राजस्थान के इस किसान ने रचा इतिहास, मिलेगा साहित्य का सबसे बड़ा पुरस्कार

रामस्वरूप किसान का जन्म 14 अगस्त 1952 को राजस्थान के हनुमानगढ़ जिला अंतर्गत परलीका गांव में हुआ. स्नातक तक शिक्षा प्राप्त किसान ने सरकारी नौकरी न कर व्यवसाय के रूप में खेती को चुना.

राजस्थान के इस किसान ने रचा इतिहास, मिलेगा साहित्य का सबसे बड़ा पुरस्कार
रामस्वरूप किसान राजस्थानी कथा-साहित्य में एक बड़ा नाम है.

जयपुर: इस वर्ष का साहित्य अकादमी का पुरस्कार राजस्थान के छोटे से गांव परलीका के जिस साहित्यकार रामस्वरूप किसान को दिया जा रहा है वह केवल नाम से किसान नहीं बल्कि कर्म से भी किसान हैं. अपने गांव में जिस व्यक्ति को आप खेत में काम करते हुए और ऊंट गाड़ी चलाते हुए देख रहे हैं. ये वही साहित्यकार रामस्वरूप किसान हैं जिसकी रचनाओं का लोहा देश दुनिया ने माना है. किसान को पुरस्कार स्वरूप एक लाख रुपए की राशि, स्मृति चिन्ह व शॉल भेंट किए जाएंगे. साहित्य अकादेमी प्रतिवर्ष 24 भारतीय भाषाओं के साहित्यकारों को पुरस्कृत करती है. किसान को राजस्थानी भाषा में प्रकाशित उनकी कथाकृति 'बारीक बात' के लिए यह पुरस्कार प्रदान किया जाएगा. 
 
सरकारी नौकरी किस जगह कृषि को दिया महत्व
रामस्वरूप किसान का जन्म 14 अगस्त 1952 को राजस्थान के हनुमानगढ़ जिला अंतर्गत परलीका गांव में हुआ. स्नातक तक शिक्षा प्राप्त किसान ने सरकारी नौकरी न कर व्यवसाय के रूप में खेती को चुना. पालिका गांव के ही साहित्यकार और शिक्षक सत्य नारायण सोनी का कहना है कि वे असल में किसान हैं. नाम के आगे लगा किसान इनवर्टेड कोमाज में नहीं है. पैंसठ की उम्र में आज भी खेत में हाड़-तोड़ मेहनत करते हैं. उनके यहां सृजन व श्रम एकमेक है. किसी भाषा का एक बड़ा राइटर जब उम्र के तीसरे पड़ाव में भी खेती जैसा कठोर कर्म करते हुए सृजनरत हो तो यह एक अजूबे से कम नहीं है. किसी व्यक्ति को बढ़ी दाढ़ी व घिसे कपड़ों में ऊंटगाड़े पर बैठ नित खेत जाते देख कौन कह सकता है कि यह राजस्थानी का बड़ा कथाकार और कवि है. पर यह सच है.

अपना भोगा हुआ यथार्थ ही लिखते हैं किसान
रामस्वरूप किसान राजस्थान कथा-साहित्य में एक बड़ा नाम है. वह लोक व श्रमशील वर्ग को दूर से देखने वाले न होकर स्वयं उसका हिस्सा हैं. इस कारण वे अपना भोगा हुआ यथार्थ ही लिखते हैं. किसान ने अपनी कहानियों में ग्रामीण जीवन का बेजां दोहन किया है. वह ग्रामीण जीवन व संस्कृति के मास्टर हैं. उनके मौलिक चिन्तन को पढ़कर उन्हें किसी यूनिवर्सिटी के दर्शनशास्त्र के व्याख्याता से कम नहीं आंका जा सकता. वह मेहनत में विश्वास करते हैं और अपनी एक-एक रचना पर महिनों तक काम करते हैं. यह मेहनती मिजाज उन्हें कृषि से ही मिला है. वह साहित्य में भी खेती की तरह ही पचते हैं. हर वक्त साहित्यमय रहने वाले किसान सृजन को पार्ट टाइम जॉब मानने वाले तथाकथित लेखकों को फटकारते हैं. वह स्वयं सृजन को मुख्य कर्म मानते हैं. उनका पूरा लेखन मिशनरी भाव से है. वे लेखन के द्वारा सामाजिक बदलाव के हामी हैं.

