लोकसभा चुनाव: घोषणापत्रों को कैसे जांचें

कांग्रेस का घोषणापत्र जारी हो गया है. इस मामले में कांग्रेस ने बढ़त ले ली है. अब यह तय है कि चुनावी भाषणों में कांग्रेस का घोषणापत्र छाया रहेगा.

लोकसभा चुनाव: घोषणापत्रों को कैसे जांचें

लोकसभा चुनाव के पहले चरण की वोटिंग शुरू होने में हफ्ताभर बचा है. चुनाव प्रचार चरम पर है, लेकिन अब तक तय नहीं हो पाया कि यह चुनाव होगा किन मुद्दों पर. इसी बीच मंगलवार को मुख्य विपक्षी दल यानी कांग्रेस ने जरूर अपना घोषणापत्र जारी करके ऐलान कर दिया कि इसबार का चुनाव जीतकर कांग्रेस जनता के लिए क्या-क्या काम करेगी. अगर सत्तादल और दूसरे दलों के घोषणापत्र भी आ जाते तो यह तय करने में सहूलियत हो जाती कि इस बार का चुनाव किन मुद्दों पर होगा. हालांकि इस बार के चुनाव में वायदे करने का मसला इतना नाजुक हो गया है कि ज्यादातर दल आखिर-आखिर तक अपने घोषणपत्र जारी करने से बचते दिख रहे हैं. चुनाव आयोग की तरफ से एक बंदिश है कि वोटिंग शुरू होने के दो दिन पहले तक ही कोई दल अपना घोषणापत्र जारी कर सकता है. उसके बाद कोई भी दल यह काम नहीं कर सकता. 
बहरहाल कांग्रेस का घोषणापत्र जारी हो गया है. इस मामले में कांग्रेस ने बढ़त ले ली है. अब यह तय है कि चुनावी भाषणों में कांग्रेस का घोषणापत्र छाया रहेगा.

कितनी अहमियत है चुनावी घोषणाओं की
चुनावी उद्यम में घोषणापत्रों से ज्यादा अहमियत और किस चीज़ की हो सकती है. यही तो वह दस्तावेज है जो भविष्य के पांच साल का एजेंडा बताता है. अब ये अलग बात है कि चुनावी घोषणाओं की व्यावहारिकता को जांचने परखने का कोई विश्वसनीय पैमाना आम जनता के पास नहीं होता. अब तक के चलन के मुताबिक इस मामले में राजनीतिक दलों और उनके नेताओं की साख ही काम आती है. हालांकि, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के युग में इसका इंतजाम जरूर हो चुका है. प्रौद्योगिकी की भाषा में इसे लक्ष्य प्रबंधन कहते हैं. प्रबंधन प्रौद्योगिकी में आज भरा पूरा पाठ उपलब्ध है, जो बताता है कि किसी लक्ष्य की व्यावहार्यता जांची कैसे जाती है. लक्ष्य प्रबंधन के इस पाठ में विद्वानों ने पांच नुक्तों की पहचान की है.

कांग्रेस का घोषणापत्र हमारे सामने है. अगर उसकी मुख्य बातों की जांच पडताल करना हो, तो लक्ष्य प्रबंधन के पांच मुख्य नुक्तों को जान लेने के बाद बड़ी सहूलियत हो जाएगी. अभी दूसरे दलों के घोषणापत्र भी आने बाकी हैं. लिहाजा उन्हें जांचने के लिए भी यह पैमाना काम आएगा. बहरहाल प्रबंधन के पाठयक्रम में इस पैमाने को स्मार्ट गोल कहते हैं. यहां स्मार्ट शब्द अंग्रेजी के पांच अक्षरों से बना परिवर्णी शब्द है. पांच अक्षरों वाले स्मार्ट का पहला अक्षर है 'एस' यानी स्पेसिफिक, 'एम' से मेजरेबल, 'ए' से अचीवेबल, 'आर' से रिलाएबल और 'टी' से टाइम बाउंड. 

क्या हैं ये पांच नुक्ते 
लक्ष्य प्रबंधन का पहले पाठ के तहत लक्ष्य को स्पेसिफिक या विशिष्ट होना चाहिए. यानी लक्ष्य या घोषणा स्पष्ट रूप से परिभाषित और किसी एक दिशा में केन्द्रित हो. जो लक्ष्य तय किए गए हैं, उनसे स्पष्ट रूप से क्या परिणाम मिलेंगे, इसकी जानकारी पहले से दी जाए.
 
दूसरी जरुरत है किसी लक्ष्य का मेजरेबल होना यानी उस लक्ष्य से मिलने वाले लाभ की नाप तौल हो सके. क्योंकि बाद में यह देखने की जरूरत पड़ती है कि अगर वह लक्ष्य हासिल हुआ तो कितनी मात्रा में हासिल हो पाया. आंकड़ों और शोधपरक तथ्यों के साथ जब कोई लक्ष्य बनाया जाता है तब उसकी नाप तौल आसान हो जाती है. लक्ष्य का नापतोल के लायक होना आजकल इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि अब यह विवाद होने लगा है कि लक्ष्य हासिल हुआ या नहीं. इस तरह से कांग्रेस की घोषणाओं को अभी से जांच लिया जाना चाहिए कि वे सारी घोषणाएं नापतोल के पैमाने पर खरी हैं या नहीं.
तीसरी बात अचीवेबल की है. यानी जो लक्ष्य बनाया गया है वह हासिल होने लायक है या नहीं, इसका विश्लेषण. बहुत सी बाते हवा-हवाई होती हैं. इसीलिए असीमानंद या परमानंद की प्राप्ति जैसे काल्पनिक लक्ष्यों को आधुनिक प्रबंधन प्रौद्यागिकी कतई स्वीकार नहीं करती. इसीलिए शुरू में ही पुराने अनुभवों, मौजूदा आर्थिक क्षमता और सामजिक स्थितियों का विश्लेषण जरूरी होता है.

