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Opinion: मुझे गंगा के प्रति न प्यार है, न श्रद्धा बल्कि नफरत है

बलिया में मौजूद है हरिहरपुर गांव. इस गांव में रहने वाली रूपकली देवी गंगा से नफरत करती हैं क्योंकि वो अपने उजड़े हुए घर और परिवार की वजह गंगा को मानती है.

Opinion: मुझे गंगा के प्रति न प्यार है, न श्रद्धा बल्कि नफरत है

भारत में गंगा नदी की तरह नहीं, विचारों की तरह बहती है, संस्कारों की तरह बहती है. इस नदी के किनारे जो भी बसा, उसे इस नदी ने भरपूर दिया. भारत के बाशिंदों के लिए यह नदी एक बहता हुआ पानी न होकर ‘मां’ बन गई जिसे लेकर श्रद्धा हमारे ज़हन में इस कदर बैठी हुई है कि हम इसे आंखों से देखते हुए भी गंदा नहीं मान पाते. लेकिन - इसी गंगा के किनारे सोना उगलने वाली दोआब की जमीन पर एक गांव हरिहरपुर भी है. यहां रहने वाली रुपकली देवी को गंगा के प्रति न प्यार है, न श्रद्धा बल्कि यूं कहा जाए कि वह कहीं न कहीं गंगा से नफरत करती है तो ये अतिश्योक्ति नहीं होगी.

उत्तरप्रदेश का बलिया जिला. गंगा और घाघरा नदी के बीच बसा यह शहर पहचान का मोहताज नहीं है. मंगल पांडे से लेकर देश के 8वें प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और 'छोटे लोहिया' के नाम से मशहूर जनेश्वर मिश्रा इसी बलिया की मिट्टी से उपजे हैं. यहां खेती की प्रधानता और ज़मीन की उर्वरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस शहर का नाम भी मिट्टी से उपजा है. कहा जाता है कि यहां कि मिट्टी बलुआ है जिसकी वजह से इसका नाम बलिया पड़ा.

विकास की तेजी दिखाता यह शहर जहां स्टेशन के करीब बने एक बड़े और घने बाजार में पुरानी चाट -पकौड़ियों की दुकानों पर टमाटर की चाट और खस्ता के साथ चौमिंग(चाउमीन) और माइक्रोनी (मेक्रोनी) ने भी अपनी जगह बना ली है. वहीं शहर से महज 10 किलोमीटर आगे बढ़ने पर लहलहाते खेत यहां पर कृषि की मौजूदगी की कहानी बयान करते हैं.

इसी बलिया में मौजूद है हरिहरपुर गांव. इस गांव में रहने वाली रूपकली देवी गंगा से नफरत करती हैं क्योंकि वो अपने उजड़े हुए घर और परिवार की वजह गंगा को मानती है. रूपकली देवी का घर नहीं बल्कि वो जिस गांव में पैदा हुई, उनकी जिस गांव में शादी हुई, जहां वो पहली बार मां बनी, जहां वो पहली बार अपने भरे-पूरे परिवार को पलता बढ़ता देखने का सपना पाल रही थी. हर वो खुशी जो उनकी दहलीज पर पहुंचने वाली थी, उसे गंगा बहा ले गई. रूपकली देवी जिस गांव में रहती है वो पांच बार भूमि कटान की वजह से उजड़ा. वह पैदा हुई तब उनके मां-बाप उन्हें गोद में लेकर अपनी बची खुची गृहस्थी के साथ गंगा से दूर हुए क्योंकि उनकी ज़मीन गंगा में मिल चुकी थी. फिर कभी शादी के वक्त तो कभी मां बनने के दौरान, हर वक्त उनका घर छूटा और ये काम परंपराओं ने नहीं किया बल्कि पावन गंगा ने उनका घर उनसे छुड़वाया. रूपकली देवी आज भी जिस घर में रहती हैं वो उनका नहीं उनके दामाद और बेटी का है. रूपकली देवी सोच कर बैठी थी कि अब शायद उनका बुढ़ापा जैसे-तैसे कट ही जाएगा लेकिन उन्हें पता ही नहीं था कि उनका चापाकल यानी हैंडपंप, पानी नहीं ज़हर उगल रहा है. वो जिसे पानी समझ कर पी रही हैं वो आर्सेनिक है. इस आर्सेनिक की वजह भी कहीं न कहीं गंगा ही है.

