सुरमई पंखों पर सवार होकर आई संजा परंपरा का लोक स्वर

कहते हैं संजा एक लोक देवी है जो हर साल अपनी सखी-कन्याओं के बीच श्राद्ध पक्ष के 15  दिनों तक हंसी-ठिठोली करने अपने अंचल में आ पहुंचती है.

सुरमई पंखों पर सवार होकर आई संजा परंपरा का लोक स्वर

मौसम की चौखट से भादों विदा ले रहा है. क्वार के आसमान से कजरारे-कपसीले बादल छंटने लगे हैं. शामें रंगीन होकर घर-आंगन में उतरने लगी हैं. खेत की बागुड़ों पर फूलों की झालर झिलमिला उठी है. यह पितरों के धरती पर आने का भी मुहूर्त है. यानी पितृपक्ष शुरू हो गया है और मध्यप्रेदश के निमाड़ जनपद की सुकुमार कन्याओं के लिए यह समय मिल-बैठकर संजा पर्व मनाने और अपने पुरखों से आशीर्वाद बटोरने का भी है.

संजा एक लोक देवी है
कहते हैं संजा एक लोक देवी है जो हर साल अपनी सखी-कन्याओं के बीच श्राद्ध पक्ष के 15 दिनों तक हंसी-ठिठोली करने अपने अंचल में आ पहुंचती है. इस दौरान किशोरियां गाय का ताज़ा हरा गोबर लेकर दीवारों पर चांद, सितारे, पेड़-पहाड़, पशु-पक्षी और गणेश तथा स्वास्तिक की आकृतियां बनाती हैं और उन्हें ताज़े फूल-पत्तियों से सजाती हैं. शाम ढलते ही इन सुन्दर सजीली आकृतियों के सामने कन्याओं की बैठक होती है और शुरू होता है सुर में सुर मिलाता संजा गीतों का कारवां. संजा की कहानी दरअसल भारतीय स्त्री के जीवन की धड़कन है. गीत की कड़ियाँ खुलती हैं तो जैसे नारी जीवन का एक-एक अध्याय खुलने लगता है. यह दास्तान कल्पना के धागों से नहीं, संस्कृति के सूत्रों से बंधी है, जिसमें इंसानी दुनिया की हकीकतों का फलसफा खुलता है.

दरअसल किसी भी साहित्य की सबसे बड़ी आकांक्षा यही होती है कि वह लोककंठ में बस जाय, लोक चेतना का अंग बन जाये अर्थात् लोक-साहित्य के रूप में प्रतिष्ठित हो जाये. किसी आलोचक का कहा याद आता है कि दरबारी अभिरूचि और सत्ताश्रय की आकांक्षा वाला साहित्य सत्ता-केंद्रों से पुरस्कार चाहे जितने बड़े प्राप्त कर ले, लोककंठ में नहीं बसता. लोक-चेतना का अंग वह बनता है, जो तंत्र का ‘तिरस्कार’ और ‘लोक’ का ‘स्वीकार’ करता है. यही वजह है कि हिन्दी काव्य का जो श्रेष्‍ठतम है, वह लोक साहित्य के रूप में लोक-मानस में अमिट है, शाश्वत है.

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निमाड़ अंचल की वाचिक परंपरा
लोक की वाचिक परंपरा से जुड़ी इस पीठिका के साथ मध्य प्रदेश के निमाड़ अंचल में प्रचलित संजा गीतों और उसके साथ जुड़े उस लोक अनुष्‍ठान की मिसाल गिनाई जा सकती है जिनमें स्त्री के जीवन का सुंदर पक्ष खुलता है. गीत तो मन के मीत होते हैं. धूप-छाँही जीवन का हर लम्हा इनके दामन में धड़कता है. ये धड़कनें जब सुर-ताल और लय का सुंदर ताना-बाना लिए फिज़ाओं में गूंजती हैं तो जैसे मिट्टी की सौंधे अहसास भीतर तक बजने लगते हैं.

