तेल कीमतों में बढ़ोतरी की पूरी पड़ताल और भारत का गैसीकरण

पिछले 19 दिनों में ईंधन की कीमतें पूरे भारत में बढ़ी हैं. तमाम राज्यों में वसूले जाने वाले VAT दरों के आधार पर राज्यों में कीमतें अलग-अलग हैं.

तेल कीमतों में बढ़ोतरी की पूरी पड़ताल और भारत का गैसीकरण

पिछले 19 दिनों में ईंधन की कीमतें पूरे भारत में बढ़ी हैं. तमाम राज्यों में वसूले जाने वाले VAT दरों के आधार पर राज्यों में कीमतें अलग-अलग हैं. 26 जून, 2020 को राष्ट्रीय राजधानी में पेट्रोल की कीमत बढ़कर 80.13 रुपये प्रति लीटर हो गई, जबकि डीजल 80.19 रुपये प्रति लीटर पर चढ़ गया. मुंबई में पेट्रोल की कीमत 86.91 रुपये प्रति लीटर और डीजल की कीमत 78.51 रुपये प्रति लीटर है.

क्या तेल के दामों में बढ़ोतरी जायज है? घरेलू स्तर पर कीमतें क्यों बढ़ी हैं?

हां, ये बढ़ोतरी जायज है, क्योंकि भारत में मुख्य रूप से इस्तेमाल होने वाले बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत अप्रैल 2020 में $16 प्रति बैरल के निचले स्तर से लगभग 162% बढ़कर 19 जून, 2020 को लगभग $42 पर बंद हुई है. चूंकि घरेलू ईंधन की कीमतें, डिमांड और सप्लाई की कमान काफी हद तक बाजार से नियंत्रित होती हैं. ऐसी स्थिति में घरेलू ईंधन की कीमतों में लगभग 10-11% की बढ़ोतरी सामान्य बात है. इसके बावजूद मुद्दे से अनजान विपक्ष "फ्यूल पॉलिटिक्स" करने पर जुटा है.

हाल ही में ब्रेंट क्रूड की कीमतों में बढ़ोतरी के कई फैक्टर रहे हैं- इराक का उत्पादन घटाना, OPEC की अगुवाई करने वाले सऊदी अरब और रूस जैसे इसके सहयोगियों का मई में प्रति दिन 94 लाख बैरल तक उत्पादन में कटौती करना, अमेरिकी शेल ऑयल कुओं द्वारा ड्रिलिंग गिरकर 2 साल में कम होकर बमुश्किल 76,30,000 बैरल प्रति दिन पर पहुंचना, अमेरिका के कच्चे तेल के उत्पादन में 20 लाख बैरल प्रति दिन की गिरावट, चीन में डिमांड रिकवरी, जहां मई में औद्योगिक उत्पादन में 4.4% की ग्रोथ देखी गई. सिर्फ यही नहीं, संयुक्त राज्य अमेरिका में निश्चित रूप से खपत की मांग भी बढ़ी, जहां मई 2020 में खुदरा बिक्री में 17.7% की मजबूत ग्रोथ देखी गई. ये दर्शाती है कि उत्पादन को कम करने का प्रयास किया गया, जिसके कारण कीमतों में मजबूती आई. आपके लिए यहां यह जानना जरूरी है कि यदि डिमांड बढ़ेगी और उत्पादन कम होगा तो तेल की कीमतों में उछाल आएगी.

यहां ये बात ध्यान में रखना जरूरी है कि घरेलू स्तर पर ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी 82 दिन के लंबे अंतराल के बाद 7 जून, 2020 के बाद से शुरू हुई, जबकि इस बीच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें काफी हद तक बढ़ीं. ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) के लिए नेट ऑटो फ्यूल मार्केटिंग मार्जिन फिर से पॉजिटिव हो गया, जो कि 6 जून, 2020 को माइनस 1.28 रुपये प्रति लीटर से 0.90 प्रति लीटर पर आ गया. नेट ऑटो फ्यूल मार्केटिंग मार्जिन फिलहाल 90 पैसे प्रति लीटर पर आ गया है.