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रूपकली देवी कहती हैं कि वो अब कहीं नहीं जाने वाली है, अब मरना है तो मर जाएं. अपनी बात कहते-कहते वो अपने घर के पास लगे हुए चापाकल में लगे बंद पड़े आर्सेनिक फिल्टर को ठीक करवाने की गुज़ारिश भी कर देती है. उनके और उनके परिवारजनों के हाथ पैरों में उभरे काले फफोले बताते हैं कि आर्सेनिक ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है. उनसे बात करने आया हुआ हर शख्स उन्हें एक उम्मीद की किरण की तरह लगता है जो शायद उनके गांव में तिल-तिल करके मर रहे लोगों की जिंदगी को बचा सकता है.

इसी हरिहरपुर गांव में लालू भी रहता है. लालू की उम्र कोई 17-18 साल के करीब होगी. उसका एक भाई है जो उससे कोई 3-4 साल बड़ा है और एक छोटी बहन है. लालू जयपुर की एक कंपनी में काम करता है और उसका भाई दिल्ली में काम करता है. भाई कुछ दिनों पहले ही वापस दिल्ली गया है क्योंकि कंपनी से ज्यादा दिन की छुट्टी नहीं मिल सकती, लालू अभी रुका है, फिर वो भी चला जाएगा और गांव में उसकी बहन अकेली रह जाएगी. वो गांव वालों के भरोसे रहेगी ऐसा इसलिए क्योंकि लालू की मां पहले ही चल बसी थी और पिछले 10 सालों से कैंसर से जूझते हुए हाल ही में उसके पिता भी चल बसे. पिता के कमाने की उम्र में बिस्तर पकड़ने की वजह से लालू और उसके बड़े भाई मानो जल्दी बड़े हो गए. लालू बताता है कि कैसे पहले उसके पिताजी के शरीर में छोटे छोटे फफोले निकले, फिर वो धीरे-धीरे बढ़ते गए. डॉक्टर ने बोल दिया कि इसका कोई इलाज नहीं, बस दर्द सहन करना ही उनकी नियति हो गई और एक दिन दर्द ने इंतिहा कर दी और लालू के पिता को उनसे छीन लिया. लालू के पिता की जान लेने वाला गांव की ज़मीन से निकलने वाला पानी ही था.

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हरिहरपुर गांव के कमोबेश हर घर की यही कहानी है. गांव में रहने वाले राजेश दुबे बताते हैं कि हर साल पानी की वजह से 3-4 लोगों की मौत हो जाती है. गांव के हर दूसरे व्यक्ति को चमड़ी से जुड़ी हुई परेशानी है, हथेलियो पर उभरते छाले, और पैरों में उभरते फफोले - जिसे गांव के लोग चित्ती उभरना मानते है और उसे चर्म रोग समझते है - उन्हें ये पता तक नहीं है कि वो कैंसर के मुहाने पर खड़े हुए हैं.

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इसी गांव से थोड़ी दूर एक और गांव है उदवन छपरा जहां पर खेतों में पानी सींचती हुई रमावती मिल गई. रमावती के हाथ और पैर भी इस गांव में पैर पसार चुके आर्सेनिक की कहानी बयान करती है. रमावती बताती है कि उनके हाथ-पैरों में काले छाले से पिछले 25 सालों से है. पूछने पर वो कहती है कि पहले वो कुंए का पानी पीती थी. अपने शरीर पर उभरे छाले जैसे निशान और पैरों पर उभरे फफोलों से शर्मिंदगी सहती आ रही रमावती कहती हैं कि अपने मायके या कहीं और दो चार-छह महीने के लिए चले जाओ तो ये तकलीफ दूर हो जाती थी और वापस गांव में लौटते ही फिर से दिक्कत शुरू हो जाती है. इसी से उन्होंने अंदाज लगाया कि ये पानी की वजह से हो रहा है क्योंकि गांव में रहने वाले कई लोगों ने ऐसा ही कुछ अनुभव किया था. इसी वजह से गांव के कई लोग अपनी खेती-बाड़ी छोड़ कर शहर में बस गए हैं और ये जगह छोड़ते ही उनकी तकलीफ ने भी उनका साथ छोड़ दिया. रमावती ने बताया कि डॉक्टरों ने इसे चर्मरोग बताया है. अपनी उंगलियों के काले पड़े हुए नाखूनों को दिखाते हुए वो बताती हैं कि वो एक बार पूरे खत्म हो चुके है. दूसरी बार आए हैं और अब वो भी काला पड़ना शुरू हो गये हैं.