संजा गीतों की गमक भी कुछ ऐसी ही लहक-महक से सराबोर है. धरती के ये छंद, दरअसल क्वारी कन्याओं की कामनाओं के कलश हैं, जिनमें प्यार है, मनुहार है, यादों-बातों की अठखेलियाँ हैं, खुशियाँ हैं, मासूम ज़िदें हैं, शिकवे-शिकायत हैं. यानी स्त्री की ज़िंदगी का आईना है संजा का संगीत. गीत की कड़ियों और लय की लड़ियों का सिलसिला छिड़ता है तो मन सुर के पंखों पर सवार होकर निमाड़ की वादियों में चला जाता है.

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...तो संजा ब्याही जा चुकी है. पर्व-त्योहार का मौसम आया तो आंखों में मायके की मधुर यादों के चित्र तैरने लगे और माँ-पिता की हिचकियों ने बेटी को घर लाने का इशारा कर दिया. मशविरा होने लगा कि कौन भाई संजा को लिवाने जाएगा. गीत देखिए-‘‘बाई संजा तू एक दूर बसे. तुख लेण रख जायेगा कुण/जाये-जाये रे सूरज वीरो...

संजा के गीतों की गुंजार फैलती है तो उम्र की चढ़ती बेल के साथ सयानी होती निमाड़ की कन्या की सुन्दर छवि आँखों में तैरने लगती है. ज़रा गौर कीजिए संजा की बनठन पर. बैलगाड़ी में बैठकर वह अपने बचपन के गाँव पधार रही है. उसकी छोटी-सी गाड़ी उबड़-खाबड़ सड़क पर हिचखोले खाती आगे बढ़ रही हैं और संजा का तन-मन भी पूरी खुशी के रोमांच से भर उठा है. उसका छींटदार घाघरा धमक रहा है, कलई की चूड़ियाँ चमक रही हैं, बिछुड़ियाँ खनक रही हैं और नाक की नथनी झोले खा रही है.

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देखिए संजा की शान-‘‘छोटी सी गाड़ी-लुड़कती जाय, लुड़कती जाय/ओमऽऽ बठी संजा बईण, संजा बईण/घाघरों घमकावती जाय/चूड़िलो चमकावती जाय/बिछुड़ी बजावती जाय/बाईजी की नथणी झोला खाय/झोला खाय’’.

संजा के गीतों की कड़ियों में एक भोली, अल्हड़ और मासूम कन्या की तस्वीर झिलमिलाती है. कहीं मुस्कुराती चाहतें हैं, तो कहीं माँ-पिता और बुजुर्गों से बचकाने सवाल हैं. कहीं सैर-सपाटे को मचलती इच्छाएँ हैं, तो कहीं सपनों की रंगीन झालरों से झांकते आने वाले कल के सपने हैं. लेकिन शादी से पहले तो उसका आज़ाद और बेफिक्र लड़कपन हर कहीं कुलांचे भर रहा है.

अपने गाँव के हाट-बाजार में जब वह पूरा श्रृंगार कर अपनी सहेलियों के संग घूमने निकलती है तो उसका पहनावा ओढ़ावा, बलखाती चाल और बोली पर सब मुग्ध हो जाते हैं. क्या खूब पिरोया है इस सुन्दरता को हमारे अनाम गीतकारों ने आवाज दी है-‘‘संजा सहेलड़ी बाजार खेलऽऽ/बाजार मऽऽ डोलऽऽ/तू पेरऽऽ माणक मोती/गुजराती चाल चालऽऽ/निमाड़ी बोली बोलऽऽ.’’

संजा अपने पीहर यानी बचपन के घर-आँगन में आयी तो शुरू होती है अपनों के संग ठिठोली. लेकिन उसके पहले संजा के घर वाले और उसकी सखियाँ उसे पहले की तरह सजा-धजा देखना चाहते हैं. कोई उसकी आँख में काजल आँजना चाहती है, तो कोई उसे चिर सुहागन की प्रतीक माथे की बिंदिया से सजाना चाहती है. यह उछाह कितना आत्मीय है-‘‘काजल टी की ल्यौ भाई-काज़ल टीकी ल्यौ/काजल टीकी लई न म्हारी संजा बईण रव द्यौ.’’