दूसरे शब्दों में कहें तो OMCs ने अभी सिर्फ उस भारी नुकसान की भरपाई करना शुरू किया है, जो उन्हें पिछले कुछ महीनों में हुआ था. इसलिए जो आलोचक ये आरोप लगा रहे हैं कि तेल कंपनियां जनता की परवाह किए बिना अपनी जेबें भरने में लगी हैं, वो इसे समझने में काफी गलती कर रहे हैं. देश में ईंधन की खुदरा बिक्री में इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन, भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन जैसी सरकारी कंपनियों और रिफाइनर्स का प्रभुत्व है, जो देश के सभी खुदरा आउटलेटों में से लगभग 90% के मालिक हैं. मार्च 2020 में वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें क्रैश होने पर इन तेल कंपनियों को भारी नुकसान उठाना पड़ा था. यह एक सच्चाई है कि भारत में ईंधन की कीमतें काफी हद तक बाजार से तय होती हैं, बावजूद इसके मार्च में लॉकडाउन के कारण एक्साइज ड्यूटी और रोड सेस में बढ़ोतरी का बोझ उपभोक्ताओं पर नहीं डाला गया था. बल्कि इन्हीं कंपनियों ने बेहतरीन जज्बा दिखाते हुए इस बोझ का वहन स्वयं किया था.

पेट्रोल और डीजल की कीमतें तय करने के लिए भारतीय तेल कंपनियां ट्रेड पैरिटी प्राइसिंग (TPP) पर विचार करती हैं. TPP में इंपोर्ट पैरिटी प्राइस (IPP) का 80% और एक्सपोर्ट पैरिटी प्राइस (EPP) का 20% हिस्सा होता है.

IPP उस कीमत को कहते हैं जो इंपोर्टर संबंधित भारतीय बंदरगाहों पर उत्पाद के वास्तविक आयात के मामले में चुकाता है जिसमें फ्री ऑन बोर्ड (FOB) प्राइस + ओशन फ्रेट + इंश्योरेंस + कस्टम ड्यूटी + पोर्ट ड्यूज आदि शामिल हैं. इसी तरह, EPP उस मूल्य का प्रतिनिधित्व करता है जो तेल कंपनियां पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात पर कमाती हैं. इसमें रिफाइंड उत्पादों के एक्सपोर्ट के अनुसार कच्चे तेल के ड्यूटी फ्री इंपोर्ट के लिए FOB प्राइस + एडवांस लाइसेंस बेनिफिट (ALB) शामिल हैं. कच्चे तेल की कस्टम ड्यूटी को खत्म करने के कारण ALB वर्तमान में शून्य है. सीधे मुद्दे की बात ये है कि अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतें अहम भूमिका तो निभाती हैं, साथ ही घरेलू ईंधन की कीमतों के लिए दूसरे कई फैक्टर भी जिम्मेदार होते हैं, जैसा कि ऊपर दिए गए फॉर्मूले से स्पष्ट है.

उदाहरण के लिए, अक्सर, बढ़िया गैसोलीन क्रैक (क्रैक या क्रैक स्प्रेड रिफाइंड प्रॉडक्ट और क्रूड ऑइल के बीच प्राइस में अंतर को कहते हैं) की वजह से भी घरेलू स्तर पर ईंधन की कीमतें बढ़ी रहती हैं, भले ही क्रूड ऑयल की कीमतों में तेज गिरावट ही क्यों न हो, जैसा जुलाई 2019 में भी हआ था. पिछली जुलाई में ब्रेंट क्रूड की कीमत 10.57% गिरी थी, जबकि मुंबई में पेट्रोल की कीमत उस महीने में 2.45% बढ़ी थी. अकेले अगस्त 2019 में, विश्व स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें 8.68% गिर गईं, जबकि घरेलू स्तर पर पेट्रोल की कीमतों में केवल 0.95% की गिरावट आई, क्योंकि गैसोलीन और डीजल क्रैक की कीमतें $4.5-$9 प्रति बैरल के बीच मजबूती से बढ़ गईं. "क्रैक", क्रूड ऑयल के तमाम 'कंपोनेंट प्रोडक्ट्स' को अलग करने की लागत के लिए एक इंडस्ट्री टर्म है. इन तमाम 'कंपोनेंट प्रोडक्ट्स' में प्रोपेन जैसी गैसें, हीटिंग फ्यूल, गैसोलीन, जेट फ्यूल जैसे हल्के आसुत, डीजल फ्यूल जैसे मध्यम आसुत और ग्रीस जैसे भारी आसुत शामिल हैं.