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उदवन छपरा के रहने वाले पवन बताते हैं कि गांव में एक घर में प्रति दिन औसतन 40 रू पीने के पानी पर खर्च होते हैं. गांव में तीन कुएं भी है जो काम कर रहे हैं लेकिन राजनीति और एकजुटता की कमी की वजह से उनकी देखरेख सही नहीं हो पा रही है. यहां तक की जागरूकता की कमी का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि लोगों ने अपने हेंडपंप पर पानी निकालने वाली जगह पर कपड़ा बांध दिया है. उन्हें ऐसा लगता है कि ऐसा करने से पानी साफ हो जाएगा.

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औरत हैं ज्यादा पीड़ित
इन गांवों में घूमते हुए अगर किसी छोटे बच्चे, जवान या किसी बुज़ुर्ग से भी किसी महिला का नाम पूछेंगे तो कोई नहीं बता पाएगा कि किस महिला की बात हो रही है. सभी का एक ही सवाल होता है किसकी पत्नी है या किसकी माँ है. यहां तक कि कुछ बच्चे तो हंसते हुए यह तक बोलते हैं कि औरत का नाम कौन जानता है.

भले ही औरतों की पहचान उनके नाम से ज्यादा फलाने की बीवी या अलाने की मां से हो लेकिन आर्सेनिक की मार सबसे ज्यादा यही महिलाएं झेल रही हैं. हरिहरपुर हो या उदवन छपरा या गंगा पट्टी पर मौजूद आर्सेनिक से प्रभावित बाकी के गांव, ज्यादातर पीड़ित संख्या महिलाओं की ही है. क्योंकि घरेलू कामकाज से लेकर पानी लाने तक हर जगह औरतें दिन भर पानी में डूबी रहती है और इसी वजह से उन पर आर्सेनिक का ज्यादा असर साफ नज़र आता है. पुरूषों के शहर चले जाने के बाद अब तो खेतों में पानी देने तक का काम औरतों के जिम्मे आ गया है जिस वजह से रूपकली देवी हो या रमावती आर्सेनिक से उभरे फफोले महिलाएं ही अपने पल्लू के भीतर छिपाने को मजबूर हैं. खास बात यह है कि औरत के सौंदर्य को देखने वाले हमारे समाज को औरत के शरीर पर उभरे फफोले बदसूरत तो लगते हैं लेकिन उसके पीछे की वजह नजर नहीं आती. इसलिए गांवों में शादियों में भी खासी परशानी है.

आखिर क्यों गंगा पथ पर हैंडपंप जहर उगल रहे हैं
सवाल ये पैदा होता है कि पानी से भरपूर इस ज़मीन में अचानक ऐसा क्या हुआ कि यहां के हैंडपंप या बोरवेल ज़हर उगलने लगे हैं. जवाब विज्ञान में मिल जाएगा. वैज्ञानिकों का मानना है कि आर्सेनिक हिमालय से बहकर आया है और नदी की तलहटी में मौजूद रहता है. कई सालों के विकास में हमने नदी को पीछे धकेलते हुए उसकी ज़मीन पर सभ्यता को बसाया. इसी सभ्यता ने पानी को कभी न खत्म होने वाला पदार्थ समझा और कालांतर में ज़मीन के अंदर के पानी के बेतहाशा दोहन की वजह से पानी के साथ आर्सेनिक निकलने लगा. दरअसल तकनीक के विकास और सुविधा प्रेमी सभ्यता ने ज़मीन के नीचे से पानी निकालने के नए-नए तरीके इजाद किये जो हैंडपंप से लेकर बोरवेल, ट्यूबवेल तक जा पहुंचे. बेतहाशा दोहन की वजह से पानी धरती में समाता गया और इंसान उसके पास नीचे तक जाता गया. जाते- जाते हम धरती में इतना नीचे पहुंच गए जहां पर आर्सेनिक की परत होती है. हमने उसमें भी छेद कर दिया जिसका नतीजा उस कैंसर की तरह हुआ जो कई बार शरीर में चुपचाप बैठा रहता है लेकिन उसे कुरेद कर हम उसे जगा देते हैं. आर्सेनिक परत को भी इंसानों ने खोदकर जगा दिया और पानी के साथ ज़हर ऊपर आने लगा. इंसानों को जब आर्सेनिक के बारे में पता चला तो पानी के दोहन को रोकने के बजाए वो एक कदम और आगे बढ़ गए और उन्होंने आर्सेनिक परत के नीचे 600 फीट तक खोदना शुरू कर दिया. यानि स्थितियों को और विकट बना दि

