राजस्थान में चुनौती बनी 7 सीटों के लिए विशेष रणनीति तैयार कर रही है कांग्रेस

राजस्थान में मिशन 25 को हासिल करने के मकसद से कांग्रेस पूरी ताकत से जुटी है. जयपुर से लेकर दिल्ली में टिकट वितरण को लेकर मंथन का दौर चल रहा है

राजस्थान में चुनौती बनी 7 सीटों के लिए विशेष रणनीति तैयार कर रही है कांग्रेस
1984 के बाद से राजस्थान में कांग्रेस एक साथ कभी 25 सीटें नहीं जीत पाई है

जयपुर: लोकसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है. राजस्थान में भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दल प्रत्याशियों के चयन की कवायद में जुटे हैं. लेकिन प्रत्याशियों के चयन में इस बार कांग्रेस के सामने बड़ी चुनौती है यह चुनौती ना केवल मजबूत प्रत्याशियों के चयन की है बल्कि राजस्थान में लगातार हार का सामना कर रही सीटों को भी वापस हासिल करने की है. आइए आपको बताते हैं राजस्थान में ऐसी कौन 7 सीटें हैं जो कभी कांग्रेस का गढ़ हुआ करती थी लेकिन पिछले कई चुनाव में लगातार यहां कांग्रेस को हार का मुंह देखना पड़ रहा है.

राजस्थान में मिशन 25 को हासिल करने के मकसद से कांग्रेस पूरी ताकत से जुटी है. जयपुर से लेकर दिल्ली में टिकट वितरण को लेकर मंथन का दौर चल रहा है. 25 में से करीब 13 सीटें ऐसी हैं जहां पर कांग्रेस ने अपने प्रत्याशियों के नाम तय कर लिए हैं लेकिन एक कड़वी हकीकत यह है कि 1984 के बाद से राजस्थान में कांग्रेस एक साथ कभी 25 सीटें नहीं जीत पाई है. उनमें भी एक बड़ी सच्चाई है कि कई सीटें ऐसी है जहां कांग्रेस लगातार चुनाव हार रही है. यह सीटे हैं जो कभी कांग्रेस के मजबूत गढ़ हुआ करती थी लेकिन कांग्रेस के कमजोर होते संगठन ने यहां भाजपा को न केवल सेंध लगाने का मौका दिया बल्कि बीजेपी अब इन किलों पर पूरी तरह से काबिज भी हो चुकी है. दिल्ली में चल रहे इस मंथन में इन सीटों पर फतह हासिल करने के लिए भी विशेष रणनीति तैयार की जा रही है.

कांग्रेस के लिए सबसे मुश्किल 7 सीट
बीकानेर लोकसभा सीट को जीतना इस बार कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती है. पिछले 3 चुनाव में यहां कांग्रेस को लगातार हार का सामना करना पड़ रहा है. 1998 में यहां कांग्रेस के दिग्गज नेता बलराम जाखड़ चुनाव जीते थे. वहीं 1999 के चुनाव में यहां रामेश्वर डूडी ने कांग्रेस के लिए सीट जीती थी. उसके बाद से कांग्रेस के लिए हालात यहां खराब होते चले गए. 2004 के चुनाव में भाजपा ने धर्मेंद्र के सेलिब्रिटी चेहरे के सहारे इस सीट पर अपनी सेंध लगाई तो 2009 ओर 2014 के चुनाव में इस सीट के नए परिसीमन के हालातों के चलते अर्जुन राम मेघवाल चुनाव जीते आ रहे हैं.

जयपुर शहर 
जयपुर लोकसभा सीट कांग्रेस के लिए सबसे मुश्किल चुनौतियों में से एक है. आजादी के बाद से यहां कांग्रेस केवल 3 बार ही चुनाव जीत पाई है. 1952 में यहां दौलत मल और 1984 में नवल किशोर शर्मा कांग्रेस की टिकट पर चुनाव जीतने वाले नेताओं में शामिल है. 1989 से लेकर 2004 तक गिरधारी लाल भार्गव का यहां एकछत्र राज रहा था. हालांकि 2009 में महेश जोशी ने इस सीट पर जीत दर्ज कर नए समीकरणों के संकेत दिए थे. लेकिन 2013 के चुनाव में भाजपा के रामचरण बोहरा ने रिकॉर्ड मतों से जीतकर यह साबित कर दिया कि सीट पर भाजपा ही सिकंदर है.

जोधपुर लोकसभा
ये सीट भी कभी कांग्रेस का गढ़ हुआ करती थी. लेकिन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का गृह क्षेत्र होने के बावजूद यह सीट कांग्रेस का मजबूत किला नहीं रह पाई है. आजादी के बाद से कांग्रेस ने इस सीट पर 8 लोकसभा चुनाव जीते हैं जिनमें अकेले अशोक गहलोत ने 5 बार यह सीट कांग्रेस की झोली में डाली है. राजस्थान की राजनीति में अशोक गहलोत के उदय के साथ 1980 से लेकर 1999 तक अशोक गहलोत ने इस 5 बार सांसद रह कर इस सीट को कांग्रेस का मजबूत किला बना दिया था. लेकिन राज्य की राजनीति में अशोक गहलोत की सक्रियता के बाद से इस सीट पर कांग्रेस कमजोर हुई है.

