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श्रद्धांजलि अन्नपूर्णा देवी: मैहर के सुरबहार का यूं खामोश हो जाना

अन्नपूर्णा देवी बाबा की बेटी से ज्यादा मां शारदा की वरद् पुत्री थीं. संगीत जगत में उनकी ख्याति सुरबहार की साधक के रूप में हुआ.

श्रद्धांजलि अन्नपूर्णा देवी: मैहर के सुरबहार का यूं खामोश हो जाना

इन दिनों मां शारदा की पवित्र नगरी मैहर में भक्तिभाव का समागम है. मां शारदा ज्ञान की देवी हैं, वे वीणावादिनी संगीत की देवी भी हैं. इसी नवदुर्गा में ही बाबा अलाउद्दीन खां साहब की बेटी अन्नपूर्णा देवी के निधन की खबर आई. बाबा मां शारदा के वैसे ही आराधक थे जैसे कि उस्ताद बिस्मिल्ला खां साहब बाबा विश्वनाथ के. सबुहो बनारस उस्ताद की सहनाई की गूंज के साथ शुरू होती थी तो मैहर में माई का पट बाबा के सरोद की झंकार के साथ खुलता था. कितना अद्भुत प्रसंग है, दो मुसलमान एक मां भगवती का आराधक दूसरा भूतभावन भगवान भोलेनाथ का भक्त. तुलसी ने लिखा- भवानी शंकरौ वंदे श्रद्धा विश्वास रूपिणौ.. भारतेंदुजी इन्हीं के लिए लिख गए- इन मुसलमान हरिजनन पर कोटिक हिंदू वारिए...

अन्नपूर्णा देवी बाबा की बेटी से ज्यादा मां शारदा की वरद् पुत्री थीं. संगीत जगत में उनकी ख्याति सुरबहार की साधक के रूप में हुआ. वे बाबा की तीसरे नंबर की बेटी रोशनआरा थीं. बाबा के पटु शिष्य पंडित रविशंकर की अर्धांगिनी बनने के साथ अन्नपूर्णा देवी हो गईं. इसे संयोग कह सकते हैं या मां भगवती की कृपा कि अन्नपूर्णा देवी का जन्म मैहर में चैत्र नवरात्रि पखवाड़े में 23 अप्रैल 1927 में हुआ और निधन शारदेय नवरात्रि में इसी 13 अक्टूबर को सो इसीलिए मैं मानता हूँ कि वे मां शारदा की वरद्पुत्री थीं.

बाबा अलाउद्दीन जन्मे तो पश्चिम बंगाल के किसी गाँव में थे पर परम संगीत साधक मैहर राजा ब्रजनाथ सिंह के आग्रह पर यहां आकर जो रमे सो यहीं के होकर रह गए. कहते हैं यहाँ उन्होंने मां भगवती के अलौकिक रूप की अनुभूति की व उन्हें वरदान मिला कि वे जिस वस्तु को भी छू देंगे वह संगीतमय साज बन जाएगा. इस जनश्रुति की सत्यता अपने-अपने विश्वास का विषय है पर यह तथ्य है कि बंदूक की नाल से उन्होंने एक अद्भुत वाद्ययंत्र का आविष्कार किया जिसे संगीत जगत नलतरंग के नाम से जानता है. उन्होंने एक दुर्लभ तंतुवाद्य चंद्रसारंग का भी आविष्कार यहीं किया. उनका मैहरबैंड उनके रहते विश्वभर में अतुलनीय रहा. 200 से ज्यादा राग रागिनियों का संयोजन किया. बाबा संगीत के वैज्ञानिक थे.

अन्नपूर्णा देवी बहनों में तीसरे नंबर की थीं, चौथे नंबर के उनके भाई अली अकबर खान थे जिन्होंने बाद में सरोद वादक के रूप में विश्वभर में मैहर और बाबा की कीर्तिपताका को फहराया. अन्नपूर्णा देवी की संगीत साधना का एक दिलचस्प किस्सा है जो उनके भतीजे राजेश अली खान ने बताया था.

दरअसल 11दिसंबर 2012 को जब पं.रविशंकर जी का निधन हुआ तो उनकी स्मृतियों को सहेजने के लिए मैहर जाना हुआ. उन दिनों मैं सतना से निकलने वाले एक अखबार का संपादन कर रहा था. बाबा की तीन पुत्रियाँ थीं- शाजिरा, जहाँआरा और रोशनआरा. शारिजा का निधन बाल्यावस्था में हो गया था. जहाँआरा को तानपूरे में महारत थी. वे बाबा की संगत भी देती थीं. बाबा ने जहाँआरा का एक पारंपरिक मुसलमान परिवार में विवाह कर दिया. जहाँआरा के ससुराल वालों को संगीत की जरा भी समझ नहीं थी सो एक दिन उनके तानपूरे को चूल्हे में जला दिया. संवेदनशील बाबा इस घटना से इतने आहत हुए कि तय किया कि अब दूसरी बेटी को संगीत नहीं सिखाएंगें. पर एक दिन उन्होंने देखा कि रोशनआरा अपने भाई अकबर अली को संगीत सिखा रही है. रोशनआरा ने अब तक संगीत को अपने पिता से सुन व रियाज देखकर ही सीखा था. बाबा उसकी लगन को देखकर पिघल गए और विधिवत शिक्षा देने लगे. बाबा ने अपनी इस बेटी को सुरबहार में सिद्धहस्त बनाया.

