शहडोल जिला अस्पताल में नहीं थम रहा नवजातों की मौत का सिलसिला, 19 दिन में 23 ने तोड़ा दम

इस साल अप्रैल से नवंबर माह तक जिला अस्पताल में बच्चों की मौत के आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो पता चलता है कि केवल 240 दिन में 375 बच्चे मौत की गोद में सो चुके हैं. इसमें एसएनसीयू में 262 और पीआईसीयू में 100 से ज्यादा बच्चे शामिल हैं. 

शहडोल जिला अस्पताल में नहीं थम रहा नवजातों की मौत का सिलसिला, 19 दिन में 23 ने तोड़ा दम
कुशा भाऊ ठाकरे जिला अस्पताल, शहडोल.

भोपाल: मध्य प्रदेश के शहडोल जिला अस्पताल में बच्चों की मौत का सिलसिला थमता नजर नहीं आ रहा है. कुशा भाऊ ठाकरे जिला अस्पताल के SNCU (Special Newborn Care Unit) व PICU (Pediatric Intensive Care Unit) में उपचार के दौरान दो और बच्चों की मौत हो गई है. उमरिया जिले की 4 और 3 माह की दो नवजात बच्चियों की सोमवार को मौत हुई. तीन बच्चों की हालत गंभीर बनी हुई है. 26 नवंबर से लेकर 14 दिसंबर के बीच अस्पताल के SNCU व PICU में भर्ती 23 नवजातों की मौत हो चुकी है.

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मौसम सर्दी का हो या गर्मी का, बच्चों की मौत का सि​लसिला नहीं थम रहा
बीते दिनों जिला अस्पताल में व्यवस्थाओं का जायजा लेने पहुंचे राज्य के स्वास्थ्य मंत्री प्रभु राम चौधरी ने कार्रवाई करते हुए CMHO व सिविल सर्जन को हटा दिया था. लेकिन स्थिति संभलती नजर नहीं आ रही. इस समय जो बच्चे मौत की आगोश में समा रहे हैं उनको लेकर कहा जा रहा है कि निमोनिया के कारण मर रहे हैं. लेकिन जब गर्मी थी तो उल्टी और दस्त से बच्चे मर रहे थे. इससे साबित होता है कि गर्मी का मौसम हो या फिर सर्दी का बच्चों की मौत नहीं थम रही है. इससे जिला अस्पताल के डॉक्टरों पर सवाल खड़े हो रहे हैं. 

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बीते 240 दिन में 375 बच्चों की मौत, 26 नवंबर से अब तक 23 की मौत
इस साल अप्रैल से नवंबर माह तक जिला अस्पताल में बच्चों की मौत के आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो पता चलता है कि केवल 240 दिन में 375 बच्चे मौत की गोद में सो चुके हैं. इसमें एसएनसीयू में 262 और पीआईसीयू में 100 से ज्यादा बच्चे शामिल हैं. शहडोल जिला अस्पताल में अप्रैल, मई और जून के महीने में 117 नवजातों की मौत हुई. इनमें अप्रैेल में 37, मई में 35 और जून में 45 बच्चों की मौत हुई. इस तरह देखा जाए तो औसतन हर रोज एक बच्चे की मौत हो रही है. गांव में तैनात आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और आशा कार्यकर्ता कोरोना काल में डोर टू डोर सर्वे करने व्यस्त रहा. बच्चों के कुपोषण और इनमें होने वाली मौसमी बीमारियों पर ध्यान नहीं दिया जा सका. 

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