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उम्र की डगर पर पांव धरती संजा अचानक कब बड़ी हो गई, पता ही नहीं चला. घर वालों को अब उसके हाथ पीले करने की चिंता सताने लगी. अब रिश्ता जोड़ने वाले मेहमानों की आहट होने लगी. घर पर बैठी चिड़िया और मुंडेर पर कौए को देखकर संजा अपने दादाजी से सहज सवाल करती हैं- ‘‘दादाजी इन पंछियों को उड़ाते क्यों नहीं क्या कोई मेहमान आने वाले हैं?

मन की गहराइयों में उतर जाने वाले इस गीत को पढ़िये-‘‘घर पर बठी चिड़िया उड़ावता क्यों नी दादाजी/मगरी बठ्यौ/कागरो उड़ावता क्यों नी दादाजी’’.

लेकिन जीवन की रीत निराली है. कन्याओं की नियति तो उन चिड़ियों की तरह हैं जिन्हें बाबुल के आंगन से आखिर एक दिन उड़ जाना है. यह सब संजा से भला कैसे अछूता रहता! तो संजा का ब्याह तय हो गया. शादी का मुहूर्त निकल आया. बारातियों के लिए वंदनवार सज गए हैं. बारात भी कितनी निराली है.

धन्यता के गीत गाती आवाज़ें

संजा के ससुराल से हाथी आया है, घोड़ा भी आया है. और सब मन मारकर संजा की विदाई के लिए खड़े हैं- ‘‘संजा का सासरऽऽ सी/हत्थी भी आयो/घोड़ों भी आयो/जा बाई संजा सासरऽऽ’’. लोक गीतों का दामन दर्पण की तरह साफ-उजला और ईमानदार होता है, ज़रा गौर से ताँक-झाँक करें तो इनमें हमारी ही ज़िंदगी के अक्स झिलमिलाते नज़र आते हैं. संजा गीतों की तासीर भी ऐसी ही है.

निमाड़ की संस्कृति, संस्कार, परंपराएं और लोक जीवन की सहज घटनाएं संजा के गीतों में समाई हैं. जब गीतों की यह गागर छलकती है तो जैसे निमाड़ के संजा गीतों का भाव संसार दुनिया की हर स्त्री की हकीकत का फलसफा तैयार करता है. धरती निमाड़ की है तो क्या हुआ, गीत-संगीत के शब्द-स्वरों में हर स्त्री की उम्मीदें चहचहाती हैं. संजा के इस गीत की करूणा को ही लें, यकीनन हर मां-बाप और ब्याहता बेटी की रूह इसकी धुन के साथ काँप उठती है- ‘‘गुणऽऽ चुणऽऽ गुणऽऽ गाड़ी वाजऽऽ न ओका ढीला-ढीला चाकजी/संजा बईण जासे सासरऽऽ. ओख कुण वीरो लेणऽऽ जायजी’’.

संजा अपने भाई के संग गाड़ी में बैठकर मायके आ गई है. अब सुबह-शामें उसकी अपनी हैं. सांझ घिरती है तो संजा का पर्व मनाने से भला कैसे रोक सकती है अपने आपको. सहेलियों ने अपनी प्यारी संजा के लिए सारी तैयारियाँ कर रखी हैं. संजा का रूप दिपदिपा रहा है वैसे ही जैसे ढलती सांझ का सिंदूरी आँचल पश्चिम के आसमान पर लहराता है- ‘‘म्हारी संजा फूली वो/तू तो सांझ पड़े घर जाय’’.

