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बजट 2019-कचौरी वाले की टैक्स चोरी और ऑनलाइन की सीनाजोरी

अलीगढ़ के कचौरी वाले की टैक्स चोरी के बारे में मीडिया में सनसनीखेज खबरें हैं. जीएसटी विभाग के आकलन को सही माना जाये तो दुकानदार का व्यापार 60 लाख रुपये से एक करोड़ रुपये सालाना का हो सकता है. यदि यह प्रमाणित हो गया तो सरकार को कुछ लाख रुपये का जीएसटी टैक्स मिल सकता है. दूसरी ओर 15 बड़ी इंटरनेट कंपनियों द्वारा भारत में कारोबार से 20 लाख करोड़ की वैल्यूवेशन अर्जित की जा रही है. लेकिन इन कंपनियों द्वारा अपनी वास्तविक आमदनी के नगण्य हिस्से पर भी टैक्स दिया जा रहा है.

बजट 2019-कचौरी वाले की टैक्स चोरी और ऑनलाइन की सीनाजोरी

वित्त मंत्रालय में हलवा रस्म के बाद 2019 के बजट की गोपनीय प्रक्रिया शुरू हो गई है, जिसे वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 5 जुलाई को पेश करेंगी. जीएसटी की व्यवस्था लागू होने और कस्टम ड्यूटी न्यूनतम होने के बाद व्यापार जगत में अब टैक्स दरों का रोमांच खत्म हो गया है. अब तो अखबारों की अधिकतर सुर्खियाँ ई-कॉमर्स नियमन, डाटा सुरक्षा कानून और अमेरिकी दबाव से संबंधित हैं. बिजनेस टुडे और इकॉनामिक टाइम्स की रिपोर्टों के अनुसार भारतीय उद्योगों के हितों की रक्षा और स्वदेशी के प्रसार के लिए भी दबाव बनना शुरू हो गया है.

कचौरी वाले की टैक्स चोरी और ऑनलाइन में सीनाजोरी-  अलीगढ़ के कचौरी वाले की टैक्स चोरी के बारे में मीडिया में सनसनीखेज खबरें हैं. जीएसटी विभाग के आकलन को सही माना जाये तो दुकानदार का व्यापार 60 लाख रुपये से एक करोड़ रुपये सालाना का हो सकता है. यदि यह प्रमाणित हो गया तो सरकार को कुछ लाख रुपये का जीएसटी टैक्स मिल सकता है. दूसरी ओर 15 बड़ी इंटरनेट कंपनियों द्वारा भारत में कारोबार से 20 लाख करोड़ की वैल्यूवेशन अर्जित की जा रही है. लेकिन इन कंपनियों द्वारा अपनी वास्तविक आमदनी के नगण्य हिस्से पर भी टैक्स दिया जा रहा है.

नेताओं की हेट स्पीच और चुनाव आयोग की लाचारी

संघ के पूर्व प्रचारकों और गांधीवादी द्वारा सरकार को प्रतिवेदन-  इंटरनेट कंपनियों से टैक्स वसूली के लिए संघ से जुड़े केएन गोविंदाचार्य, बसवराज पाटिल (सेडम), रामबहादुर राय और गांधीवादी पीवी राजगोपाल ने वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री को प्रमाण सहित विस्तृत प्रतिवेदन दिया है. संघ के पूर्व प्रचारक गोविन्दाचार्य भाजपा के थिंक टैंक माने जाते थे, जो इंटरनेट कंपनियों के वर्चस्व के खिलाफ लंबे समय से संघर्ष कर रहे हैं. संघ के पूर्व प्रचारक और राज्यसभा के पूर्व सांसद बसवराज पाटिल, भारत विकास संगम के माध्यम से कृषि क्षेत्र में पुर्ननिर्माण हेतु कार्य कर रहे हैं. राम बहादुर राय हिन्दुस्थान समाचार के समूह सम्पादक हैं, जिन्होंने आपातकाल के विरुद्ध जेपी के साथ जनान्दोलन किया था. एकता परिषद के प्रमुख पीवी राजगोपाल भूमिहीन किसानों के लिए जल, जंगल और जमीन के हक के लिए लम्बी लड़ाई लड़ रहे हैं. इन सभी गैर-राजनीतिक लोगों ने अपने सामूहिक प्रतिवेदन में कहा है कि भारतीय संसद सर्वोच्च है और अब इंटरनेट कम्पनियों से टैक्स वसूली के लिए बजट 2019 में स्पष्ट कानूनी प्रावधान किये जायें.

