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बिरजू और शंभू को ‘हल’ दीजिए

जिस मल-मूत्र को पहले खाद बनाने में इस्तेमाल किया जाता था वो अब शहरो में पानी के साथ बहा दिया जाता है. हमारे मल में कार्बन की भरमार होती है और ऐसे जीवाणुओं की भी जो इस कार्बन को पचा कर मिट्टी के लायक बना सके. 

बिरजू और शंभू को ‘हल’ दीजिए

मदर इंडिया में बिरजू का बाप अपने दूध पीते बच्चे और जवान बीवी को छोड़ कर चला गया और बाद में उसका बेटा जब कुछ नहीं कर पाया तो डाकू बन गया. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि बिरजू के बाप ने जिससे कर्जा लिया था वो देश का कोई बैंक नहीं था बल्कि गांव का सुक्खी लाला था. ऐसा इसलिए भी हुआ क्योंकि मदर इंडिया के दौर में किसान बड़ा वोटर नहीं बन पाया था. ऐसा इसलिए भी हुआ क्योंकि हरित क्रांति ने देश में कदम नहीं रखा था. ऐसा इसलिए भी हुआ क्योंकि उस वक्त तक अनुकंपा, अधिकार नहीं बन पाई थी.

यह उसी दौर की बात है जब शंभू अपनी दो बीघा ज़मीन को छुड़ाने के लिए गांव छोड़कर कोलकाता(उस समय का कलकत्ता) में रिक्शा घसीटने के लिए चला गया था. और तमाम प्रकार के झंझावतों के बाद भी उसकी ज़मीन उसके पास नहीं रह पाई थी. उस दौर में शंभू के पास भी बैंक नहीं था जो उसे माफ करने के लिए कर्जा दे देता.

दरअसल इस देश की सरकारों ने कभी भी बिरजू या शंभू की परेशानी को समझा नहीं. वो बिरजू के भूख से अकड़ते पेट पर चंदन का लेप लगाते रहे. उन्होंने शंभू के खेतों में उपज रहे अनाज को स़ड़ने के लिए छोड़ दिया, बाद में उस पर कर्जा माफी जैसे सुंदर कपड़ा ओढ़ा दिया.

जिस तरह से कर्जा माफी को किसानों की समस्याओं से जोड़ कर देखा जाता है वो बताता है कि सोच किस तरफ जाती है. नीति आयोग ने भी हाल ही में कहा किसानों के कर्ज माफी से सिर्फ एक तबके को ही लाभ मिलेगा और कृषि समस्या के लिए ये कोई हल नहीं है. नीति आयोग के मुताबिक इससे गरीब राज्यों के केवल 10 से 15 फीसद किसानों को ही फायदा मिल पाएगा. क्योंकि ऐसे राज्यों में बैंको या वित्तीय संस्थानों से कर्ज लेने वाले किसानों की संख्या बहुत कम है. यहां तक कि 25 फीसद किसान संस्थागत कर्ज नहीं लेते हैं. जब किसानों के कर्ज लेने के मामले में संस्थागत पहुंच में ही राज्यों में इतना बड़ा अंतर है तो ऐसे में कर्ज माफी पर बहुत सारा पैसा खर्च करने का कोई मतलब नहीं बनता है.

कर्ज माफी को नेता उस मार्केटिंग की तरह इस्तेमाल करते हैं जिसमें किसी सामान की कीमत को 999 रू बताकर हज़ार के आंकड़े का डर छिपा लिया जाता है, साथ ही ये सुनने में भी आकर्षक लगता है. दरअसल ये सुनने का जो आकर्षण है यही नीति का निर्माता है. सरकार वो नीतियां बनाती है जो सुनने में आकर्षक हो. इस देश की किसानी का सत्यानाश इससे सुनने के आकर्षण से हुआ. हरित क्रांति भी वही कर्णप्रिय क्रांति थी जिसने यूरिया डाल डाल कर नीचे ज़मीन और ऊपर वातावरण का मटियामेट कर दिया.

हरित क्रांति ने हमारे खेतों को वैसा ही नशे का आदि बना दिया जिस तरह पंजाब का युवा ड्रग्स का आदि हो चुका है. इस नशे का नाम था फर्टीलाइज़र यानि उर्वरक. ये वही उर्वरक है जिसने टेक्सस शहर जो एक वक्त अमेरिका का सबसे बड़ा अनाज उत्पादक था, उसे उस बरबादी की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है कि आज वहां बमुश्किल फसल हो रही है. क्लाइमेट चेंज ने बाकी रही सही कसर पूरी कर दी है.