क्या होता है आर्सेनिक
आर्सेनिक एक सेमी मेटालिक तत्व होता है जो गंधहीन और स्वादहीन होता है. ये ज़मीन की सतह के नीचे प्रचुर मात्रा में मौजूद रहने वाला 26वाँ तत्व है. इसकी पहचान इसका जहरीलापन है. इसमें कैंसर पैदा करने की क्षमता होती है और ये हवा, पानी और त्वचा के संपर्क में आकर शरीर में पहुंच जाता है.

विश्व स्वास्थय संगठन का मानना है कि पानी में 10 पार्ट्स प्रति बिलियन (पीपीबी) आर्सेनिक की मौजूदगी ही सुरक्षित होती है लेकन अगर बलिया और इसके आसपास के क्षेत्रों की बात करें तो यहां के पानी में आर्सेनिक की मात्रा कहीं ज्यादा है, यहां पानी में 1000 से 1500 पार्ट्स प्रति बिलियन तक आर्सेनिक है जो निर्धारित मात्रा से कई गुना ज्यादा है. दरअसल खेती के लिए भूमिगत जल के बेतहाशा दोहन की वजह से पानी में आर्सेनिक की मात्रा कई गुना बढ़ गई है. इसलिए यहां के बोरवेल और हैंडपंप ज़हरीला पानी उगल रहे हैं.

देखा जाए तो कानपुर, इलाहाबाद, बनारस, गाज़ीपुर और इससे भी आगे बलिया, भागलपुर से लेकर बंगाल तक आर्सेनिक फैला हुआ है. इसके साथ ही पंजाब, राजस्थान, हरियाणा, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी आर्सेनिक ने अपने पर फैला लिये हैं. मुरली मनोहर जोशी की प्राक्कलन समीति की एक रिपोर्ट के मुताबिक 12 राज्यों के 96 जिले आर्सेनिक से पीड़ित है. इसी रिपोर्ट के मुताबिक 6 राज्यों के 35 जिलों में 7 करोड़ से ज्यादा लोग इसके असर में है. इनमें से सबसे अधिक उत्तरप्रदेश के 20 जिले आर्सेनिक से प्रभावित हैं, इसके बाद असम के 18, बिहार के 15, हरियाणा के 13, पश्चिम बंगाल के 8 और पंजाब के छह जिलो में आर्सेनिक एक बड़ी समस्या बना हुआ है.

कितने राज्य कहां तक हैं पीड़ित
21 राज्यों के 153 जिलों में लगभग 24 करोड़ लोगों के पीने के पानी में आर्सेनिक जा रहा है. उत्तरप्रदेश इन राज्यों में अव्वल पर है जहां के लगभग 7 करोड़ लोग आर्सेनिक का पानी पी रहे है. लोकसभा के एक खुलासे में असम की 65 फीसद जनता यानि लगभग 2.1 करोड़ आर्सेनिक प्रभावित पानी पी रहे हैं, वहीं बिहार की 60 फीसद आबादी और पश्चिम बंगाल में 44 फीसद लोग आर्सेनिक मिला पानी पीने को मजबूर है.

