भाषा की राजनीति

भाषा को किसी जाति और संप्रदाय से जोड़कर देखने वाले देश के नेताओं और राजनीतिक दलों को देश के ही अलग-अलग राज्यों में भाषा को बचाए रखने के लिए जद्दोजहद कर रहे लोगों की चिंता कभी दिखाई नहीं देती। कभी हिंदी तो कभी संस्कृत, उर्दू, मराठी, बांग्ला के नाम पर अपना राजनीतिक वोट बैंक बनाने में लगे ये नेतागण जमीनी तौर पर कभी भी संजीदा दिखाई नहीं देते।

वासिंद्र मिश्र
भाषा को किसी जाति और संप्रदाय से जोड़कर देखने वाले देश के नेताओं और राजनीतिक दलों को देश के ही अलग-अलग राज्यों में भाषा को बचाए रखने के लिए जद्दोजहद कर रहे लोगों की चिंता कभी दिखाई नहीं देती। कभी हिंदी तो कभी संस्कृत, उर्दू, मराठी, बांग्ला के नाम पर अपना राजनीतिक वोट बैंक बनाने में लगे ये नेतागण जमीनी तौर पर कभी भी संजीदा दिखाई नहीं देते।
मुंबई में 5 भाषाओं की जानकार और कभी गृहलक्ष्मी पत्रिका के मराठी संस्करण की संपादक रहीं सुनीता नाइक भाषा के प्रति इसी उदासीनता की शिकार हैं। 65 साल की सुनीता नाइक संघर्ष करके ही करियर की ऊंचाइयों तक पहुंची थीं और आज भी अपनी आजीविका के लिए संघर्ष करने को तैयार हैं, लेकिन 5 भाषाओं की जानकार सुनीता नाइक को फुटपाथ पर दिन गुजारने जैसे हालात भी झेलने पड़े हैं।
भाषा के प्रति उदासीनता सिर्फ व्यक्ति विशेष तक होती तो इसे व्यक्तिगत करार दिया जा सकता था लेकिन इससे इतर भी आपको कई ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे। दक्षिण भारत के मैसूर शहर में सुभरमा नाम से एक अखबार छपता है। इस अखबार की खासियत ये है कि ये संस्कृत भाषा को आज भी आम लोगों तक ले जा रहा है। संस्कृत जो कई भाषाओं की जननी है और आज अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है, उसे बचाने के लिए निकाले जा रहे इस अखबार की अब 2000 से भी कम प्रतियां छपती हैं। ये प्रतियां भी संस्कृत के प्रति लगाव रखने वाले कुछ भाषाप्रेमी लोगों की वजह से छप पाती हैं। इसे बचाने के लिए ज़मीनी तौर पर जनता के नुमाइंदों ने कभी भी कोई संजीदा कोशिश नहीं की।
लखनऊ में एक परिवार ऐसा है जो संस्कृत भाषा को बचाने के लिए सालों से काम कर रहा है। वीरभद्र मिश्रा 14 भाषाओं के जानकार थे, आईएएस की परीक्षा पास कर चुके थे लेकिन उन्होंने आजीवन संस्कृत के शिक्षक के रूप में काम करना पसंद किया। अब उनका परिवार इस काम में लगा हुआ है। उनकी कोशिश से उनका मोहल्ला अब संस्कृत नगर के नाम से जाना जाता है। इनके परिवार ने कई किताबों का संस्कृत में अनुवाद किया है और अब ये संस्कृत संस्थान खोलना चाहते हैं। इस परिवार की कोई राजनीतिक लालसा नहीं है, बस संस्कृत भाषा की धरोहर को आगे ले जाने के जज्बे के साथ ये परिवार काम करता जा रहा है।

देश में 1968 में त्रिभाषा फॉर्मूला की बात की गई थी, इसके तहत स्कूलों में बच्चों को कम से कम तीन भाषाएं पढ़ाए जाने की बात थी। इनमें हिंदी, अंग्रेज़ी और एक स्थानीय भाषा पढ़ाए जाने पर जोर दिया गया था। आज़ादी के बात भारत की अनेकता को देखते हुए देश के शिक्षाविदों ने त्रिभाषा फॉर्मूला दिया था ताकि ना तो भाषाएं खत्म हों और ना ही कहीं भी कम्यूनिकेशन से जुड़ी समस्याएं आएं। लेकिन आज हालात ये हैं कि अभी भी राजनीतिक दल समय-समय पर इस फॉर्मूले को लागू करने की ज़रूरत पर सिर्फ बहस करते नज़र आते हैं। अगर भाषा को लेकर सचमुच संजीदगी होती तो राजनीतिक दल और नेता त्रिभाषा फॉर्मूला लागू करने को लेकर सोचते। इस फॉर्मूले की वजह से तमाम मुस्लिमों ने हिंदी भाषा की पढ़ाई की और हिंदुओं ने उर्दु की तालीम हासिल की, ताकि रोजगार के ज्यादा से ज्यादा अवसर मिलें।

ऐसे में ये ख्याल आता है, अगर सच में किसी राजनीतिक दल में भाषाओं को लेकर संजीदगी होती तो इस क्षेत्र में काम किया जाता। इस क्षेत्र में काम कर रहे लोगों की मदद की जाती। भाषाओं को बचाए रखने के लिए इन्हें रोजगार से जोड़े जाने की ज़रूरत है ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग भाषाओं से जुड़ सकें।
(लेखक ज़ी मीडिया रीजनल चैनल्स के संपादक हैं)