2018 : किसान सक्रियता के नाम यह साल

राजनीतिक विश्लेषक भी मान रहे हैं देश के तीन बड़े हिंदी भाषी राज्यों में बड़ी भूमिका किसान आधारित मुद्दों की रही. इसे किसानों के एक राजनीतिक शक्ति के रूप में उबरने के तौर पर क्यों नहीं देखा जाना चाहिए.

2018 : किसान सक्रियता के नाम यह साल

सन 18 का साल भी गुज़रने को आ गया. परंपरा है कि मीडिया इस मौके पर देश की प्रमुख घटनाओं का लेखा जोखा पेश करता है. इस साल को पीछे पलट कर देखें तो देश के विभिन्न क्षेत्रों के लिए यह साल कुछ ज्यादा ही उतार चढ़ाव भरा रहा. पूरे साल की हर घटना को एक नज़र में देखना ज़रा मुश्किल काम है. इसीलिए उसे व्यवस्थित रूप से देखने समझने के लिए हम मोटे तौर पर चार पक्षों पर नज़र दौड़ा लेते हैं. ये हैं आर्थिक, सामाजिक, न्यायायिक और राजनीतिक क्षेत्र.

राजनीतिक क्षेत्र-
यह साल राजनीतिक रूप से खूब हलचल का था. कई राज्यों के विधानसभा चुनावों से पूरे साल राजनीतिक माहौल गरम रहा, लेकिन इस साल राजनीतिक रूप से जो सबसे बड़ी धमक रही वह यह थी कि करीब चार दशक बाद किसान संगठित रूप से एक राजनीतिक शक्ति बन कर उभरे, इस एक साल में करीब एक दर्जन किसान आंदोलन और मार्च देश के अलग अलग हिस्सों में होते दिखे. किसानों को महाराष्ट्र में लाइन बनाकर पूरे अनुशासन से चलते भी देखा गया और दिल्ली ग़ाज़ियाबाद बॉर्डर पर रोके जाने पर ट्रेक्टर लेकर बेरिकेड तोड़ने की कोशिश करते और पुलिस से भिड़ते भी देखा गया. साल का अंत होते होते 200 किसान संगठनों को एक साथ आकर देश की राजधानी में व्यवस्थित रूप से पूरे आंकड़ों के साथ अपनी मांगे रखते हुए कई दशकों से इस देश ने नहीं देखा था.

किसी भी लोकतंत्र के लिए विपक्ष का होना बहुत ज़रूरी है. यह साल देश में विपक्ष की वापसी का भी रहा. गुजरात चुनाव के बाद कर्नाटक और फिर साल के अंत में हुए तेलंगाना, मिजोरम, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनावों में जनता ने देश में विपक्ष को मजबूत बनाया.  राजनीतिक विश्लेषक भी मान रहे हैं देश के तीन बड़े हिंदी भाषी राज्यों में बड़ी भूमिका किसान आधारित मुद्दों की रही. इसे किसानों के एक राजनीतिक शक्ति के रूप में उबरने के तौर पर क्यों नहीं देखा जाना चाहिए.

आर्थिक क्षेत्र-
यह बात कई बार सिद्ध हो चुकी है कि मानव जीवन में आर्थिक पक्ष ही बाकी पक्षों को निर्धारित करता है. इसीलिए किसी देश की अर्थव्यवस्था की स्थिति से ही उस देश की पहचान बनती है. इस साल भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर भी काफी हलचल रही. दो साल पहले हुई नोटबंदी के बाद वापस आए पुराने नोटों की गिनती भी इसी साल ख़त्म हुई. दो साल तक नोट गिनने के बाद रिज़र्व बैंक ने देश को बताया कि अर्थव्यवस्था में मौजूद  लगभग सारी नकदी वापस आ गई. यह साल पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दामों के लिए भी सुर्खि़यों में रहा. वहीँ इसी साल डॉलर के मुकाबले रुपया सार्वकालिक रि‍कार्ड तोड़ते हुए 74.33 का आंकड़ा तक छू गया. क़र्ज़ लेकर विदेश भाग जाने वाले उद्योगपतियों की वजह से बैंकों की छवि को बड़ा नुकसान पहुंचा. इसका असर क्या पड़ा इसे अभी तो नापा तोला नहीं जा सकता लिहाजा उसे अगले साल के लिए छोड़ना ही बेहतर है.