‘सोपान जोशी अपनी किताब ‘जल थल मल’ में बताते हैं कि किस तरह औद्योगिक क्रांति के दौरान जब शहरों की तरफ लोगों का पलायन शुरू हुआ और उन्हें खिलाने के लिये पर्याप्त अनाज नहीं था तो एक ऐसी जादुई खाद की ज़रूरत महसूस होने लगी जो ज़मीन में पड़ते ही उसका उत्पादन दोगुना कर दे. इस मानसिकता ने खाद की अवधारणा को बदल कर रख दिया और इंसानों और जानवरों के मल-मूत्र को गलाकर खाद बनाना अब पर्याप्त नहीं रह गया. जर्मन रसायन शास्त्री युस्टुस फॉन लीबिह ने 19वीं शताब्दी के मध्य में ये सिद्ध कर दिया की नाइट्रोजन ही वनस्पति का सबसे ज़रूरी उर्वरक होता है.

सन 1908 में जर्मन रसायनशास्त्री ने हवा से नाइट्रोजन खींच कर अमोनिया बना कर दिखाया . बाद में हवा से नाइट्रोजन खींच कर अमोनिया बनाने वाली हेबर-बॉश प्रक्रिया से न केवल जर्मनी में बनावटी खाद बनने लगी बल्कि युद्ध में इस्तेमाल होने वाला असलहा और विस्फोटक भी इसी अमोनिया से बनने का रास्ता खुल गया. दूसरा विश्वयुद्ध समाप्त होने के बाद इन कारखानों को बंद नहीं किया गया. इन कारखानों में बने अमोनिया से तैयार यूरिया को बनावटी खाद की तरह इस्तेमाल किया जाने लगा. इसी दौरान मक्का और गेहू की ऐसी फसलें भी ईजाद हुई जो इस बनावटी खाद को मिट्टी से ग्रहण करने में सक्षम थी.‘

दुनिया भर में बनावटी नाइट्रोजन उत्पादन 1960 से 1980 के बीच आठ गुना बढ़ा. ये वही हरित क्रांति थी जिससे हमारे देश खाद्यान्न उत्पादन पर आत्मनिर्भर हो पाए. हमने आत्मनिर्भरता का ऐसा पाठ पढ़ा जिसका लंबे अंतराल पर क्या असर होने वाला था उस बारे में हमने सोचना भी मुनासिब नहीं समझा. हमने किसानों को तुरत लाभ वाला फार्मूला दिया और उसे भी प्रकृति को बरबाद करने में साझीदार बना लिया.

किसान को लहलहाते हुए खेत नज़र आए जिससे वो खुश था. देश आत्मनिर्भर बन रहा था. इतना आत्मनिर्भर की 1960 की भुखमरी से उठकर हरित क्रांति की बदौलत हमने इतना अनाज उगा लिया की वो गोदामों में सड़ने लगा लेकिन नशे के आदि होते खेत धीरे-धीरे बंजर होते जा रहे हैं. अब उनसे फसल नहीं पनप रही, हम यूरिया का डोज बढ़ाते जा रहे हैं और अनाज के साथ-साथ जहर उगा रहे है. वो भी ठीक से नहीं ऊग रहा है और अगर मान लो कहीं अच्छी फसल हो गई तो किसान को उसका दाम नहीं मिल पाता. इसका हासिल होता है किसानों की आत्महत्या.

किसानों का आंदोलन जिसे रोकने के लिए हमारी सरकारें फिर उनके लिए हुए कर्ज को माफ करने की घोषणा कर देती है. किसान भी राहत की सांस ले लेता है और सोचता है कि समाधान तो हो गया. वो फिर अपने खेतों पर लौटता है और अनुदान से मिले हुए उर्वरक को डालकर फिर से खेतों में फसल उगाने में जुट जाता है. यूरोप और अमेरिका जैसे देशों में तो अब खेती पूरी तरह कृषि उत्पाद बेचने वाली कंपनियों के इशारों पर चलती है. भारत भी इसी तरफ कदम बढ़ा चुका है. खेती इतनी मंहगी हो चुकी है कि खरबों के सरकारी अनुदान के बगैर हो ही नहीं सकती. 2012 में ऐसे विकसित देशों ने 258 करोड़ डॉलर का सीधा अनुदान अपने किसानों को दिया था. ये राशि किसानों से होती हुई कृषि उत्पाद बेचने वाली कंपनियों तक जाती है. दरअसल ये अनुदान से खेत नहीं कंपनियां लहलहा रही हैं.