kisan sahitya

मार्क्सवाद से प्रभावित हैं रामस्वरूप किसान
रामस्वरूप किसान मार्क्सवादी हैं, परन्तु उनके सृजन पर विचारधारा हावी नहीं है. स्वयं विचारधारा उनके सृजन के माध्यम से आलोकित होकर कलात्मक रूप ही धारण करती है. चिन्तन को कलात्मक रूप देने का हुनर कोई रामस्वरूप किसान से सीखे. उनकी प्रत्येक कहानी और कविता में कोई न कोई चिन्तन अवश्य बोलता है. राजस्थानी साहित्य में रामस्वरूप किसान प्रथम ऐसे राइटर हैं जिनकी चिन्तन प्रधान कहानियों की मूल संवेदनाओं व ध्वनित भावार्थों तक राजस्थानी के समीक्षकों की पहुंच नहीं बनी है. कहने का अर्थ है कि किसान की कहानियों का जटिल यथार्थ समझने के लिए बौद्धिक स्तर की जरूरत है.

पहली पुस्तक 'हिवड़ै उपजी पीड़' ने रचा इतिहास
किसान को इस बात की पीड़ा भी है कि राजस्थानी में उनके लेखन को ठीक से समझने वालों की भी कमी है. इनकी प्रथम पुस्तक है- 'हिवड़ै उपजी पीड़'. यह सात सौ दोहों का संग्रह है, जिसकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अब तक इसके तीन संस्करण छप चुके हैं. खास बात यह है कि इस पुस्तक ने लोक में अपनी वह साख बनाई है जो बहुत कम पुस्तकें बना पाती हैं. सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इस पुस्तक के दोहे जन-आंदोलनों में नाच-नाच कर गाए जाते हैं व हथियार की तरह बरते जाते हैं. इस पुस्तक के सभी सात सौ दोहे सात सौ कारतूस हैं जो पूंजीवादी व साम्राज्यवादी व्यवस्था पर दागे गए हैं. ये सभी दोहे किसान व मजदूर की त्रासदी पर लिखे गए हैं. कवि की उपलब्धि यह है कि ये सभी दोहे लोक की जुबान पर चढ़ चुके हैं.

किसान की दूसरी किताब है 'गांव की गली-गली' यह हिन्दी की एक लम्बी कविता है पुस्तकीय रूप में. इसके तीन संस्करण आ चुके हैं. इसकी लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि राजस्थानी के प्रख्यात कवि डॉ. आईदानसिंह भाटी का कहना है कि इस पुस्तक को उनका भानजा सिरहाने रखकर सोता है. यह पुस्तक भी बड़ी संख्या में बिक कर लोक की जुबान चढ़ी है. इसमें गांव को अद्भुत ढंग से चित्रित किया गया है. 

16 कहानियों के संग्रह को मिला पुरस्कार
किसान की 16 कहानियों का ताजा संग्रह 'बारीक बात' गत वर्ष 'बोधि' से छपा है, जिसे मोहन आलोक आधुनिकता की अद्भुत भाव-भंगिमा की बेजोड़ यात्रा का क्लेसिकल पड़ाव मानते हैं. मक्सीम गोर्की का मानना है कि आम लेखक आम वक्त में लेखक न होकर खून-पसीना बहाने वाला आम नागरिक होता है. किसान इस कथन पर खरा उतरता है. हकीकत में किसान फकत खेती का ही किसान नहीं, वह कहानी का भी बेजोड़ किसान है और यह उनकी कहानियां पढ़कर जाना जा सकता है.