Year Ender 2019: ये शख्सियतें बहुत याद आएंगी

साल 2019 अपनी अंतिम बेला पर है. नए साल की दस्तक से पहले वो चेहरे जहन में घूम रहे हैं, जिनके हमारे बीच ना होने का सच भ्रम सा लगता है.   

Year Ender 2019: ये शख्सियतें बहुत याद आएंगी
फाइल फोटो

साल 2019 अपनी अंतिम बेला पर है. नए साल की दस्तक से पहले वो चेहरे जहन में घूम रहे हैं, जिनके हमारे बीच ना होने का सच भ्रम सा लगता है. इस खबर में बात उन शख्सियतों की जिन्होंने अपने होने की छाप लोगों के दिलों में हमेशा-हमेशा के लिए कायम कर दी. साल 2019 का ये साल देशवासियों के लिए उपलब्धियों भरा साल रहा तो वहीं इस साल देशवासियों ने कई दिग्गज हस्तियों को खोया. इस वर्ष राजनीति, साहित्य और सिनेमा जगत के कई हस्तियों ने दुनिया को अलविदा कहा.

सुषमा स्वराज (1952-2019)
शांत हुई दमदार आवाज सुषमा स्वराज

1974 के स्टूडेंट मूवमेंट में शामिल होकर ABVP से सियासी करियर की शुरुआत करने वाली सुषमा स्वराज ने सियासत में उस मुकाम को हासिल किया जो मुल्क के हर ख्वातीन के लिए फक्र की बात है. महज 25 साल की उम्र में राजनीति में कदम रखने वाली सुषमा ने मुख्यमंत्री से लेकर केंद्रीय मंत्री तक का सफर पूरा किया. सुषमा स्वराज ने घर और सियसत दोनों में बैलेंस बनाए रखा. उन्होंने पार्टी के लिए जद्दोजहद की. मुल्क के लिए आवाज़ उठायी और कामयाब भी हुई, लेकिन कभी भी कामयाबी पर गुरुर नहीं दिखाया. एक ऐसी कुशल वक्ता, जिन्होंने संसद से लेकर यूएन तक अपनी बातों का लोहा मनवाया. अपने ओजस्वी एवं प्रभावशाली भाषणों के लिए सुषमा स्वराज विपक्षी नेताओं के बीच भी काफी लोकप्रिय थी.

अरूण जेटली (1952-2019)
मंझधार में छोड़ गए संकट मोचक

छात्र राजनीति से अपने राजनीतिक कैरियर शुरू करने वाले अरूण जेटली सरकार का संकटमोचक कहा जाता था. 1977 में जेटली दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्रसंघ के अध्यक्ष चुने गए थे. इसके बाद जेल में इनकी मुलाकात अटल बिहारी वाजपेयी जैसे दिग्गज नेताओं से हुई और उनका राजनीतिक करियर शुरू हुआ. आपातकाल के दौरान वह जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में शामिल रहे और 1980 में उन्हें बीजेपी यूथ विंग का कार्यभार दिया गया. अटल सरकार में वह कानून मंत्री भी रहे. जेटली प्रधानमंत्री मोदी के काफी करीब थे. उनका जीवन उपलब्धियों से भरा था और बतौर वित्त मंत्री उन्होंने कई सुधार करते हुए अर्थव्यवस्था को नई ऊंचाई दी. 2009 में राज्यसभा में जेटली नेता विपक्ष बने. बीमारी के चलते वह 2019 में अंतरिम बजट पेश नहीं कर सके थे. खराब स्वास्थ्य की वजह से ही उन्होंने नई सरकार में मंत्रिमंडल से बाहर रहने का फैसला किया था. बीमार होने के बावजूद अरुण जेटली के लिए देश सबसे पहले था. पीएम मोदी जेटली को अपना सबसे अच्छा दोस्त मानते थे. अरुण जेटली का 24 अगस्त 2019 को दिल्ली के एम्स में निधन हो गया. निधन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेश में थे. पीएम मोदी को अपने सबसे अच्छे मित्र का अंतिम दर्शन करने की टीस आज भी है.

मनोहर पर्रिकर (1955-2019)
गोवा की धड़कन और सादगी के मूर्ति

सादा जीवन उच्च विचार इस वाक्य को अगर सही मायनों में किसी ने आत्मसात किया, उसे अपने जीवन में उतारा तो वो मनोहर पर्रिकर ही थे. चार बार गोवा के मुख्यमंत्री रहे मनोहर पर्रिकर ने कभी भी अपने आपको हाईप्रोफाइल दिखाने की कोशिश नहीं की. पर्रिकर कार्यकर्ताओं की बाइक पर ही बैठकर इलाके में लोगों से मिलने निकल पड़ते थे तो कार्यक्रम के दौरान कैसे पर्रिकर किसी आम आदमी की तरह कतार में खड़े हो जाते थे. मनोहर पर्रिकर ने IIT बॉम्बे से 1974 से 1978 तक मैनेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की थी. अपनी सादगी और ईमानदारी की वजह से लोगों के पसंदीदा थे. इसीलिए उन्हें गोवा की धड़कन कहा जाता था. यही वजह थी कि गोवा में जब उन्हें मुख्यमंत्री के तौर पर आमंत्रित किया गया तो उन्होंने केंद्र में रक्षा मंत्री जैसा महत्वपूर्ण पद त्याग दिया था. वो लंबे समय से कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे. कैंसर की बीमारी से जूझते महज 63 साल की उम्र में 17 मार्च 2019 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया.