इसी का नतीजा है कि वो सब चीजें तो कभी खेतों के लिए सोना समझी जाती थी उन्हें बेकार समझा जाने लगा है. ये बात सालों से काम करते हुए हमारे किसानों के दिमाग में इस तरह बैठा दी गई है कि वो अपनी परंपरा को प्रकृति से जुड़े रहने की प्रवृत्ति को भूल गया है. समृद्ध राज्यो में फसल काटने के बाद पुआल को जलाया जाने लगा है क्योंकि मशीन से होने वाली खेती में पुआल का कोई इस्तेमाल नहीं रहा है. पंजाब और हरियाणा में हर साल ऐसा होता है. एक वैज्ञानिक अनुमान के मुताबिक हर साल हमारे यहां पुआल के रूप में 50 करोड़ टन फसलों के अवशेष बचते हैं. इनमें से 8-14 करोड़ टन जला दिये जाते हैं. इससे उर्वरक की बरबादी के साथ वायु प्रदूषण होता है. अक्टूबर के आस पास, कटाई के मौसम में दिल्ली जैसे शहरों के ऊपर हर साल एक धुएं की चादर सी आ जाती है जो पंजाब हरियाणा में पुआल जलाने का नतीजा है.

हम सब जानते हैं कि हरित क्रांति से सोना उगलने वाली बात अब पुरानी हो चुकी है. पंजाब की खुशहाली वाली बात, अब बात बन कर रह गई है. लेकिन फिर भी ना कृषि वैज्ञानिक और न ही किसान ये मानने को तैयार हैं कि हमने धरती का जो नुकसान किया है उसे सुधारने का तरीका धरती में ही छिपा है. जिस मल-मूत्र को पहले खाद बनाने में इस्तेमाल किया जाता था वो अब शहरो में पानी के साथ बहा दिया जाता है.

हमारे मल में कार्बन की भरमार होती है और ऐसे जीवाणुओं की भी जो इस कार्बन को पचा कर मिट्टी के लायक बना सके. अगर मिट्टी में कार्बन वाले जैविक तत्व का अनुपात नाइट्रोजन की तुलना में बीस गुना न हो, तो मिट्टी में कितना भी नाइट्रोजन या फास्फोरस हो, फसल को बहुत लाभ नहीं होता है बल्कि उर्वरकों की बर्बादी होती है.

हमारे देश में हर साल यूरिया पर अरबों रुपए की सब्सिडी दी जाती है लेकिन इसका एक अंश भी इस उर्वरक को बचाने में नहीं लगाया जाता जो मिट्टी को सच में सोना बना सकती है. इसके पीछे की एक सीधी वजह है इस मल मूत्र को उर्वरक बनने में वक्त लगता है. इतना वक्त न सरकार के पास है न नीति निर्माताओं के पास है और न ही किसानों के पास है. हम सभी को तुरंत लाभ चाहिए. हमें जादू चाहिए. हम उस ऐलोपैथी की संतति है जो नहीं जानना चाहती है कि बुखार की वजह क्या थी, वो बस ये चाहती है कि उसका अभी तो बुखार उतर जाए, बाकी बाद में देख लिया जाएगा. हमारी मानसिकता पूस की रात में सर्दी से सिकुड़ते उस किसान की तरह है जो नींद लग जाने पर अपने उजडे हुए खेत को देख कर ये सोचता है कि चलो ठीक है कल से खेत की रखवाली तो नहीं करनी पड़ेगी. साथ ही अगर उस किसान ने किसी संस्थागत तरीके से कर्ज लिया है तो वो भी माफ हो जाएगा. उसे बिरजू की तरह सुक्खी लाला का डर नहीं है. सरकार अऩुदान तो दे रही है लेकिन समाधान नहीं दे पा रही है. जबकि बिरजू और शंभू को हल चाहिए. खेतों को जोतने के लिए भी और जिंदगी के लिए भी.

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार और WaterAid India 'WASH Matters 2018' के फैलो हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)