साफ है कि पेट्रोल और डीजल क्रैक्स भी अहम भूमिका निभाते हैं और ये जरूरी नहीं कि ग्लोबल क्रूड ऑयल की कीमतों में गिरावट से घरेलू मार्केट में भी उसी अनुपात में कीमतें घटेंगी. इसके उलट, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से भी घरेलू स्तर पर उसी अनुपात में ईंधन की कीमतें नहीं बढ़तीं. सैद्धांतिक रूप से, ब्रेंट क्रूड में हर $1/बैरल की गिरावट से उत्पाद की कीमतों में 0.45/लीटर की कमी आती है. हालांकि, रुपये-डॉलर एक्सचेंज रेट, सेस, रिफाइनिंग कॉस्ट, इंपोर्ट ड्यूटी, शिपिंग चार्ज, फ्रेट रेट, डीलर कमीशन और प्रॉफिट मार्जिन जैसी अन्य चीजें गतिशील रहती हैं और वास्तविक दुनिया में कभी भी स्थिर नहीं रहतीं. इससे ये समझ में आता है कि वैश्विक कच्चे तेल और घरेलू स्तर पर ईंधन की कीमतों के बीच एक सीधा "कारण और प्रभाव" संबंध हो सकता है, लेकिन निश्चित रूप से ये एक ही प्रकार और मात्रा में नहीं हो सकता. इसीलिए, यह जरूरी नहीं कि जिस अनुपात में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्रूड ऑयल की कीमतों में गिरावट हो, उसी रफ्तार से घरेलू स्तर पर भी कीमतों में गिरावट हो.

हाल ही में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने मांग की थी कि ईंधन की कीमतों में ताजा बढ़ोतरी को वापस लिया जाए. पाखंड तो कांग्रेस के डीएनए में है. विडंबना ये है कि कांग्रेस शासित राज्य VAT बढ़ाने के मामले में सबसे आगे रहे हैं. उदाहरण के लिए, राजस्थान में अशोक गहलोत सरकार ने पेट्रोल पर लॉकडाउन से पहले के 30% VAT को वर्तमान में 38% कर दिया है. ऐसे ही डीजल पर VAT 22% से 28% तक बढ़ा दिया गया है. राजनीति को एक तरफ रखते हुए ये नतीजा निकालना सही होगा कि अब जब ग्लोबल क्रूड ऑयल (ब्रेंट) की कीमत में मार्च 2020 से 19 जून 2020 के बीच में 162% से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है, ऐसे में घरेलू बाजार में उसी अनुपात में कीमतें बढ़ाने की उम्मीद करना तर्कसंगत है, क्योंकि भारत अपने कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 83% हिस्सा इंपोर्ट करता है.

OPEC और उसके सहयोगी, जून में प्रति दिन 97 लाख बैरल तक क्रूड आउटपुट में कटौती कर रहे हैं और जुलाई में भी इतनी ही मात्रा में कटौती होगी. अगस्त से दिसंबर 2020 तक OPEC और उसके सहयोगी हर महीने क्रूड आउटपुट में 77 लाख बैरल प्रतिदिन की कटौती करेंगे. इराक, नाइजीरिया, गैबन, अंगोला और कजाकिस्तान जैसे देशों से कहा गया है कि वे या तो मई 2020 में किए गए ओवरप्रोडक्शन की भरपाई करें या संशोधित योजनाएं पेश करें, ताकि सऊदी अरब द्वारा लागू किए जाने वाली उत्पादन कटौती का बेहतर और सख्त अनुपालन सुनिश्चित किया जा सके. मई 2020 में बढ़ती मांग के कारण चाइनीज क्रूड ऑयल उत्पादन में 8.6% की बढ़त ये इशारा करती है कि जब तक दुनिया में और देशों में, कोरोना वायरस की दूसरी लहर की वजह से लॉकडाउन नहीं लगता जो कि वैश्विक और घरेलू मांग को खत्म कर सकता है, तब तक तेल की कीमतें फिलहाल के लिए मजबूत रहेंगी. बेशक, इतिहास से पता चलता है कि सऊदी अरब और रूस ने वास्तव में बहुत लंबे समय के लिए कभी एक साथ काम नहीं किया है जिसमें वो अपने से लगाई गई उत्पादन कटौती के मुताबिक चलें. अगर ऐसा 2020 में फिर से होता है और रूस, OPEC से अलग हो जाता है, तो वैश्विक तेल बाजार में फिर से "तेल की भरमार" हो सकती है. यहां आपके लिए यह जानना भी जरूरी है कि रूस, OPEC का सदस्य नहीं है, बल्कि दोनों के बीच एक समझौता है, जिसके अंतर्गत रूस तेल का ज्यादा उत्पादन नहीं कर पाता. यदि रूस ये संधि तोड़ देगा तो फिर से वह तेल का उत्पादन ज्यादा करने लगेगा. यदि ऐसा हुआ तब अंतरराष्ट्रीय और घरेलू कीमतों में भारी गिरावट आ सकती है.  हालांकि, ओवरसप्लाई या तेल की भरमार जल्द होने की कोई संभावना नहीं है. सभी गणित और तर्क को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि आने वाले कुछ समय तक ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमत 35-55 डॉलर प्रति बैरल की रेंज में रहने की संभावना है.