चौथी बात लक्ष्य के रिलाएबल होने की है. यानी लक्ष्य को दीर्घकालिक दृष्टि से जांच परख लिया गया हो. जिसे बदलती परिस्थितियों को ध्यान में रख कर बनाया गया हो. बहुत से लक्ष्य पहली नज़र में हासिल होने लायक तो लगते हैं, लेकिन संसाधनों की उपलब्‍धब्धता और परिस्थितियों की प्रतिकूलता के कारण विश्वसनीय नहीं लगते. ऐसा न हो कि किसी एक क्षेत्र में समय के साथ बदलाव आते ही तय किया गया लक्ष्य हासिल होने लायक ना बचे.

लक्ष्य प्रबंधन का पांचवा नुक्ता है समयबद्धता
किसी भी लक्ष्य का टाइम बाउंड यानी समयबद्ध होना बहुत जरूरी है. वक्त पर काम पूरा न होना एक तरह से काम का नहीं होना ही है. खासतौर पर किसी सरकार का कार्यकाल अगर पांच साल तय है, तो उसके लक्ष्य पांच साल के भीतर ही पूरे होने का आश्वासन होना चाहिए. चुनावी घोषणापत्रों के मामले में तो इस नुक्ते को आजकल गौर से देखा जाना चाहिए कि कोई राजनीतिक दल अपने कार्यकाल के आगे तक का लक्ष्य तो घोषित नहीं कर रहा है. चुनावी घोषणाओं के मामले में दस-दस या बीस-बीस साल के लक्ष्यों को इसीलिए लक्ष्य नहीं माना जाता, बल्कि उसे मुहिम या मिशन कहा जाता है. हालांकि मिशन के लिए भी निश्चित समय के एलान की जरूरत पड़ती है. वरना वह घोषणा सिर्फ दृष्टि या विज़न बनकर रह जाती है. गौरतलब है कि विज़न में समयबद्धता नहीं होती.

क्या है कांग्रेस के घोषणापत्र में
कांग्रेस के घोषणापत्र में मुख्य रूप से पांच क्षेत्रों में काम करने के लक्ष्य हैं। इनमें गरीबी, रोजगार, किसान की बदहाली पर निशाना है और शिक्षा और स्वास्थ्य पर गौर है. गरीबी पर निशाने के लिए न्यूनतम आय योजना बनाई गई है. इसे संक्षेप में न्याय नाम दिया गया है. इसके तहत, देश के 5 करोड़ गरीब परिवारों को हर साल 72 हजार रूपए देने की योजना है. रोज़गार के मोर्चे पर 22 लाख खाली पड़े सरकारी पदों पर भर्ती का काम निपटाने का लक्ष्य है. देश की ग्राम पंचायतों में दस लाख नए पद सृजित करने का लक्ष्य भी रोज़गार बढ़ाने के लिए है. किसानों के लिए अलग से बजट का निर्धारण है. मनरेगा में कम से कम 100 दिन काम देने के प्रावधान को बढ़ा कर 150 दिन करने की योजना है. ग्रामीण क्षेत्रों में कोल्ड स्टोरेज, किसानों के कर्ज न चुका पाने के मामलों को आपराधिक श्रेणी से हटाकर दीवानी मामले माने जाने की व्यवस्था है. शिक्षा पर कम से कम जीडीपी का छह फीसद खर्च करने की योजना है. इलाज के इंतजाम के लिए बीमा कंपनियों से बीमा करवाने की बजाए देश में सरकारी स्वास्थ्य सेवा को बेहतर करने का लक्ष्य है. इसके अलावा 33 फीसद आरक्षण के जरिए महिला सशक्तिकरण, पर्यावरण, राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुददे कांग्रेस के घोषणापत्र में प्रमुखता से रखे गए हैं.

मीडिया में कांग्रेस के घोषणापत्र पर बहस शुरू हो चुकी है. सत्तादल भी इस दस्तावेज के असर को कम करने की मुहिम पर लग गया है. इसमें भी किसी को कोई शक नहीं होना चाहिए कि सत्तादल और दूसरे विपक्षी दलों के घोषणापत्र भी कांग्रेस जैसे बड़े एलानों से भरे हुए आएंगे. बस सवाल यही रहेगा कि घोषणा पत्रों की व्यवहारिकता जांचने के लिए जनता और मीडिया के पास पैमाना क्या है?

गौरतलब है कि देश में इस समय शिक्षित बेरोजगारों की भारी तादाद है. यानी देश में शिक्षितों की कोई कमी नहीं है. लिहाजा ये शिक्षित लोग लक्ष्य प्रबंधन के नुक्तों के आधार पर यह तो जांच ही सकते हैं कि किस दल की घोषणाओं में देश की वास्तविक समस्याओं को निपटाने की योजना है.

(लेखिका, मैनेजमेंट टेक्नोलॉजी विशेषज्ञ और सोशल ऑन्त्रेप्रेनोर हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी हैं)