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बस्तरः 75 दिनों तक चलने वाले दशहरा मेला का हुआ आगाज, 600 सालों से चली आ रही है यह अनोखी प्रथा

मंदिर परिसर में आज नाबालिग बालिका अनुराधा पर काछिन देवी सवार हुईं और कांटे के झूले पर झूलकर देवी ने बस्तर राजपरिवार के सदस्य को दशहरा मनाये जाने की अनुमति दी.

बस्तरः 75 दिनों तक चलने वाले दशहरा मेला का हुआ आगाज, 600 सालों से चली आ रही है यह अनोखी प्रथा
(सांकेतिक तस्वीर)

गरिमा शर्मा, नई दिल्ली/बस्तरः छत्तीसगढ़ के बस्तर में हर साल बड़े ही धूम धाम से मनाए जाने वाले बस्तर के दशहरे का आगाज हो गया है. परंपरा के अनुसार एक नाबालिग बच्ची को कांटों के झूले पर झुलाया जाता है और जब वो अनुमति देती है, तब ही इस पर्व की शुरूआत होती है और इसी परंपरा के चलते आज दशहरे की प्रमुख रस्म ''काछिन गादी'' निभाई गई. मंदिर परिसर में आज नाबालिग बालिका अनुराधा पर काछिन देवी सवार हुईं और कांटे के झूले पर झूलकर देवी ने बस्तर राजपरिवार के सदस्य को दशहरा मनाये जाने की अनुमति दी. ये एक ऐसा अनुष्ठान है जिसमें जनप्रतिनिधि भी मौजूद रहते हैं. बस्तर सांसद और दशहरा समिति के अध्यक्ष दीपक बैज ने भी बालिका पर सवार हुई माता से आशीर्वाद लिया.
 
बता दें कि बस्तर में दशहरे की परंपरा 600 वर्षों से मनाई जा रही है. यह कोई आम पर्व नहीं बल्कि ये विश्व का सबसे लंबा चलने वाला पर्व है. छत्तीसगढ़ के बस्तर में मनाया जाने वाला दशहरा पूरे 75 दिनों तक मनाया जाता है. इस परंपरा की शुरुवात यहां के राजपरिवार ने की थी. अब जहां पूरे देशभर में दशहरा रावण के वध की खुशी में मनाया जाता है तो वहीं बस्तर का दशहरा रावण वध की परंपरा के अनुसार नहीं बल्कि महिषासुर का वध करने वाली आदिशक्ति के सम्मान के पर्व के रूप में मनाया जाता रहा है.

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परंपरा के अनुसार एक नाबालिग बच्ची को कांटों के झूले पर झुलाया जाता है और जब वो अनुमति देती हैं तब ही इस पर्व की शुरूआत होती है. यहां के आदिवासी बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेवश्वरी के सम्मान में यह पर्व मनाते हैं जिसमे आदिवासी समुदाय समेत सभी समुदायों की भूमिका होती है.यहां काछिन देवी से अनुमति मिलने के बाद ही बस्तर का दशहरा वास्तविक रूप से शुरू होता है. 

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इसी के चलते यहां के सभी आदिवासी अपने पौराणिक अंदाज में माता की झांकी निकालते हैं और ''काछिन गादी '' की रस्म निभाते हैं. बस्तर के इस दशहरे पर्व की शुरुआत श्रावण मास की हरेली अमावस्या से होती है. इस रस्म के बाद रथ निर्माण के लिए कई गांवों से लकड़ी लाकर काम शुरू किया जाता है.