1999 और 2004 में भाजपा की टिकट पर जसवंत सिंह बिश्नोई लगातार चुनाव जीते. 2000 9 के चुनाव में कांग्रेस के चंद्रेश कुमारी ने इस सीट पर फिर से परचम लहराया लेकिन लेकिन भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में गजेंद्र सिंह शेखावत को टिकट देकर एक बार फिर से सीट कांग्रेस के पाले से छीन ली. कांग्रेस इस बार इस सीट पर बड़ा दांव खेलने की तैयारी कर रही है. खोए हुए गढ़ को वापस हासिल करने के मकसद से इस बार अशोक गहलोत के पुत्र वैभव गहलोत को जोधपुर लोकसभा सीट से टिकट दिए जाने की पूरी संभावना है.

जालौर लोकसभा 
कांग्रेस का मजबूत गढ़ रही इस सीट पर पिछले तीन चुनाव में भारतीय जनता पार्टी चुनाव जीत रही है. आजादी के बाद से कांग्रेस ने सीट पर 9 लोकसभा चुनाव जीते. सरदार बूटा सिंह इस सीट पर कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे हैं जोकि चार बार सांसद रहे हैं. 1991 से लेकर 96, 98, 99 के चार चुनाव कांग्रेस ने लगातार जीते. लेकिन पिछले 3 चुनाव में उसे लगातार हार का सामना करना पड़ा. 

चित्तौड़गढ़ लोकसभा
इस सीट पर भी कांग्रेस का जनाधार लगातार कमजोर हुआ है. आजादी के बाद से कांग्रेस से इस लोकसभा सीट पर 7 चुनाव जीते हैं लेकिन 1989 के बाद से यहां लगातार कांग्रेस कमजोर होती चली गई. 1989 में महेंद्र सिंह मेवाड़ भारतीय जनता पार्टी की टिकट पर चुनाव जीते तो 91 और 96 में जसवंत सिंह ने यहां कमल खिलाया. 1998 में उदयलाल आंजना ने जरूर यह सीट कांग्रेस की झोली में डाली थी लेकिन 1999 और 2004 में श्रीचंद कृपलानी यहां लगातार भाजपा की टिकट से सांसद रहे. 2009 में कांग्रेस की दिग्गज नेता गिरिजा व्यास ने इस सीट पर कांग्रेस की वापसी कराई थी. लेकिन 2014 में चंद्र प्रकाश जोशी ने एक बार फिर से यह सीट भाजपा की झोली में डाल दी.

कोटा लोकसभा
इस सीट को भी कांग्रेस इस बार बेहद मुश्किल चुनौती मान रही है. 1957 से लेकर 1971 तक लगातार चार चुनाव जीतने वाली कांग्रेस पार्टी का ये गढ़ उसके बाद से लगातार ढहता ही चला गया. आलम यह है की 1989 से लेकर 2014 तक हुए 8 चुनाव में कांग्रेस केवल 2 बार ही जीत पाई है. 1984 में वर्तमान में यूडीएच मिनिस्टर शांति धारीवाल यहां से सांसद बने थे. उसके बाद 1989 से लेकर 96 तक वेदू दयाल जोशी लगातार तीन चुनाव भाजपा के टिकट पर जीते. 1998 में कांग्रेस ये सीट जीतने में कामयाब रही लेकिन 1999 से लेकर 2004 तक रघुवीर सिंह कौशल ने भारतीय जनता पार्टी की टिकट पर लगातार दो चुनाव जीते. 2009 में राजपरिवार के लिए इज्यराज सिंह यहां कांग्रेस के टिकट पर सांसद बने थे. 2014 में ओम बिरला ने ये सीट एक बार फिर से भाजपा की झोली में डाल दी. विधानसभा चुनाव में पत्नी को टिकट नहीं दिए जाने से नाराज इज्यराज सिंह के भाजपा शामिल होने से शांति धारीवाल के लिए यह सीट बचाना बेहद मुश्किल चुनौती है.

झालावाड़ लोकसभा
ये सीट कांग्रेस के लिए सबसे मुश्किल सीटों में से एक है. इसकी वजह भी है ये सीट पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और उनके पुत्र दुष्यंत का गढ़ माना जाता है. 1952 से लेकर 2014 तक 15 लोकसभा में कांग्रेस यहां केवल 4 चुनाव ही जीत पाई है. कांग्रेस के लिए सीट से जुड़ी एक कड़वी हकीकत यह है कि 1984 के बाद कांग्रेस यहां अपना खाता भी नहीं खोल पाई है. यानी यहां पर लगातार आठ चुनाव में भाजपा जीत आ रही है. 1989 से लेकर 2004 तक वसुंधरा राजे यहां पर 5 बार सांसद रही है और उसके बाद उनके पुत्र ने यहां विरासत संभाल ली है. 2004 से लेकर 2014 तक उनके पुत्र दुष्यंत यहां से चुनाव जीते आ रहे हैं. 

जाहिर तौर पर इन सीटों के आगमन से ही साफ है कि कांग्रेस के लिए मिशन 25 की राह आसान नहीं है. यही वजह है कि इस बार कांग्रेस ग्रास रूट से लेकर जयपुर और दिल्ली तक कई स्तर पर मंथन कर रही है कांग्रेस को इन सीटों पर ना केवल सभी नेताओं की एक राय से प्रत्याशी को उतारना होगा बल्कि इन हारे हुए किलो को हासिल करने के लिए दिग्गज नेताओं को भी पूरी ताकत लगानी होगी, लेकिन इसके बावजूद भी ये इतना आसान नहीं है.