबू की पत्नी बी संतोषी ने तो ये कहा है कि जो भी हो अब जीत कर वापस आना है.

सुनें शहीद कर्नल संतोष बाबू की पत्नी ने क्या कहा