रविशंकर के मैहर आने और रोशनआरा के अन्नपूर्णा देवी बनने की कथा भी कम दिलचस्प नहीं है. इनके प्रणय प्रसंग और फिर गृहस्थ जीवन में महात्वाकांक्षा को लेकर जो द्वंद्व हुआ ऋषिकेश मुखर्जी ने अपनी प्राख्यात फिल्म "अभिमान" का विषय यहीं से लिया. यह फिल्म सन् 73 में आई तब रविशंकर शिखर तक पहुँच चुके थे. सत्यजीत रे की फिल्मों समेत कई फिल्मों में संगीत दे चुके थे. अन्नपूर्णा देवी की ख्याति भी समानांतर बढ़ रही थी. संगीत सभाओं में उनकी मांग ज्यादा होने लगी. यहीं से अहम का टकराव हुआ जिसकी परिणति संबंध-विच्छेद के रूप में हुई. फिल्म में रविशंकर के किरदार को सुबीर के नाम से अमिताभ बच्चन और अन्नपूर्णा देवी के किरदार को उमा के नाम से जया बच्चन ने निर्वाह किया. हसरत जयपुरी के गीत और सचिन देव बर्मन के संगीत ने इस फिल्म को इतना भावप्रवण बना दिया कि जिसने भी देखा वह झनझना गया. अलबत्ता यह बात अलग है कि कम लोग ही इस तथ्य को जानते हैं कि फिल्म का कथ्य हूबहू वही है जो पंडित रविशंकर और अन्नपूर्णा देवी के बीच घटा.

बहरहाल बाबा का वास्ता रविशंकर से उनके बड़े भाई और उस समय के प्रख्यात नृत्य संयोजक उदयशंकर की वजह से पड़ा. बाबा 1935 में उदयशंकर के बैले ट्रुप के साथ यूरोप की सफल संगीतयात्रा की थी. उन्होंने ही बाबा उस्ताद अलाउद्दीन खां साहब को रविशंकर को अपना शिष्य बनाने के लिए राजी किया. 35-36 में ही रविशंकर जी बनारस छोड़कर मैहर आ गए. फिर यहां उनकी सितार साधना शुरू हुई. तबतक अन्नपूर्णा जी सुरबहार में सिद्धहस्त हो चुकीं थीं और बाबा के साथ संगीत सभाओं में जाना शुरू कर दिया था. बताते हैं कि अन्नपूर्णा अपनी देखरेख में रविशंकर को रियाज कराती थीं. किशोरवय में दोनों के बीच आकर्षण बढ़ा. तब अन्नपूर्णा जी की उम्र 14-15 वर्ष की रही होगी. दोनों के प्रेमप्रसंग से बाबा नाराज थे, वे नहीं चाहते थे कि यह संबंध हो क्योंकि कि वे अपनी सादगी से रविशंकर के अग्रज उदयशंकर की चमक की बराबरी का नहीं मानते थे. इधर रविशंकर इतने दीवाने हो चुके थे कि मैहर के गली-कूचों में इसकी चर्चा आम हो चुकी थी.

खबर राजा बृजनाथ सिंह तक पहुँची. उन्होंने बाबा को इसके लिए मनाया और अंततः मैहर की मां शारदा को साक्षी मानकर यह विवाह हुआ. रोशनआरा को अन्नपूर्णा देवी का नाम राजा बृजनाथ सिंह ने ही दिया. यह विवाह 1941 में हुआ. बाबा के शिष्य रहे सितार वादक शिवबालक तिवारी बताते हैं कि बाबा चाहते थे कि रविशंकर और अन्नपूर्णा दोनों यहीं मैहर में ही बस जाएं और उनकी परंपरा को आगे बढ़ाएं. दोनों का घर बसाने के लिए एक जमीन का भी इंतजाम कर लिया था क्योंकि वे रविशंकर को अपना उत्तराधिकारी मान चुके थे. लेकिन रविशंकर को मुंबई की चकाचौंध अपनी ओर खींच रही थी. वे अपने भाई उदयशंकर के कलावैभव से परिचित हो चुके थे. और अंततः 1944 में रविशंकर मैहर छोड़कर अन्नपूर्णा देवी के साथ मुंबई पहुंच गए.

मुंबई और विदेश भ्रमण करते हुए पंडित रविशंकर का दाम्पत्य जीवन 1962 तक चला. इस बीच इनकी कथा ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्म अभिमान की तरह ही रही. अभिमान की उमा संगीत सभाओं को छोड़कर अवसाद में चली जाती है और गर्भपात होता है. इधर अन्नपूर्णा और रविशंकर के प्रणय के प्रतिफल पुत्र शुभो की कुछ दिन बाद मृत्यु हो जाती है. रविशंकर संगीत के आकाश में ध्रुवतारा बन जाते हैं और इधर अन्नपूर्णा देवी संगीत के सार्वजनिक कार्यक्रमों को छोड़कर स्वयं को संगीत शिक्षक के रूप में केंद्रित कर लेती हैं. अपने ही शिष्य ऋषिकुमार पंड्या के साथ दुबारा घर बसाती हैं. पंड्या भी 2013 में स्वर्गवासी हो जाते हैं. शेष बचती हैं स्मृतियां उन्हीं को सहेजे हुए अन्नपूर्णा देवी भी चली जाती हैं..शायद मां शारदा के लोक..आखिर उनकी वरद्पुत्री जो थीं.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और टिप्पणीकार हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)