इस ख़ामोशी का खामियाज़ा सबको भुगतना पड़ेगा!
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इस ख़ामोशी का खामियाज़ा सबको भुगतना पड़ेगा!

देश में लगातार ऐसी घटनाएं, वारदातें हो रही हैं जो बेचैन कर रही हैं. बेचैनी लोगों की मुर्दा शांति से भर जाने की है. बेचैनी लोगों के तमाशबीन हो जाने की है. बेचैनी हमारे आपके खामोश रहने की है.

इस ख़ामोशी का खामियाज़ा सबको भुगतना पड़ेगा!

सबसे ख़तरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना
सबकुछ सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर आना

 

अवतार सिंह पाश की कविता के अंश बार-बार ज़हन में आ रहे हैं. सोच रही हूं कि क्या हम वाकई मर गए हैं. सवाल ये भी आ रहा ज़हन में कि ज़रूरी तो नहीं कि जो सांस ले रहे हों वो ज़िंदा भी हों. उलझ इसलिए भी रही हूं क्योंकि देश में लगातार ऐसी घटनाएं, वारदातें हो रही हैं जो बेचैन कर रही हैं. बेचैनी लोगों की मुर्दा शांति से भर जाने की है. बेचैनी लोगों के तमाशबीन हो जाने की है. बेचैनी हमारे आपके खामोश रहने की है. सोशल मीडिया पर एक वीडियो तैर रहा है. वीडियो इलाहाबाद का है जो बेहद ख़ौफ़नाक़ है. ज़रा सी बात पर कुछ गुंडों ने एलएलबी के दलित छात्र दिलीप की बेरहमी से पिटाई की, बाद में अस्पताल में उसकी मौत हो गई. हत्या की वजह जानकर समझ नहीं रहा है कि किस तरह की प्रतिक्रिया दूं. दिलीप अपने साथियों के साथ एक रेस्टोरेंट में खाना खाने गए थे जहां उनका पैर वहां आए लोगों से छू गया. जो बात एक सॉरी कहने से ख़त्म हो सकती थी वो बात दिलीप की हत्या पर खत्म हुई.

दिलीप को जिस बेरहमी से क़त्ल किया गया वो सिहराने वाला है. निढाल पड़े दिलीप को आरोपी रॉड, डंडों, ईटों से पीटते रहे. दिलीप का शरीर निर्जीव हालात में पड़ा था लेकिन आरोपियों का गुस्सा कम होने का नाम ही नहीं ले रहा था. पूरी घटना सीसीटीवी में क़ैद हुई और कुछ लोगों ने इसका वीडियो भी बनाया है. वीडियो बनाने वाले लगातार पुलिस को इल्ज़ाम दे रहे थे कि पुलिस समय पर नहीं आएगी, जब वो युवक मर जाएगा तब आएगी. लेकिन वीडियो बनाने वाले भी एक तरह से दिलीप की हत्या का ही इंतज़ार कर रहे थे. वो तमाशबीन थे. गर लोगों ने मिलकर दिलीप को बचाने की कोशिश की होती तो एक नौजवान यूं मर न जाता. सड़क के किनारे गुंडों ने दिलीप को बेरहमी से पीटा और लोग बाजू से निकलते गए. किसी को कोई फर्क़ ही नहीं पड़ा. लोग ऐसे निकलते गए कि कुछ नज़र ही नहीं आ रहा है.

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दलित छात्र दिलीप कुमार की हत्या के आरोप में होटल संचालक समेत कुछ लोगों को गिरफ्तार किया गया है. लेकिन मुख्य आरोपी जोटीटी है वह फ़रार है. शायद वह भी गिरफ्त में आ जाएगा, लेकिन तब क्या दिलीप वापस अपनी ज़िंदगी हासिल कर पाएगा. नहीं वो चला गया और लोगों ने उसे तमाशबीन बनकर जाने दिया. जाने तो अंकित सक्सेना, जुनैद को भी दिया गया. क्योंकि भीड़ में से किसी ने इन्हें बचाने की कोशिश नहीं की. जुनैद एक भरी ट्रेन में क़त्ल कर दिया गया. बात सिर्फ़ सीट को लेकर बढ़ी थी जो एक मौत पर खत्म हुई.अंकित सक्सेना दिल्ली जैसे शहर में सरेआम क़त्ल कर दिया गया और लोग तमाशबीन बने रहे. दिलवालों के शहर में कोई एक शख्स आगे नहीं आया जो अंकित को बचाने की कोशिश करता.

सड़क किनारे एक वहशी मानसिक रोगी युवती का बलात्कार करता है और कुछ एक इस घटना का भी वीडियो बनाते हैं. फुटपाथ पर हो रहे बलात्कार को देखकर लोग आंखें फेर गुज़र जाते हैं. किसी को कोई फर्क़ ही नहीं पड़ता है जैसे कुछ हुआ ही नहीं. हां कुछ नहीं हुआ क्योंकि वह लड़की उनकी अपनी नहीं थी. तमाशबीनों में न कोई जुनैद का था, न कोई अंकित का था, न ही कोई दिलीप था. ये कुछ घटनाएं सिर्फ़ बानगी हैं. न जाने कितने कितने अंकित, कितने जुनैद, कितने दिलीप मार दिए जाएंगे और लोग तमाशबीन बने रहेंगे. अब लगने लगा है कि हम वाकई मुर्दा हो गए हैं. लोग किसी को बचाने के लिए क्यों खुद को मुश्किल में डालें, क्यों अपनी जान जोखिम में डालें. दिल्ली में जब निर्भया कांड हुआ था तो लोग 16 दिसंबर की सर्द रात बिना कपड़ों के घायल कराहती, मौत से जूझती लड़की की फोटो, वीडियो लेने में बिज़ी थे किसी ने उसके जिस्म पर कपड़ा डालने की कोशिश तक नहीं की थी.

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कई बार लगता है कि आख़िर हम इतने मुर्दा कैसे हो गए हैं. हम सिर्फ़ सोशल मीडिया पर अपना गुस्सा निकालते हैं. एक-दूसरे को कोसते हैं. बुरा-भला कहते हैं. अब तो अपराध और अपराधी को भी जस्टीफाई किया जाने लगा है. कोई भी क्राइम अब धर्म, संप्रदाय में बंट गया है. सबने अपना अपना रास्ता इख़्तियार कर लिया है. लेकिन याद रखिए कि एक दिन इस ख़ामोशी का खामियाज़ा सबको भुगतना पड़ेगा. बारी सबकी आएगी. बात बात पर कोई भी किसी की जान ले लेगा. कभी कोई सीट का झगड़ा, कभी किसी का प्रेम का, कभी किसी का पैर छू जाना, कभी किसी की गाड़ी टच कर जाना हत्याओं की आम वजहें होंगी. हम नहीं बोलेंगे तो क़त्ल कर दिए जाएंगे. क्योंकि तेज़ाब किसी को नहीं बख़्शता है. नफ़रत का तेज़ाब जब मुल्क़ की जड़ों में जाएगा, तो इसकी ज़द में हम सब आएंगे.

(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार और सामाजिक विषयों पर टिप्पणीकार हैं)
(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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