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नेताओं की हेट स्पीच और चुनाव आयोग की लाचारी

चुनावों की घोषणा के बाद चुनाव आयोग ने सरकारी वेबसाइटों से मन्त्रियों की फोटो हटाने का आदेश जारी किया था. इसके बावजूद राज्य और केन्द्र के मंत्रियों के सरकारी सोशल मीडिया एकाउंट जैसे फेसबुक और ट्वीटर पर कोई रोक नहीं लगाई गई. 

नेताओं की हेट स्पीच और चुनाव आयोग की लाचारी

रामायण के एक अद्भुत प्रसंग में हनुमान जी को उनकी सोई हुई शक्ति की याद दिलाये जाने के बाद, बजरंग बली समुद्र पार करके लंका दहन कर देते हैं. बजरंग बली और अली के सियासी ध्रुवीकरण के दौर में सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद चुनाव आयोग ने भी ताबड़तोड़ कार्रवाई कर डाली. सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने आज सुनवाई के दौरान कहा कि, लगता है कि चुनाव आयोग को उनकी शक्तियाँ वापस मिल गई हैं. इस बारे में सभी कानून पूरी तरह से स्पष्ट हैं, लेकिन चुनाव आयोग के पास इच्छाशक्ति की कमी है, जिस वजह से ये विवाद हो रहे हैं-

सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग ने खुद को शक्तिहीन माना
नेताओं की हेड स्पीच के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने कहा कि, आयोग शक्तिविहीन है. आयोग के अनुसार उन्हें नोटिस भेजने और जवाब मांगने का सीमित अधिकार है. आयोग के अनुसार नेताओं के खिलाफ सिर्फ केस ही दर्ज कराया जा सकता है. आयोग के अनुसार वे ना तो किसी नेता को अयोग्य करार दे सकता है और ना ही पार्टी की मान्यता रद्द कर सकता है. चुनाव आयोग ने मेनका गांधी, योगी आदित्यनाथ, आजम खान और मायावती के खिलाफ आचार-संहिता के उल्लंघन के तहत कार्रवाई की गई है. आयोग द्वारा खुद को शक्तिहीन बताने के बाद इस कार्रवाई का नेताओं द्वारा अनुपालन नहीं किया जाये, तो फिर आयोग क्या करेगा?

चुनाव आयोग के लिए सुप्रीम कोर्ट थानेदार नहीं है
सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग दोनों को भारत के संविधान से शक्तियाँ मिली हैं. पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की थी कि वह चुनाव आयोग के लिए थानेदार की भूमिका नहीं निभा सकता? बाम्बे हाईकोर्ट में सोशल मीडिया कम्पनियों के खिलाफ सुनवाई हो रही है, जिसमें चुनाव आयोग भी पार्टी है. हाईकोर्ट ने इस बारे में 29 मार्च को एक आदेश पारित किया, जिसके पैरा-14 में चुनाव आयोग की शक्तियों का उल्लेख है. सुप्रीम कोर्ट ने एडीआर मामले में चुनाव आयोग की शक्तियों का विश्लेषण करते हुए कहा था कि संविधान के अनुच्छेद-324 के तहत चुनाव आयोग को असीमित शक्तियाँ मिली हुई हैं.

सुप्रीम कोर्ट भी संविधान के अनुच्छेद-142 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करता है तो फिर चुनाव आयोग अनुच्छेद-324 के तहत अपनी शक्तियों और अधिकार क्षेत्र के बारे में क्यो भ्रमित है?

संविधान के तहत नेताओं के मूल अधिकार और आचार संहिता की नैतिकता
चुनाव आयोग ने 15 अप्रैल को चार नेताओं के खिलाफ संविधान के अनुच्छेद-324 के तहत जारी आदेश में आचार संहिता के उल्लंघन का मामला बनाया है. इस आदेश के अनुसार निर्धारित समय-सीमा में चारों नेता किसी भी जनसभा, जुलूस, रैली, रोड शो, इंटरव्यू और सोशल मीडिया का हिस्सा नहीं बन सकेंगे? इस आदेश के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हनुमान मन्दिर में पूजा के लिए गये, जिसका टीवी चैनलों में प्रसारण भी हुआ. संविधान के तहत सभी नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के साथ धार्मिक आस्था का भी मूल अधिकार है. क्या चुनाव आयोग अपने आदेश से संविधान के तहत प्रदत्त अधिकारों का हनन कर सकता है?

टीवी और सोशल मीडिया के दौर में चुनाव आयोग के आदेश का अनुपालन
चुनावों की घोषणा के बाद चुनाव आयोग ने सरकारी वेबसाइटों से मन्त्रियों की फोटो हटाने का आदेश जारी किया था. इसके बावजूद राज्य और केन्द्र के मंत्रियों के सरकारी सोशल मीडिया एकाउंट जैसे फेसबुक और ट्वीटर पर कोई रोक नहीं लगाई गई. 2009 के चुनावों के बाद सोशल मीडिया का भारत में इस्तेमाल बढ़ा. हमारे प्रतिवेदन पर चुनाव आयोग ने अक्टूबर 2013 में सोशल मीडिया के लिए आचार संहिता जारी तो किया लेकिन 2014 के आम चुनावों में उन नियमों को पूरी तरह से लागू नहीं किया गया.

2019 का आम चुनाव अब सभी पार्टियों द्वारा सोशल मीडिया के माध्यम से लड़ा जा रहा है. कांग्रेस, भाजपा, आप, तेदेपा जैसी सभी पार्टियों ने आई. टी. सेल और वार रुम बनाये हैं. तकनीकी के नये दौर में चुनाव आयोग द्वारा अधिकारों के इस्तेमाल की बजाए, लाचारी दिखाते हुए सोशल मीडिया कम्पनियों के लिए ऐच्छिक कोड बना दिया गया. जिन नेताओं पर बंदिश लगी है, उन्हें टीवी और सोशल मीडिया के माध्यम से ज्यादा प्रचार मिल रहा है, जिस वजह से चुनाव आयोग के आदेश बेमानी हो सकते हैं.

पार्टियों और उम्मीदवारों पर कार्रवाई क्यों नहीं
महाराष्ट्र में भड़काऊ भाषण देने पर शिव सेना के नेता बाल ठाकरे और उम्मीदवार प्रभु के खिलाफ चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट ने सख्त कार्रवाई की थी. नेताओं द्वारा पार्टी के प्रतिनिधि के तौर पर चुनाव प्रचार किया जाता है तो फिर उनके बयानों के लिए पार्टी और उम्मीदवारों की जवाबदेही क्यों नहीं तय होनी चाहिए? छुटपुट अपराधों के लिए आम जनता को गिरफ्तार कर लिया जाता है तो फिर लोकतन्त्र को संकट में डालने वाले नेताओं के खिलाफ एफआईआर की औपचारिकता मात्र क्यों की जाती है? नेताओं के बयानों के लिए पार्टी अध्यक्ष की भी जवाबदेही क्यों नहीं होनी चाहिए? चुनाव आयोग द्वारा राजनीतिक दलों का रजिस्ट्रेशन किया जाता है. नेताओं की नफरत और हेट स्पीच से लोकतन्त्र को बचाने के लिए दलों की मान्यता निलम्बित करने का ब्रह्मास्त्र अब चुनाव आयोग को इस्तेमाल करना ही चाहिए.

(लेखक विराग गुप्‍ता सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता और संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ हैं. Election on the Roads पुस्‍तक के लेखक हैं.)

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)