यह साल कई बड़ी योजनाओं के एलानों का साल भी रहा. मसलन, इसी साल दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना की रूपरेखा पेश की गई. इसी बीच भारत ने अपने आकार के लिहाज़ से दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की सूची में फ्रांस को पछाड़ते हुए छठा स्थान हासिल किया. इन सबके बीच आर्थिक क्षेत्र में किसानों को उनकी उपज का वाजिब दाम देने का मसला इसी साल सुर्खियों में रहा.

न्यायायिक क्षेत्र-
न्यायायिक व्यवस्था ज़्यादातर लाइमलाइट से दूर रहती है, लेकिन 2018 की शुरुआत में ही सर्वोच्च न्यायालय के चार जज मीडिया के सामने आए.   इस साल सर्वोच्च न्यायालयों के सामने कई ऐसे मुक़दमे आए जिसकी वजह से कोर्ट की कार्यवाही और फैसलों में मीडिया और जनता की नज़र लगातार बनी रही. कई बार कोर्ट को देर रात अपने दरवाज़े खोलते देखा गया रातों रात कार्यवाही भी चली और तभी के तभी कई महत्वपूर्ण फैसले दिए गए. ऐसे ही रोचक मामलों में कर्नाटक चुनाव का भी मामला रहा. वहां सरकार बनाने की कवायद के दौरान राज्यपाल को 48 घंटे में शक्ति प्रदर्शन कराने का आदेश शामिल है. ऐसे ही राम मंदिर, सीबीआई, राफेल जैसे कई केसों की वजह से न्यायपालिका सुर्खि़यों में बनी रही. यह साल कुछ ऐतिहासिक अदालती फैसलों के लिए भी याद किया जाएगा जैसे इसी साल धारा 377 को रद्द करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया। इसी तरह कई धार्मिक स्थलों में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को हटा कर सुप्रीम कोर्ट ने सामाजिक स्तर के भी बड़े फैसले किए.

समाजिक क्षेत्र-
सामाजिक रूप से यह साल कई बड़े क्रांतिकारी आन्दोलनों और साहसी संघर्षों का साल रहा. महिलाओं के लिए सामाजिक स्तर पर कई बदलावों की कोशिश हुई. इसी साल दुनिया भर में चल रहा मीटू मूवमेंट भारत भी आ पहुंचा. मीडिया जगत, फिल्म जगत, राजनीति और कई क्षेत्रों से जुडी महिलाओं ने खुल कर अपने बुरे अनुभव और किस्से सामने रखे. महिलाओं को समाज के हर तबके से दोषियों के खिलाफ खड़े होने के लिए अपूर्व समर्थन इसी साल मिला. इसी के साथ तीन तलाक बिल, सबरीमाला मंदिर जैसे स्थानों में प्रवेश की अनुमति जैसे प्रगतिशील फैसलों के जरिए महिला सशक्तिकरण के लक्ष्य को मजबूती मिली. हालांकि सामाजिक सौहार्द के लिए यह साल उतना बढ़िया नहीं कहा जा सकता. कभी बच्चा चोरी के नाम पर तो कभी गौ हत्या के नाम पर मोब लिंचिंग की कई घटनाएं पूरे साल देश के अलग अलग हिस्सों में होती रहीं,

सबसे बड़ा और सबसे अच्छा सामाजिक बदलाव इस साल देश की आधी से ज्यादा आबादी यानी किसान को लेकर देखा गया. जो किसान सिर्फ गाँव तक सीमित था और जिस पर समाज के किसी भी तबके की नज़र नहीं थी. वो उठ कर शहरों में लाखों की तादाद में चलता हुआ आ गया. और उससे बड़ी बात यह हुई की किसानों पर शहरों ने ध्यान भी दिया और शहर के अलग अलग वर्ग के तबको मसलन डॉक्टर, इंजिनियर, वकील आदि जैसे कई पेशेवर और गैर पेशेवर जागरूक लोगों को किसानों के समर्थन में आकर खड़े होते हुए देखा गया. यानी राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक लिहाज़ से देश में इस साल की हलचल देखें तो कहा जा सकता है कि यह साल किसानों के नाम रहा.

(लेखिका, मैनेजमेंट टेक्नोलॉजी विशेषज्ञ और सोशल ऑन्त्रेप्रेनोर हैं)
(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं)