गीता और आहार: खाना बनाते और खाते समय रखें इन बातों का ध्यान, नहीं होगा कोई रोग

गीता में बताया गया है मनुष्य जैसा भोजन करता है वैसी ही उसकी प्रवृति होती है. यदि आप सात्विक भोजन करते हैं तो शांत प्रवृति होगी. तामसिक भोजन विष के समान, ये क्रोध-अनाचार बढ़ाता है.

गीता और आहार: खाना बनाते और खाते समय रखें इन बातों का ध्यान, नहीं होगा कोई रोग
फाइल फोटो.

नई दिल्ली: गीता (Bhagavad Gita) में भगवान ने सिर्फ कर्मयोग (Karma Yoga), ज्ञान योग (Gyan Yoga) और भक्तियोग (Bhakti Yoga) का ही उपदेश नहीं दिया है बल्कि उन्होंने व्यक्ति के आहार के बारे में भी बताया है. भगवान ने ये बताया है कि भोजन तीन तरह का है. जो जैसा अन्न खाता है उसका मन भी वैसा ही हो जाता है. तो आज के समय में भोजन और आहार का क्या अर्थ है और क्या हम भोजन के शास्त्रीय नियमों का पालन कर रहे हैं ये जानना बेहद आवश्यक है.

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गीता और आहार
हमारे शरीर की मुख्य जरूरत आहार है. शरीर आहार से बना है. खाने का असर शारीरिक बनावट पर पड़ता है. इसीके अनुरूप शरीर के साथ दिमाग का विकास होता है. शरीर पर भोजन का असर वैसे ही दिमाग और विचारों पर भी लेकिन आजकल के भागदौड़ के जीवन में कई बार हम उन नियमों का पालन नहीं कर पाते जो शास्त्रों में खान-पान को लेकर बनाए गए हैं. गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है कि जो मनुष्य सिर्फ स्वयं खाता है वो पाप का भागी है इसलिए पहले घरों में ब्राह्मण, गाय, कुत्ते की रोटी निकलती थी.

नियमों की अनदेखी कर रही बीमार
लोग अपने आसपास के लोगों का भी ख्याल रखते थे कि पौष्टिक खाना मिले. खाने की बर्बादी को रोकने के लिए लंगर और पंगत में खाना खिलाया जाता था. इससे गरीबों का पेट भरता था गीता में इस तरह के खान पान के नियम बताए गए हैं ये नियम आज के युग में भी उतने ही उपयोगी हैं. नियम छोड़ने की वजह से लाइफ स्टाइल डिजीज (lifestyle disease) हो रही हैं. अगर वही नियम अपनाएं तो सिर्फ बीमारी से नहीं बचेंगे बल्कि आप दीर्घायु भी होंगे.

भोजन बनाने के नियम
गीता में बताया गया है मनुष्य जैसा भोजन करता है वैसी ही उसकी प्रवृति होती है. यदि आप सात्विक भोजन करते हैं तो शांत प्रवृति होगी. तामसिक भोजन विष के समान, ये क्रोध-अनाचार बढ़ाता है. साथ ही खाना बनाते वक्त भी कुछ बातों का ध्यान रखने की खास जरूरत बताई गई है. जैसे शुद्ध रसोई में खाना बने. खाना पकाने और खाने वाला स्वच्छता का ध्यान रखें. हाथ धो कर खाना बनाएं.

आहार के नियम
आयुर्वेद में भी भोजन करने के कई खास नियम बताए गए हैं. भूख लगने पर ही खाएं. ज़रूरत से कम खाएं. आधा पेट ठोस चीजों से, 1/4 तरल और 1/4 खाली छोड़ें. सूर्यास्त के बाद गरिष्ठ (मुश्किल से पचने वाला) भोजन न करें. जूठा भोजन न करें, इससे आप बीमार हो सकते हैं. 3 घंटे पहले बना भोजन न करें. खाने के आधे घंटे बाद पानी पिएं, बीच में न पिएं. दिन में खाने के बाद लेफ्ट करवट से करीब 15 मिनट लेंटे. रात के भोजन के बाद टहलें.

भक्ति, योग, ध्यान के लिए है आवश्यक
भोजन के इस विषय पर पुराणों और आर्युर्वेद ने भोजन के संबंध में जो निर्देश दिए हैं, उनसे स्पष्ट होता है कि केवल स्वास्थ्य के लिए ही नहीं बल्कि भक्ति, योग, ध्यान और अध्यात्म के लिए भी भोजन एक महत्वपूर्ण विषय है.

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