जयंती विशेष : आज 'नीरज' होते तो... क्या कहते?

जो कविता, शायरी, किताबों की दुनिया से दूर भी हैं, उन्हें भी बॉलीवुड ने नीरज के शब्दों का स्वाद बखूबी चखाया है...

जयंती विशेष : आज 'नीरज' होते तो... क्या कहते?

आज नीरज होते तो? क्या कहते नीरज? गोपाल दास 'नीरज' की जयंती पर उनके बेटे शशांक प्रभाकर से जब हमने ये सवाल पूछा तो उन्हें एक पल नहीं लगा गोपालदास नीरज को उद्धरण (quote) करने में....

आग लेकर हाथ में पगले! जलाता है किसे
जब न ये बस्ती रहेगी तू कहां रह जाएगा।

CAA-NRC और देश में मचे बवाल के बीच इन दिनों कविताओं और शायरी से दूर रहने वाले भी राहत इंदौरी और फैज़ को गूगल कर रहे हैं. उर्दू का तलफ़्फ़ुज़ भले छुट्टी पर हो, फैज़ की नज़्म. 'लाज़िम है कि हम भी देखेंगे' में चाहे 'लाज़िम है' का मतलब भी ना मालूम हो.. फिर भी 'हम देखेंगे' इन दिनों ट्रेंडिंग जुमला है.

राहत इंदौरी की शायरी अलग ही जोश भर रही है... 'किसी के बाप का हिंदोस्तान थोड़ी है...' ये कहने वाले खुद नहीं जानते कि किसके बाप को गरिया रहे हैं, लेकिन शशांक प्रभाकर का कहना है.. “नीरज जी की कविताएं मानव मूल्यों की कविताएं हैं. उनकी हर बात में इंसान की बात सबसे ऊपर होती हैं, लेकिन फर्क ये है कि नीरज की लेखनी से निकला इंसान को पुचकार दें तो वो उन्हें पढ़कर खड़ा हो जाता है, जबकि हिंदोस्तान थोड़ी है...पढ़-पढ़कर लोग हाथों में पत्थर और मन में उन्माद लिए भटक रहे हैं. नीरज इससे बिल्कुल उलट हैं'.

फिल्मों के माध्यम से नीरज को जानने वाले जानते हैं कि उनकी लेखनी का भाव ये है...

'बस यही अपराध मैं हर बार करता हूं... आदमी हूं आदमी से प्यार करता हूं'

जो कविता, शायरी, किताबों की दुनिया से दूर भी हैं, उन्हें भी बॉलीवुड ने नीरज के शब्दों का स्वाद बखूबी चखाया है...

ऐ भाई ज़रा देखकर चलो
आगे ही नहीं पीछे भी
दाएं ही नहीं बाएं भी
ऊपर ही नहीं नीचे भी
तू जहां आया है वो तेरा घर नहीं, गांव नहीं, गली नहीं, कूचा नहीं, रास्ता नहीं, बस्ती नहीं, दुनिया है
और प्यारे दुनिया ये सर्कस है

गोपालदास 'नीरज' के प्रशंसक और उनको करीब से जानने वाले राहुल सिंह आखिरी बार उनसे करीब 3 साल पहले मुंबई के प्रभा देवी में बने एक आडिटोरियम में उनसे मिले थे. गोपालदास 'नीरज' के सम्मान में आयोजित उस समारोह में पहले कई नए पुराने कवियों ने उनकी रचनाओं को पढ़ा और आखिरी में खुद नीरज जी ने मंच संभाला.

Neeraj
महाकवि गोपाल दास नीरज अपने पुत्र शशांक प्रभाकर के साथ...

3 साल पहले... यानी 90 का पड़ाव पार कर चुके नीरज क्या तब कमज़ोर नहीं रहे होंगे? इस सवाल के जवाब में राहुल का कहना है, ''उम्र शरीर को कमज़ोर बना सकती है. कवि की आत्मा के जूनून को कमज़ोर नहीं कर सकती''. वो जूनून नीरज जी में उस दिन भी पूरा ही था.

कुल शहर बदहवास है इस तेज़ धूप में
हर शख्स ज़िन्दा लाश है इस तेज़ धूप में।

हारे-थके मुसाफिरों आवाज़ उन्हें दो
जल की जिन्हें तलाश है इस तेज़ धूप में।

दुनिया के अम्नो-चैन के दुश्मन हैं वही तो
सब छांव जिनके पास है इस तेज़ धूप में।

राहुल मानते हैं कि नीरज आज भी प्रासंगिक हैं और हमेशा प्रासंगिक रहेंगे, कबीर की तरह. आज नीरज होते तो उनकी ये लाइनें आज के माहौल को बयां करती... आप ऐसे ही सोचें कि नीरज जी ने ये आज ही लिखी है...

अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए।
जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए।

जिसकी ख़ुशबू से महक जाए पड़ोसी का भी घर
फूल इस क़िस्म का हर सिम्त खिलाया जाए।

आग बहती है यहां गंगा में झेलम में भी
कोई बतलाए कहां जाके नहाया जाए।

प्यार का ख़ून हुआ क्यों ये समझने के लिए
हर अंधेरे को उजाले में बुलाया जाए।

मेरे दुख-दर्द का तुझ पर हो असर कुछ ऐसा
मैं रहूं भूखा तो तुझसे भी न खाया जाए।

जिस्म दो होके भी दिल एक हों अपने ऐसे
मेरा आंसू तेरी पलकों से उठाया जाए।

गीत उन्मन है, ग़ज़ल चुप है, रूबाई है दुखी
ऐसे माहौल में ‘नीरज’ को बुलाया जाए।

(लेखक पूजा मक्कड़ ज़ी न्यूज़ के दिल्‍ली ब्‍यूरो की एडिटर हैं)