मदन लाल सैनी (1943-2019)
बीजेपी ने 'लाल' को खोया

राजस्थान बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष मदन लाल सैनी 75 वर्ष की उम्र में इस दुनिया को छोड़कर अलविदा तो कह दिया, लेकिन वह अपने पीछे यादों का एक भरा पूरा संसार छोड़कर गए हैं. पार्टी में उन्हें हमेशा एक कार्यकर्ता अध्यक्ष के रूप में याद किया जाएगा. जितना साधारण नाम, उतने ही साधारण कार्यकर्ता के रूप में पार्टी में सैनी ने काम किया. वर्ष 1952 में जनसंघ से जुड़े मदन लाल सैनी वर्षों तक मजदूरों के बीच काम करते रहे. मदन लाल सैनी ने बीजेपी के लाल बनने के लिए लंबे समय़ तक संघर्ष किया. विपरित परिस्थियों में भी उन्होंने कभी कार्यकर्ताओं का साथ नहीं छोड़ा और ना ही पार्टी का दामन छोड़ा. हमेशा अमर रहेंगे.

राम जेठमलानी (1923-2019)
बिंदास प्रवक्ता और शानदार वकील

पूर्व केंद्रीय मंत्री, प्रतिष्ठित वकील राम जेठमलानी अपने बिंदास और बेबाक बयान के लिए सदा सुर्खियों में रहे. राम जेठमलानी का 8 सितंबर 2019 को जब देहांत तब वे 95 साल के थे, उन्होंने अपनी शक्सियत पर कभी भी उम्र को हावी नहीं होने दिया. कानून और राजनीति के क्षेत्र में उनकी पहचान बेहद निडर और एक योद्धा के तौर पर थी.  वह जो जिम्मेदारी लेते थे उसके लिए मजबूती से खड़े होते थे. फौजदारी कानून की जानकारी के मामले में उनका कोई मुकाबला नहीं था. आपातकाल के काले दिनों के दौरान सार्वजनिक स्वतंत्रता के लिए उनकी लड़ाई को याद किया जाएगा.

शीला दीक्षित (1938-2019)
दिल्ली की धड़कन,कांग्रेस की बेटी

दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को यूं ही कांग्रेस की बेटी नहीं कहा जाता था. शीला दीक्षित ने दिल्ली में कांग्रेस पार्टी को खड़ा करने के लिए दिन रात एक कर दिए, तब जाकर कांग्रेस ने लगातार 15 साल तक दिल्ली पर राज किया. शीला दीक्षित 1998 से 2013 के बीच 15 वर्षो तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं. वो पहली बार साल 1984 में उत्तर प्रदेश के कन्नौज से सांसद चुनी गईं. बाद में वह दिल्ली की राजनीति में सक्रिय हुईं. शीला दीक्षित 1986 से 1989 तक प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री भी रही. मार्च 2014 से अगस्त 2014 तक केरल की राज्यपाल की भी जिम्मेदारी को निभाया. उनका व्यक्तित्व शालीन और मिलनसार था. दिल्ली के विकास में उन्होंने उल्लेखनीय योगदान दिया. जुलाई 2019 में दिल का दौरा पड़ने से अचानक दुनिया को अलविदा कह दिया. शीला दीक्षित आज खामोश थीं, लेकिन उनकी वो मुस्कुराहट आज भी दिलों में जिंदा हैं, जिसने अपने सियासी दुश्मनों को भी हमेशा अपना बनाकर रखा.

जयपाल रेड्डी (1942-2019)
तेज तर्रार और लोकप्रिय नेता

राजनीतिक सफर में जयपाल रेड्डी की पहचान कांग्रेस के सीनियर लीडर के रूप में रही, लेकिन इमरजेंसी के दौरान उन्‍होंने कांग्रेस पार्टी के खिलाफ भी झंडा का उठाया था. शुरुआती दिनों में कांग्रेस पार्टी छोड़कर जनता पार्टी ज्‍वाइन करने वाले रेड्डी ने एक बार फिर घर-वापसी की. राजनीति में उनका आखिरी पड़ाव भी कांग्रेस पार्टी ही था. रेड्डी ने 5 बार लोकसभा चुनाव, 2 बार राज्यसभा और 4 बार विधानसभा चुनाव जीता. केंद्र में ई अहम मंत्रालय की जिम्‍मेदारी संभाली. अलग तेलांगना राज्य बनने में उऩके आदोंलन को नहीं भुलाया जा सकता. अलग तेलंगाना की मांग को लेकर आंदोलन के दौरान आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री पद की पेशकश की गई थी, लेकिन उन्होंने इससे इनकार कर दिया था.