दादाभाई नौरोजी की ड्रेन ऑफ वेल्थ थ्यौरी और नवउपनिवेशवाद-  1857 के स्वाधीनता आन्दोलन के 90 साल बाद 1947 में भारत को राजनीतिक आजादी मिल गई. औद्योगिक क्रान्ति के बाद भारत ब्रिटेन और यूरोप को कच्चा माल आपूर्ति करने वाला गुलाम देश बन गया, इसका विस्तृत विवरण नौरोजी ने किया था. ड्रेन ऑफ वैल्थ के आर्थिक सिद्धान्त का 1867 में प्रतिपादन करते हुए दादाभाई नौरोजी ने उपनिवेशवाद के समापन की मांग की थी, जिस पर अभी भी जंग जारी है. ईस्ट इण्डिया कम्पनी और ब्रिटेन का भारत में शासन खत्म हो गया लेकिन उनकी जगह अब अमेरिकन कंपनियों ने ले लिया है. डिजिटल इण्डिया में विकसित हो रही अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में अमेरिकन और चीनी कंपनियों का वर्चस्व है, लेकिन उनकी आमदनी पर भारत को टैक्स नहीं मिलता. भारत में जरुरी कानून बनाने से रोकने के लिए अमेरिका द्वारा वीजा नियमों में सख्ती की घुड़की दी जा रही है, जिससे सरकार को सख्त तरीके से निपटना चाहिए.

सार्वभौमिक भारत सरकार और अमेरिकी दबाव-  इंटरनेट कंपनियों का मुक्त व्यापार चालू रहे, इसके लिए अमेरिका द्वारा अनेक स्तरों पर लाबिंइग और दबाव बनाया जा रहा है. भारत में लाबिंइग गैर कानूनी है इसके बावजूद इन कंपनियों की कारस्तानी जारी है. गार्जियन अखबार की खबर के अनुसार यूपीए सरकार के दौर में फेसबुक ने लाबिंइग करके भारत में डेटा सुरक्षा के कानून के निर्माण पर रोक लगवा दी थी. इस बारे में जांच के लिए आईटी मंत्रालय की संसदीय समिति को जांच के लिए प्रतिवेदन दिया गया था, जिसका परिणाम आना बाकी है. ई-कॉमर्स कंपनियों को बेलगाम छूट की वजह से छोटे व्यापारी परेशान हो रहे हैं. इस पर मंत्रियों द्वारा चिंता व्यक्त करने के बावजूद जमीनी स्तर पर ठोस कार्यवाही नहीं हो रही है. पेमेंट कंपनियों समेत सभी इंटरनेट कंपनियों द्वारा भारत में डाटा स्टोर करने की नीति से टैक्स वसूली बढ़ने के साथ रोजगार सृजन भी होंगे.

टैक्स वसूली से समाज और भारतीय अर्थव्यवस्था को लाभ-  इंटरनेट कंपनियां नवीनतम तकनीक और भारी संसाधनों की वजह से आगे हैं जिन्हें टैक्स छूट की सुविधा मिलने से छोटे व्यापार और उद्योगों का बुरा हाल है. इंटरनेट कंपनियों से टैक्स वसूली होने का भारत में संसाधनों की बढ़ोतरी होने के साथ छोटे और असंगठित क्षेत्र को संजीवनी मिलेगी. संसाधनों के आगमन से रोजगार सृजन और बजट घाटे में कमी होने के साथ मंदी से भी निपटा जा सकता है. जीडीपी में बढ़ोतरी और गांवों की अर्थव्यवस्था में सुधार हो, तभी तो भारत वास्तविक अर्थों में पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन सकेगा. भारत में डाटा स्टोर होने पर नागरिकों की प्राइवेसी और देश की राष्‍ट्रीय सुरक्षा भी सुनिश्चित हो सकेगी. इंटरनेट कंपनियों के संचार और तकनीक की जरूरत से किसी को इनकार नहीं है लेकिन देश के कानून के अनुसार बड़ी कंपनियां टैक्स दें, तभी वास्तविक अर्थों में खुशहाल न्यू इण्डिया बन सकेगा.

(श्री विराग गुप्ता सुप्रीम कोर्ट के वकील और Taxing Internet Giants: American Comapnies & Data Protection in India पुस्तक के लेखक हैं.)