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शिक्षक दिवस- गूगल गुरु के सामने लाचार विश्व गुरु

भारत में अंग्रेजी के प्रति व्यामोह और मैकाले की शिक्षा प्रणाली की वजह से अधिकांश मां-बाप अपने बच्चों को बड़े स्कूल और कालेज में पढ़ाना चाहते हैं. 

शिक्षक दिवस- गूगल गुरु के सामने लाचार विश्व गुरु

विश्व गुरु का स्वप्न देखने वाले स्वामी विवेकानंद के शिकागो व्याख्यान की 125वीं जयन्ती अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर मनाई जा रही है. उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने विश्व गुरु बनने में गूगल गुरु समेत अनेक सीमाओं और बाधाओं को सही रेखांकित किया है. मैकाले की औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली से त्रस्त देश में अब गूगल और सोशल मीडिया की लत लगने के बाद विश्व गुरु का सपना कैसे साकार होगा.

क्लर्क बनाने वाली मैकाले की औपनिवेशिक शिक्षा प्रणाली
मुट्ठी भर अंग्रेजों को भारत जैसे विशाल देश में शासन करने के लिए मैकाले ने अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली की सौगात दी, जिसके कैंसर से आज पूरा देश त्रस्त है. स्थानीय भाषा और संस्कृति की अवहेलना करने वाली रटन्तू शिक्षा प्रणाली से भारत को क्लर्कों की फौज मिली. चाकरी वाली शिक्षा प्रणाली की वजह से भारत में परंपरागत कृषि, उद्योग और स्वरोजगार का पूर्णतः ह्रास होने के साथ बेरोजगारों की बड़ी फौज भी खड़ी हो गई.

डिजिटल इंडिया में डिग्रियों की क्या जरूरत
उदारीकरण के बाद देश में इन्फोसिस और विप्रो जैसी भारतीय कम्पनियों ने आईटी क्षेत्र में युवाओं के लिए रोजगार के नये अवसर पैदा हुए. तदुपरांत डिजिटल क्रांति के युग में मोबाइल, कम्प्यूटर और टेक्नोलॉजी के नये मॉडल हर 6 महीने में बदल जाते हैं पर भारतीय शिक्षा प्रणाली का पाठ्यक्रम शताब्दियों से नहीं बदल पा रहा है. महात्मा गांधी ने ग्राम स्वराज का सपना देखते हुए युवाओं को अर्निंग और लर्निंग का मंत्र दिया था. सोशल मीडिया के दौर में आरामतलबी और आरक्षण के मर्ज से पस्त शिक्षा प्रणाली की वजह से युवाओं में डिग्रियों की होड़ है और दूसरी तरफ नौकरियों के लिए लायक लोग नहीं मिल रहे.

वीरान खेती और नौकरियों के लिए मारामारी
मैकाले की शिक्षा प्रणाली की वजह से भारत के युवाओं में शारीरिक श्रम और खेती के लिए तिरस्कार का भाव पनपा, जिससे पूरी अर्थव्यवस्था का संतुलन गड़बड़ा गया है. गांवों में खेती और कुटीर उद्योग वीरान हो रहे हैं और शहरों में नौकरियों का विस्तार नहीं हो रहा है. रेलवे के नब्बे हजार पदों के लिए 2.8 करोड़ युवाओं के आवेदन से एक नया विश्व रिकार्ड कायम होने के बावजूद, अभी तक परीक्षा का सिस्टम ही नहीं बन सका. पर्चा लीक की बढ़ती घटनाओं के दौर में परीक्षा प्रणाली दुरूस्त करने की बजाय सरकारों ने अब इन्टरनेट बन्द करने की जुगत भिड़ा ली है. स्किल इंडिया जैसे कार्यक्रमों के दौर में चतुर्थ श्रेणी और चपरासी के पदों के लिए इंजीनियर, एम.बी.ए. और पी.एचडी. धारकों द्वारा बढ़ते आवेदनों से शिक्षा प्रणाली का नासूर सामने आने के बावजूद, शासन व्यवस्था का मौन दुर्भाग्यपूर्ण है.

हिंसा, ड्रग्स, नक्सलवाद और मॉब लिंचिंग की गिरफ्त में युवा
उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने लैपटॉप तो राजस्थान और छत्तीसगढ़ के वर्तमान मुख्यमंत्रियों द्वारा चुनावी लाभ के लिए मोबाइल फोन के वितरण से गरीबों तक इन्टरनेट की पहुंच हो गई है. गूगल गुरु और व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी के ज्ञान से ओत-प्रोत बेरोजगार युवाओं को अब ड्रग्स, हिंसा, नक्सलवाद और मॉब लिंचिंग के लिए इस्तेमाल करना और आसान हो गया है. शिक्षा प्रणाली में आमूल-चूल परिवर्तन की बजाय नीति आयोग जैसी संस्थाओं द्वारा युवाओं की अकुशलता को कोसना दुर्भाग्यपूर्ण ही है.

विदेशी भाषा से ग्रस्त भारत कैसे बने विश्व गुरु
तमाम रिसर्च से यह साबित हुआ है कि बच्चों को मातृ भाषा में शिक्षा देने से उनका बेहतर विकास होता है. भारत में अंग्रेजी के प्रति व्यामोह और मैकाले की शिक्षा प्रणाली की वजह से अधिकांश मां-बाप अपने बच्चों को बड़े स्कूल और कालेज में पढ़ाना चाहते हैं. अशिक्षित और गरीब तबका तमाम दुश्वारियों के बावजूद, अपने बच्चों को अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाना चाहता है. इन बड़े स्कूलों में ऊंची फीस के बावजूद पढ़ाई का स्तर जीरो है, जिसकी वजह से ट्यूशन और कोचिंग की इंडस्ट्री में माफिया की पैठ हो गई.

कोचिंग और महंगी शिक्षा के दौर में लुप्त होते शिक्षक
कोचिंग इंडस्ट्री के दम पर फल-फूल रहे कोटा जैसे अनेक शहर अब बच्चों के डिप्रेशन और आत्महत्या के बड़े केन्द्र बन गये हैं. 20वीं शताब्दी में डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में पश्चिमी जगत को दर्शन शास्त्र पढ़ाया था, पर 21वीं शताब्दी का भारत अब पश्चिम की आयातित शिक्षा प्रणाली का मोहताज हो गया है. व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी के दौर में सूचनाओं से लैस देश में अच्छे शिक्षकों और छात्रों दोनों का अभाव हो गया है. एशियन गेम्स में गरीब रिक्शा चालक की बेटी स्वप्ना बर्मन द्वारा हेप्टाथेलन में स्वर्ण पदक की जीत से देश के युवाओं में नई उम्मीद जगी है, पर शिक्षा के गुरुघंटाल ऐसी सफलताओं से शायद ही कोई सबक लें? पिछलग्गू युवाओं की भीड़ से सराबोर डिजिटल इंडिया, अब विश्व गुरु का रास्ता कैसे चुने? क्या इसका जवाब गूगल गुरु के पास मिलेगा?

(लेखक सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता और संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)