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जालोर में रंग लाई युवा किसान की कोशिश, ऑर्गेनिक खेती से हो रही लाखों की कमाई

एक युवा किसान की पहल से जालोर से शुरू हुई ऑर्गेनिक खेती में मिली सफलता के बाद अब जिले के अलावा सिरोही, जोधपुर, बाड़मेर, जैसलमेर सहित अन्य ज़िलों के किसानों ने ऑर्गेनिक खेती की शुरुआत की है.

जालोर में रंग लाई युवा किसान की कोशिश, ऑर्गेनिक खेती से हो रही लाखों की कमाई
डार्क जोन में होने के चलते यहां पर पानी की भयंकर क़िल्लत रही. (प्रतीकात्मक फोटो)

जालोर: जालोर में इन दिनों किसान परंपरागत खेती को छोड़कर नवाचार करते हुए ऑर्गेनिक खेती में दिलचस्पी दिखा रहे हैं. एक युवा किसान की पहल से जालोर से शुरू हुई ऑर्गेनिक खेती में मिली सफलता के बाद अब जिले के अलावा सिरोही, जोधपुर, बाड़मेर, जैसलमेर सहित अन्य ज़िलों के किसानों ने ऑर्गेनिक खेती की शुरुआत की है. 

आपको बता दें कि अब क़रीब 3000 अधिक किसानों ने जालोर के किसानों से प्रेरित होकर अपने खेतों में ऑर्गेनिक खेती शुरू कर दी है. जिसके चलते आज जालोर के अलावा अन्य ज़िलों के किसानों को ख़ासा मुनाफ़ा होने लगा है.

पानी की किल्लत का निकाला विकल्प
जालोर जिला लंबे समय से डार्क ज़ोन में होने के चलते यहां पर पानी की भयंकर क़िल्लत है. ऐसे में कम पानी से होने वाली ऑर्गेनिक खेती की ओर किसान ज़्यादा दिलचस्पी दिखा रहे हैं. इसी के चलते जालोर जिले की सांचोर तहसील के युवा और प्रगतिशील किसान योगेश जोशी ने ज़िले में ऑर्गेनिक खेती की शुरुआत की और उसके बाद अब ज़िले में किसान ज़ीरा, वरियाली, धनिया, मेथी, कलौंजी जैसे मसालों की खेती करते हैं. वहीं, मल्टीग्रेन में किनोवा, चिया सीड और बाजरा से भी उन्हें काफी मुनाफा मिल रहा है. इतना ही नहीं जालोर मे ऑर्गेनिक खेती के बाद ये फ़सलें जापान में पहुंच रही हैं. जालोर में समय समय पर जापान से विशेष टीमें भी यहां पर पहुंच कर खेतीबाड़ी के बारे में जानकारी ले रही है.

जापानी कंपनी से हुआ करार
आपको बता दें कि जालोर के किसानों ने कई मसाला कंपनियों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों से संपर्क किया, लेकिन वो रसायन खादों वाली फसलों को खरीदने में इच्छुक थे. इसी बीच इंटरनेट उनका सहारा बना और एक जापानी कंपनी से संपर्क हुआ.

जीरा बना जापान की पसंद
स्थानीय किसानों ने बताया कि जापानी कंपनी से बात हुई और उनके लोग यहां के खेतों में आए. जांच-परखने के बाद उन्होंने ऑर्गेनिक तरीक़े से तैयार होने वाली फसल लेने का जालोर के किसानों के साथ करार किया. जापान पहुंची जीरे की पहली खेप को खूब पसंद किया गया. जिसके बाद सौंफ, धनिया, मेथी आदि के लिए भी करार किया. 

किसानों ने बनाई रैपिड ऑर्गेनिक कंपनी
रसायनमुक्त खेती को व्यवसायिक रूप देने के लिये किसानों ने मिलकर एक रैपिड ऑर्गेनिक कंपनी बनाई. जिसके जरिए ज्यादा से ज्यादा किसानों को इसमें जोड़ा गया और उन्हें अच्छा मुनाफा दिलाया. जिस कारण पिछले 5-7 वर्षों में समूह के 1000 किसान जैविक प्रमाण पत्र प्राप्त कर चुके हैं. बता दें, यहां के 1000 किसान कन्वर्जन-2 में हैं, शेष 1000 किसान साथी सी-3 फेज में हैं. कंपनी ने सभी किसानों के लिए जैविक प्रमाणीकरण के खर्च को खुद उठाती है और समूह के किसानों के लिए लगातार प्रशिक्षण का इंतजाम भी जारी है.

मुनाफे की उगा रहे हैं फसल
जालोर में इस समय दक्षिण अमरीकी फसल किनोवा उगाने की पहल जोर पकड़ती जा रही है. ज़िले के तक़रीबन 800 से अधिक किसान खेती के माध्यम से अच्छा मुनाफ़ा ले रहे है. आपको बता दे कि किनोवा के100 ग्राम दानों में मिलने वाली पोष्टिकता: प्रोटीन 14 से 18 ग्राम,कार्बोहाइड्रेट 7 ग्राम, वसा 2 ग्राम, रेशा 11 ग्राम, विटामिन ए, बी, सी,मिलती है. खनिज तत्व में केल्सियम मैग्नीशियम, लोहा, जिंक, मेंगनीज मिलता है. वही किनोवा का उपयोग अनाज के रूप में गेंहू मक्का के आटे के साथ मिलाकर ब्रेड बिस्किट एवं पास्ता बनाने में काम आता है. 

इसके अलावा पराठा, रायता, सलाद एवं चावल की तरह उपयोग किया जाता है. किनोवा फलेक्स के रूप में, भुने दाने के रूप में काम लिया जाता है. जल निकास युक्त विभिन्न जमींन में रबी की इस फसल की आसानी से खेती की जा सकती है. वैसे बरानी क्षेत्र के लिए यह फसल अधिक उपजाऊ है. अनुकूल तापमान 18 से 24 डिग्री है. 

सबसे पहले उगाया जीरा
ज़िले के किसान योगेश जोशी ने मीडिया से बातचीत में बताया कि शुरुआत में नुकसान अनुभव और सलाह न होने के चलते हुआ था, इसलिए काजरी के जैविक कृषि वैज्ञानिक डॉ. अरुण के शर्मा की मदद ली. उन्होंने साथ कई और किसानों को गांव आकर ट्रेनिंग दी, जिसके बाद हम लोगों ने फिर जीरा उगाया और मुनाफा भी हुआ.

समूह में खेती करना है फायदेमंद सौदा
योगेश कहते हैं, "दूसरी बात की खेती से ये समझ बनी थी कि अकेले के बजाय समूह में खेती करना ज्यादा फायदेमंद है, लेकिन शुरुआत में किसानों को जोड़ना आसान नहीं था, तो सिर्फ सात किसानों का साथ मिला. क्योंकि सवाल ये भी था कि बिना यूरिया, डीएपी और पेस्टीसाइड खेती हो भी सकेगी क्या?" 

युवा किसान ने ली ट्रेनिंग
योगेश ने काजरी के वैज्ञानिकों की मदद से जैविक खाद और फसल रक्षा के लिए दवाइयां बनानी सीखीं. उनके प्रयोग से अच्छे परिणाम मिले थे और सात किसानों से शुरू हुआ कारवां 3000 तक पहुंच गया.