खय्याम साहब (1927-2019)
संगीत के जादूगर थे खय्याम
खय्याम साहब यानी मोहम्मद ज़हूर का जन्म जालंधर के करीब हुआ था. बचपन से ही उन्हें फिल्मों का शौक था. ये शौक इस कदर परवान चढ़ा कि वो घर से भागकर संगीत सीखने के लिए दिल्ली आ गए. घरवालों ने पढ़ाई पूरी करने के लिए वापस बुलाया. उन्होंने जैसे-तैसे पढ़ाई की, लेकिन आखिरकार फिल्मों का ही रूख किया. खय्याम बॉम्बे पहुंचे और संगीत में नया इतिहास रचने की शुरुआत की. खय्याम ने अपने गानों से लोगों के दिलों पर राज किया है. उन्होंने जितनी भी धुनें बनाई वो सदाबहार हैं.

विजू खोटे (1941-2019)
नहीं रहे शोले के 'कालिया'

बॉलीवुड के सबसे मशहूर और ऐतिहासिक फिल्म शोले में गब्बर सिंह के इस डायलॉग तेरा क्या होगा कालिया को भला कौन भूल सकता है. वीजू खोटे ने मशहूर फिल्म शोले में कालिया का किरदार निभाया था. गब्बर सिंह के सामने थे वीजू खोटे के तौर पर कालिया. कहा जाता हैं, कि अगर कालिया के रूप में वीजू खोटे ने अपना सशक्त किरदार नहीं निभाया होता तो फिल्म में गब्बर सिंह की हनक भी मशहूर नहीं होती. वीजू खोटे साल 1964 से फिल्मी दुनिया से जुड़े थे. शोले फिल्म के अलावा उन्हें अंदाज अपना अपना में उनके कैरेक्टर के लिए भी जाना जाता है.

वीरु देवगण (1934-2019)
छोड़ गया स्टंट का बादशाह

वीरू देवगण एक ऐसा नाम, जिसनें भारतीय फिल्मों को स्टंट कोरियोग्राफी में एक नई दिशा दी. भारतीय फिल्मों में बेहतरीन एक्शन सीन देने का श्रेय वीरू देवगण को ही जाता है. वीरू देवगन ने 1967 में फिल्म 'अनीता' से बतौर स्टंटमैन बॉलीवुड में डेब्यू किया था, उसके बाद वीरू देवगण ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. वीरू देवगन ने अपने करियर में 80 से ज्यादा फिल्मों में स्टंट कोरियोग्राफ  किया, जिसमें ‘मिस्टर इंडिया’, ‘फूल और कांटे’, ‘शहंशाह’, ‘दिलवाले’ प्रमुख हैं. 
 
डॉ. श्रीराम लागू (1927-2019)
मुकद्दर का सिकंदर, इंसाफ का तराजू

अपने अभिनय से किसी नाटक को ऊंचाई की हदों तक ले जाने वाले चुनिंदा अभिनेताओं में से एक थे डॉ. श्रीराम लागू. रंगमंच के साथ-साथ उन्होंने फिल्मों में भी लंबी पारी खेली है. हिंदी फिल्मों में उन्होंने सबसे ज्यादा चरित्र भूमिकाओं को निभाया.  मेडिसिन डॉक्टर और ईएनटी स्पेशलिस्ट रहे श्रीराम लागू कुछ सालों तक अपने पेशे में रहे, लेकिन वो तो रंगमंच के लिए ही बने थे. साल 1972 में पिंजरा फिल्म से अपने बॉलीवुड करियर की शुरुआत की. इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा. 

नामवर सिंह (1926-2019)
नहीं रहे हिंदी साहित्य के पुरोधा

साहित्य अकादमी सम्मान से नवाज़े जा चुके नामवर सिंह ने हिंदी साहित्य में आलोचना को एक नया आयाम और नई ऊंचाई दी. उन्होंने बीएचयू से हिंदी साहित्य में एमए और पीएचडी किया. फिर कई सालों तक बीएचयू में पढ़ाया भी. उसके बाद नामवर सिंह ने सागर और जोधपुर विश्वविद्यालय में पढ़ाने का काम किया और फिर जेएनयू गए, जहां उन्होंने भारतीय भाषा केंद्र की स्थापना की और अपनी सेवाएं दीं.

डॉ.वशिष्ठ नारायण सिंह(1942-2019)
महान गणितज्ञ को खो दिया

विश्व के महान गणतिज्ञ में शुमार डॉ, वशिष्ठ नारायण सिंह बेहद गरीब परिवार में पैदा में हुए, लेकिन दुनिया भर में उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया. बिहार के एक छोटे से गांव में पैदा हुए वशिष्ठ नारायण शुरू से ही मेधावी छात्र थे. वशिष्ठ नारायण सिंह जब पटना साइंस क़ॉलेज में पढ़ते थे तभी कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जॉन कैली की नज़र उन पर पड़ी. कैली ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और 1965 में वशिष्ठ नारायण अमरीका चले गए.