बंगाल चुनावों में टीएमसी प्रायोजित हिंसा - लोकतन्त्र के लिए खतरे की घंटी

पश्चिम बंगाल के पुरुलिया में एक और राजनीतिक विरोधी की हत्या को आत्महत्या का मामला बताकर भले ही बन्द कर दिया जाये परन्तु पंचायत चुनावों में 24 मौतों के दाग को ममता बनर्जी कैसे धोयेगीं ? विधानसभा के उपचुनाव में विजय से तृणमूल कांग्रेस के प्रति जनता का रुझान बरकरार दिखता है, इसके बावजूद चुनावी हिंसा से विरोधियों को नेस्तनाबूद करने की क्या जरुरत है ?

बंगाल चुनावों में टीएमसी प्रायोजित हिंसा - लोकतन्त्र के लिए खतरे की घंटी

पश्चिम बंगाल के पुरुलिया में एक और राजनीतिक विरोधी की हत्या को आत्महत्या का मामला बताकर भले ही बन्द कर दिया जाये परन्तु पंचायत चुनावों में 24 मौतों के दाग को ममता बनर्जी कैसे धोयेगीं ? विधानसभा के उपचुनाव में विजय से तृणमूल कांग्रेस के प्रति जनता का रुझान बरकरार दिखता है, इसके बावजूद चुनावी हिंसा से विरोधियों को नेस्तनाबूद करने की क्या जरुरत है ?

पंचायत चुनावों में हिंसा की बदौलत टीएमसी की निर्विरोध जीत
चुनाव आयोग द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार बंगाल के पूर्ववर्ती पंचायती चुनावों मे सन् 2003 में 11 फीसदी, सन् 2008 में 5.57 फीसदी और सन् 2013 में 10.66 फीसदी सीटों पर निर्विरोध निर्वाचन हुआ था. परन्तु इस साल मई में हुए पंचायती चुनावों में 34 फीसदी सीटों पर निर्विरोध निर्वाचन से सभी कीर्तिमान टूट गये. प. बंगाल में ग्राम पंचायत की कुल 48650 सीटों में 16814, पंचायत समिति की कुल 9217 सीटों में 3059 और जिला पंचायत के कुल 825 सीटों में 203 सीटों में निर्विरोध निर्वाचन से हिंसा और जोर-जबरदस्ती के नये कीर्तिमान बन गये.

पंचायती चुनावों में चुनाव आयोग और संवैधानिक व्यवस्था विफल
पंचायती चुनावों में तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशियों को निर्विरोध विजयी बनाने के लिए सत्तारुढ़ टीएमसी ने सभी तरह के हथकण्डे अपनाये. दमन और अपहरण के बावजूद विरोधी दल के प्रत्याशियों ने यदि सामने आने का साहस किया तो उनमें से कई को चुनावी नामांकन भी नहीं भरने दिया गया. ई-मेल से नामांकन सुविधा की मांग के लिए मामला हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा पर राज्य प्रायोजित हिंसा के आगे सभी संवैधानिक संस्थाएं विफल सी हो गयीं. वोटरों के साथ किसी अन्य व्यक्ति को जाने की अनुमति ना होने के बावजूद राजनीतिक दबंगों को बूथ मैनेंजमेंट की खुली छूट दी गई.

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चुनाव का समय खत्म होने के बावजूद कई केन्द्रों में रात 10 बजे तक वोट डालने की इजाजत के दौरान सिविल वालंटियर्स टीएमसी एजेंट की तरह बर्ताव करते रहे. सुप्रीम कोर्ट ने पंचायत चुनाव में र्निविरोध जीते प्रत्याशियों के रिजल्ट पर रोक लगाते हुए 3 जुलाई को सुनवाई का आदेश दिया है और तभी इस मामले का पूरा सच सामने आ सकेगा. 

बाहुबलियों के राज में चिटफण्ड ऑपरेटर्स की मौज
प. बंगाल के चुनावों में हिंसा की संगठित परम्परा में हर दल के शासन के दौरान बाहुबलियों की ही मौज रही है. शायद इसी वजह से कम्युनिस्ट नेताओं और ममता बनर्जी की साफ छवि के बावजूद, शासन व्यवस्था में सडांध बढ़ती रही. हिंसा के बूथ मैंनेजमेट से जीते उम्मीदवारों से बदलाव की उम्मीद कैसे की जा सकती है? विकास के संकट से जूझती जनता को चिट्फण्ड कम्पनियों और कोयला चोर ऑपरेटर्स के हवाले करने वाली ममता बनर्जी, किस नैतिक धरातल पर देशव्यापी नेतृत्व का दावा कर सकती हैं ?

बंगाल में बौद्धिक अभियान से हिंसात्मक आन्दोलनों की परम्परा
राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के अमर रचयिता रवीन्द्रनाथ टैगोर और बंकिमचन्द्र चटर्जी के बंगाल में बंग-भंग से अंग्रेजों के खिलाफ संगठित आन्दोलन की शुरुआत हुई. आजादी के बाद भी अंग्रेजों की शोषक व्यवस्था में जब बदलाव नहीं हुआ तब नक्सलवाद के हिंसात्मक दौर की शुरुआत भी बंगाल से हुई, जो अब देशव्यापी मर्ज बन गया है. इस हिंसा के खिलाफ खड़ी हुई ममता बनर्जी ने अगस्त 1990 में सीपीएम के बाहुबलियों से लाठियाँ खाईं, पर उन्हीं का इस्तेमाल अब विरोधी दलों पर किया जा रहा है. ममता बनर्जी ने उन सभी हथकण्डों को सफलतापूर्वक अपना लिया है, जिनके सहारे कम्युनिस्टों ने 34 साल तक बंगाल में राज किया.

बंगाल से चुनावी हिंसा के देशव्यापी विस्तार का खतरा
बिस्मार्क ने कहा था कि चुनावों को जीतने के लिए झूठ का सहारा लेना ही पड़ता है और शायद इसी कारण अमेरिका से लेकर भारत के नेताओं में झूठे चुनावी वादों की होड़ लगी रहती है. बंगाल में ममता बनर्जी किसी भी विरोधी को बर्दाश्त नहीं कर सकतीं और इसी राजनीतिक असहिष्णुता से अराजक हिंसा की शुरुआत होती है. क्या अब भाजपा को भी कांग्रेस मुक्त भारत के एजेंडे पर पुर्नविचार नहीं करना चाहिए, जिसे संघ ने भी नामंजूर कर दिया है. प.बंगाल में 2019 के लोकसभा और उसके बाद 2021 में विधानसभा के चुनाव प्रस्तावित हैं. बंगाल की हिंसा से लोकतान्त्रिक तरीके से निपटने की जरुरत है. लोकतन्त्र में सत्ता पक्ष पर अंकुश के लिए सशक्त विपक्ष के जरुरी होने का बौद्धिक सन्देश बंगाल से भारत को मिल रहा है. बंगाल के हिंसात्मक चुनावी मैंनेजमेंट को बेरोजगार युवाओं और सोशल मीडिया के सहारे यदि राजनीतिक विस्तार देने की कोशिश की गई तो यह भारतीय लोकतन्त्र के लिए शुभ नहीं होगा.

(लेखक सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता और संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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