यहां इस बात का जिक्र करने की आवश्यकता नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की तेल अर्थव्यवस्था पहले की तुलना में कहीं अधिक लचीली हो गई है और ऐसी खबर है कि तेल आयात पर भारत की निर्भरता में भारी गिरावट आने की उम्मीद है. ऐसा इसलिए, क्योंकि गैसीकरण पर तेजी से जोर दिया जा रहा है और भारत को डॉलर गटकने वाली तेल अर्थव्यवस्था से धरती के ज्यादा अनुकूल गैस अर्थव्यवस्था में बदला गया है. दूरदर्शी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत, ऊर्जा के तमाम विकल्पों के रूप में प्राकृतिक गैस की खपत को 2.5x तक बढ़ाने की योजना बना रहा है, जो 6.2% के मौजूदा स्तर से 2030 तक 15% तक हो जाएगी. अनुमानों से पता चलता है कि गैस की खपत रोजाना लगभग 160 मिलियन मीट्रिक स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर्स पर डे (mmscmd) के वर्तमान स्तर से 600 mmscmd तक बढ़नी चाहिए. अगले दशक में देश के गैस इंफ्रास्ट्रक्चर पर 60 अरब डॉलर से ज्यादा के निवेश की उम्मीद है.

मोदी सरकार की गैस हब बनाने की योजना GAIL के विभाजन के बाद आने की संभावना है. सरकार GAIL के गैस ट्रांसमिशन और मार्केटिंग बिजनेस को अलग करने की योजना पर विचार कर रही है. पिछले 6 वर्षों में तमाम उपाय जैसे घरेलू गैस की कीमतों को अंतरराष्ट्रीय बाजारों से जोड़ना, इंडियन गैस एक्सचेंज (IGX) विकसित करना, जिसके अगले सप्ताह से ऑपरेशंस शुरू करने की उम्मीद है और 'प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना' लागू करना जैसे अन्य कदमों से देश का एनर्जी इकोसिस्टम बदल रहा है.

वर्तमान में, देश भर में CNG स्टेशनों की संख्या 1,470 है (2030 तक 10,000 से अधिक CNG स्टेशनों तक जाने की उम्मीद है) और 174 जिलों में सिटी गैस डिस्ट्रिब्यूशन (CGD) के लिए काम चल रहा है. 10वें CGD राउंड के सफलतापूर्वक पूरा होने के बाद पाइप्ड नेचुरल गैस (PNG) कनेक्शन वाले परिवारों की संख्या दो करोड़ को पार करने की उम्मीद है. इस राउंड का मकसद देश के 53% इलाके में रह रही आबादी के 70% हिस्से तक CGD कवरेज का विस्तार करना है. इसमें कोई शक नहीं कि एक तेल अर्थव्यवस्था से गैस अर्थव्यवस्था बनने का सफर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के "पीपल, प्लैनट और प्रॉफिट" के बीच बढ़िया संतुलन बनाए रखने के आह्वान के साथ शानदार ढंग से फिट बैठता है.

(डिस्क्लेमर: इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

(संजू वर्मा एक जानीमानी अर्थशास्त्री, BJP मुंबई की मुख्य प्रवक्ता और बेस्टसेलर "ट्रुथ एंड डेयर--दि मोदी डायनामिक" की लेखिका हैं.)