अगर जिला के आधार पर आर्सेनिक के प्रभाव पर नज़र डालें तो उत्तर प्रदेश का 32 फीसद हिस्सा आर्सेनिक से प्रभावित है, वहीं बिहार का करीब 61 फीसद, पश्चिम बंगाल का 44 फीसद, असाम का 65, पंजाब का 25 फीसद, मध्यप्रदेश 10, गुज़रात 11, हरियाणा 22 फीसद, आंध्रप्रदेश 5, तमिलनाडु 5 फीसद, झारखंड 4.6. कर्नाटक 2, जम्मू-कश्मीर 2.1 प्रतिशत, छत्तीसगढ़ 5, दिल्ली 3 प्रतिशत आर्सेनिक की जद में आ चुके हैं.. इसके अलावा उड़ीसा, मणिपुर, राजस्थान, हिमाचल भी इससे अछूते नहीं है.

पानी से पनपा पानी का बाज़ार
आर्सेनिक मिला पानी निकलते हेंडपंप ने बाज़ार को एक नया कमाई का ज़रिया दे दिया है. बलिया के तमाम गांवों में आरओ वॉटर के व्यवसाय ने खासा जोर पकड के रखा है. यहां गांवं के अंदर ही कई प्राइवेट आरओ प्लांट लग गए हैं जिससे गांव के कई परिवार रोज़ 20 रू देकर 20 लीटर की बॉटल खरीदते हैं. देखा जाए तो एक परिवार औसतन 1200 रुपये महीना पीने के पानी पर खर्च कर रहा है.

यह पानी शुद्ध है या नहीं इस बात की भी कोई जांच नहीं हुई है. कुल मिलाकर यहां की जनता भगवान के भरोसे है. सरकार न तो खुद ही कोई पानी के इंतज़ाम कर रही है और न ही यहां धड़ल्ले से बगैर जांच के बिक रहे पानी पर कोई लगाम कसी गई है. गांव का बाशिंदा ये सोचकर वो पानी पी रहा है कि उसके हैंडपंप से निकले पानी से तो ये कम ही ज़हरीला होगा. गांव के हैंडपंपो पर खतरे के लिए लाल निशान तो लगा दिए गए हैं लेकिन उसके बदले में कोई इंत़ज़ाम कहीं नज़र नहीं आता. कहीं कोई आर्सेनिक निकालने वाला प्लांट किसी हेंडपंप पर लगाया भी गया है तो वो दस दिनों के अंदर ही चोक हो जाता है. उसके बाद न तो उसे लगाने वाले ठेकेदार को इसकी चिंता है न ही सरकार को. जनता कुछ दिनों तक ठीक पानी पीती है उसके बाद फिर उसकी किस्मत में ज़हर ही आ जाता है.

पुराने कुएं सूख गए, नए कुएं बने कैसे
वैज्ञानिक भी मानते हैं कि कुएं से निकले पानी में आर्सेनिक का प्रभाव खत्म हो जाता है. उदवन छपरा की रहने वाली रामकली का मानना है कि है कि जब तक वो कुएं का पानी पीती रही तब तक उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई लेकिन जैसे ही चापाकल का पानी पीना शुरू हुआ उनकी दिक्कते बढ़ने लगी. वहीं गांव के ही शाकिब का भी यही मानना है कि कुएं के पानी से कभी कोई दिक्कत नहीं हुई है. दरअसल सूरज की रोशनी में आर्सेनिक का असर खत्म हो जाता है और हैंडपंप का पानी सीधे ज़मीन से ऊपर आ जाता है, कहीं भी उसका सामना सूरज की रोशनी से नहीं होता है. वहीं कुओं में सूरज की रोशनी पडती थी इसलिए आर्सेनिक का असर खत्म हो जाता है. लेकिन गांव में जो पुराने कुएं थे वो जीवित तो हैं लेकिन देखरेख के अभाव में मरणशैया पर हैं. वहीं नए कुएं गलाने वाले लोग अब बचे ही नहीं है. दरअसल बोरवेल की खुदाई ने एक परंपरा और उसे निभाने वाले लोंगों को पूरी तरह खत्म कर दिया है. एक वक्त कुआं खोदना एक त्यौहार, एक उत्सव होता था जिसे गांव का ही एक विशेष तबका मनाया करता था. वो इसे कुआं गलाई कहा करते थे.