शाम हुई और धीरे-धीरे उसका तांबई उजाला निमाड़ के गाँवों में फैलने लगा. घर की दीवारों पर गोबर और रंग-बिरंगे फूल-पत्तियों से सजी संजा की आकृतियाँ भी इस शुभ-मुहूर्त में जैसे और भी निखर आई है. यह आरती का समय है. मन के भीतर पूजा के श्रद्धा स्वरों का दीप जलाने का समय भी यही है. लेकिन संजा की आरती तो संजा के बगैर अधूरी है. सभी सखियाँ मिलकर संजा के घर जाती हैं और माँ से मनुहार करती हैं कि संजा को भेजो, हमें आरती उतारनी है. पूजा की थाली सज चुकी है. फूल-पांखुरी, दीपक नैवेद्य सब तैयार हैं. संजा निमाड़ की लोक देवी के रूप में दीवार ही नहीं, अपनी सभी सहेलियों के बीच एक शक्ति बनकर, एक आश्रय बनकर, एक आशीष बनकर आसन पर बैठी है. तभी सामूहिक स्वरों में बज उठता है संजा का जयघोष- ‘‘करो संजा की आरती!’’

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संजा की इस मर्मस्पर्शी गाथा को गीतों की जुबानी अवाम तक पहुँचाने और उसके पारंपरिक गायन को बचाने के अभियान पर निकली निमाड़ की प्रसिद्ध लोक गायिका आलोचना मांगरोले कहती हैं- ‘‘संजा के गीतों में उभरा स्त्री विमर्श हमें भारतीय नारी के जीवन से जुड़े कुछ शाश्वत सवालों के समाधान खोजने का उद्वेलन जगाता है. आज सरकारें ‘बेटी बचाओ’ नारे के साथ सामाजिक जागरण की जिस मुहिम को मुखरित कर रही है वह संजा के लोक गीतों में पूरी ताकत से प्रस्फुटित हुआ है.’’

आलोचना जी इस प्रवाह में जोड़ती हैं-‘‘हमें लोक गीतों की शक्ति को पहचानने की जरूरत है. वाचिक परंपरा के पास जो अनमोल निधियाँ है वे एक बार फिर हमारी मौजूदा पारिवारिक सामाजिक समस्याओं से निजात पाने में मददगार हो सकती है.’’

ब्रज मंडल में संजा का रूप प्रेयसी
लोक संस्कृतिकर्मी वसंत निरगुणे बताते हैं कि ब्रज मंडल में संजा का रूप प्रेयसी का है. वहाँ यह राधा के रूप में प्रतिष्ठित है. एक किंवदंती के अनुसार कृष्‍ण ने एक श्याम मानिनी राधा को प्रसन्न करने के लिये आंगन की दीवार पर गोबर और विभिन्न फूलों की पंखुड़ियों से रंग-बिरंगी कलात्मक सजावट की थी, तब से गोबर और फूलों से घर की दीवारें विभिन्न आकृतियों से चित्रित करने की परिपाटी पड़ गई. और तब ही से अनब्याही लड़कियां इसे पर्व के रूप में मनाने लगीं. राजस्थान में यह सांझी कहलाती है और वहाँ भी कई मिथक कथाएं मिलती है.

हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और पंजाब में पहुंचकर सांझी की उत्पत्ति-कथा भिन्न हो जाती हैं. पंजाब में कुछ कथा मिल सकती हैं. मध्य प्रदेश में मालवा की साँझी या संजा, निमाड़ की संजाफूली, बुंदेलखंड की मामुलिया, महाराष्‍ट्र की गुलाबाई और ब्रजमंडल की सांझी के विभिन्न रूपों की मिथकीय अवधारणाएं प्रचलित हैं.

सांझी के इतने विस्तृत संसार से यह सिद्ध होता है कि यह कोई असाधारण स्त्री व्यक्तित्व रहा होगा, जिसका आनुष्‍ठानिक और चित्रमयी पूजा का प्रचलन लोक में प्रतिष्ठित होता गया जो आज तक अबाध प्रवाहित है.

(लेखक वरिष्‍ठ मीडियाकर्मी, कला समीक्षक तथा टैगोर विश्वकला एवं संस्कृति केन्द्र भोपाल के निदेशक हैं.)