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क्या होता है कुंआ गलाई
कुआं गलाई के तहत पहले वो ज़मीन तय की जाती थी जहां कुआं बनाया जाना है. जगह तय होने के बाद उस जगह पर एक विशेष चौड़ाई और गोलाई वाली दीवार खड़ी की जाती थी जिसे कोठी कहते हैं. इस कोठी की लंबाई उतनी ही होती है जितना गहरा कुआं होना चाहिए यानी कहीं 50 फीट तो कहीं 150 फीट. इसके बाद कुआं धंसाने की प्रक्रिया शुरू होती थी जिसके तहत कुछ लोग उस कोठी के अंदर उतर कर, एक गड्ढा करके कोठी को अंदर बैठाना शुरू करते हैं. अंदर मौजूद लोगों का ध्यान न भटके और सांस घुटने की दिक्कत से वो बेहोश न हो इसलिए उनके कोठी धंसाने के दौरान कुंए से जुड़े गाने गाए जाते थे. जब पूरी कोठी को धंसा लिया जाता है तो नीचे थोड़ा सा काम किया जाता है और धीरे धीरे कुआं पानी से भरने लग जाता हैं. लेकिन तेजी से धरती को ड्रिल करके ट्यूबवेल या बोरवेल बनाने की वजह से कुआं बनाना कम होता गया और उन्हें बनाने वाले भी कम होते गए. पुरानी पीढ़ी से नई पीढ़ी को ये विरासत मिली नहीं, जिसे मिली भी वो रोजगार के अभाव में दूसरे कामों में लग गए.

सरकारी पहल
ऐसा नहीं है कि सरकार ने कोई पहल नहीं की हो. गांव में आरओ प्लांट भी लगाए गए हैं , साथ ही पानी की जांच के लिए लोगों को मुस्तैद भी किया गया है. लेकिन उचित देखरेख के अभाव में न सिर्फ आरओ प्लांट के मेंब्रेन चोक पड़े हुए हैं, वहीं जांच के लिए जो किट मुहैया कराई जा रही है उसका ये आलम है कि फील्ड में जांच करने वाली किट का इस्तेमाल लैब में किया जा रहा है. इस प्रक्रिया ने जांच को जहां एक मज़ाक बना कर रख दिया है, वहीं लोगों की परेशानी दिन पर दिन बढ़ती जा रही है.

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हमारी धरती से आर्सेनिक निकल कर हमाऱे शरीर में पहुंच रहा है इस बात को स्वीकार करने में पहले तो सरकारें आनाकानी करती रहीं. लेकिन अब आर्सेनिक को लेकर खुलेआम बात हो रही है और सरकारें भी ये मान रही है कि उनके राज्य में धरती के पानी में आर्सेनिक है. लेकिन क्या मान लेने भर से समस्या सुलझ सकती है. शायद नहीं. दरअसल हैंडपंप, बोरवेल जैसी चीजों के इस्तेमाल पर रोक और कुआं बनाने की प्रक्रिया पर जोर देना ही वो समाधान है जिसके ज़रिये इस मुसीबत से बचा जा सकता है. रूपकली देवी जैसे लोगों का घर उजड़ा इसलिए उनका गंगा से नाराज होना लाज़मी है लेकिन शायद हम ये भूल जाते हैं कि गांव भी उनका है, वहां की ज़मीन भी उनकी है औऱ उसके साथ बहती नदी भी उनकी है, जिसके किनारे वो उम्मीद लेकर बसे थे. उनकी उम्मीद बढ़ती गई और इतनी बढ़ी की उसने ज़मीन से ज़हर को खींच लिया और किनारों को कटने पर मजबूर कर दिया. गंगा तो हिमालय से उनके लिए गाद का तोहफा लाई थी लेकिन उसे तोहफा नहीं माना गया और इस कदर उसका दोहन किया कि भूमि कटान से लेकर ज़मीन की तह में चुपचाप बैठा आर्सेनिक बाहर आने को मजबूर हो गया. और जो पानी चेहरे को नूर देता है, उसी पानी ने जिंदगी को बेनूर करना शुरू कर दिया.

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार और WaterAid India 'WASH Matters 2018' के फैलो हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)