देश में अवॉर्ड वापसी के 'खेल' का क्‍या है पूरा सच?
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देश में अवॉर्ड वापसी के 'खेल' का क्‍या है पूरा सच?

1954 से साहित्य अकादमी पुरस्कार की शुरूआत हुई थी. पिछले 66 सालों में लगभग 1900 साहित्य पुरस्कार दिए गए हैं और मात्र 39 लोगों ने ही अवॉर्ड वापसी का ऐलान किया. हर साल लगभग 2,400 लेखक, साहित्यकार और विद्वान साहित्य के चारों पुरस्कारों की चयन प्रक्रिया में शामिल होते हैं.  

 

देश में अवॉर्ड वापसी के 'खेल' का क्‍या है पूरा सच?

देश में 2014 लोक सभा चुनाव के बाद अवॉर्ड वापसी के ऐलान की एक नई परंपरा की शुरूआत हुई. जिसे अवॉर्ड वापसी गैंग के नाम से भी जाना जाता है. आपको याद होगा कि 2015 में उत्तर प्रदेश के दादरी और कर्नाटक की घटना के बाद अचानक से कुछ खास विचारधारा के साहित्यकार और लेखकों ने अवॉर्ड वापसी का ऐलान किया था. ये कुछ खास चेहरे बेहद आहत दिखाई दे रहे थे. इनके मुताबिक देश में असहिष्णुता बढ़ रही थी और उसके विरोध में अपना अवॉर्ड वापस करने लगे.  

2015 में हुई शुरुआत
2015 में इसकी शुरुआत में लेखक अशोक वाजपेयी ने अपना साहित्य अकादमी का पुरस्कार लौटाने का ऐलान किया था. जिसके बाद देश भर के 39 साहित्यकारों ने साहित्य अकादमी से जुड़े अवॉर्ड को वापस करने का ऐलान किया. इस लिस्ट में अशोक वाजपेयी के साथ नयनतारा सहगल, उदय प्रकाश, कृष्णा सोब्ती, मंगलेश डबराल, काशीनाथ सिंह, राजेश जोशी, केकी दारूवाला, अंबिकादत्त, मुनव्वर राणा, खलील मामून, सारा जोसेफ, इब्राहिम अफगान, अमन सेठी जैसे बड़े नाम शामिल थे.  

उस वक्त ये सभी साहित्यकार और लेखक मीडिया की सुर्खियों में थे लेकिन क्या कभी किसी ने यह जानने की कोशिश भी की कि वास्तव में अवॉर्ड वापस हो सकता है? जिन लोगों ने अवॉर्ड वापस का ऐलान किया था, क्या उन्होंने अपने अवॉर्ड वापस किए? स्मृति चिन्ह और अवॉर्ड की धनराशि को क्या जमा करने की कोशिश की? या फिर सिर्फ मीडिया की सुर्खियां ही बटोरने में लगे हुए थे. 

अवॉर्ड वापसी की सच्चाई 
मैं इस पूरे मामले की जानकारी के लिए दिल्ली के साहित्य अकादमी के मुख्यालय पर गया. जहां मेरी मुलाकात साहित्य अकादमी के सेक्रेटरी के श्रीनिवासव राव से हुई. मैंने साहित्य अकादमी से अवॉर्ड वापसी का ऐलान करने वाले लेखकों और साहित्यकारों की पूरी सूची मांगी. अवॉर्ड वापसी का ऐलान करने वाले लेखकों की लिस्ट का अध्ययन करने पर कई चौंकाने वाले खुलासे हुए और अवॉर्ड वापसी करने वालों की एक एक सच्चाई सामने आई.

अवॉर्ड वापसी का ऐलान करने वाले 39 साहित्यकारों में से 26 ने अपना स्मृति चिन्ह वापस नहीं किया, सिर्फ 13 ने ही स्मृति चिन्ह वापस किए. 4 लेखकों ने ना तो स्मृति चिन्ह ही वापस किया और ना ही अवॉर्ड की धनराशि, यानि सिर्फ अवॉर्ड वापसी का ऐलान किया. अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि इनके कितने चेहरे हैं, पब्लिक में अवॉर्ड वापसी का ऐलान करते हैं लेकिन सच्चाई बहुत अलग होती है. सच्चाई यह है कि इन्हें अपने अवॉर्ड से बहुत लगाव होता है लेकिन प्रतीकात्मक विरोध दर्ज कराने के चलते ये इतने महत्वपूर्ण अवॉर्ड का सम्मान भूल जाते हैं. 

सिर्फ 13 ने ही स्मृति चिन्ह और पैसे दोनों लौटाए
सिर्फ 13 लेखकों ने ही पैसे और स्मृति चिन्ह दोनों लौटाए. हालांकि 39 में से 35 लेखकों ने अवॉर्ड की धनराशि वापस करने के लिए साहित्य अकादमी को चेक ऑफर किया है. लेकिन साहित्य अकादमी का ऐसा कोई नियम नहीं है, जिसके मुताबिक साहित्य अकादमी अवॉर्ड वापस ले सके. जिन 35 साहित्यकारों ने अवॉर्ड के पैसे लौटाने के चेक साहित्य अकादमी को दिए हैं, उनके पैसे आज भी उन्हीं के बैंक खातों में मौजूद हैं. उस पैसे को साहित्य अकादमी अपने पास वापस नहीं ले सकती है. ये नियम इन सभी लेखकों और साहित्यकारों को अच्छी तरह से पता है, क्योंकि साहित्य अकादमी इन्हीं लेखकों और साहित्यकारों द्वारा ही संचालित होती है. इसके बावजूद भी इनके द्वारा अवॉर्ड वापसी का ऐलान करना महज सुर्खियों में बने रहने का और एक प्रोपेगैंडा फैलाने का खेल ही नजर आता है.  

सिर्फ घोषणा, वापसी नहीं
अब आपको अवॉर्ड वापसी का ऐलान करने वाले उन 4 लेखकों के बारे में बताते हैं, जिन्होंने अवॉर्ड वापसी की कोई भी प्रक्रिया शुरू नहीं की, सिर्फ घोषणा की. उर्दू के ख़लील मामून को 2011 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था, इन्होंने अपने अवॉर्ड वापसी का ऐलान किया था लेकिन ख़लील मामून ने ना ही अवॉर्ड का स्मृति चिन्ह और ना ही पुरस्कार की राशि लौटाने का ऑफर किया. इन्हें एक लाख रूपये की सम्मान राशि दी गई थी.

असमी लेखक निरूपमा बोरगोहेन को 1996 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था, पुरस्कार के वक्त स्मृति चिन्ह और 25 हजार रूपये की सम्मान राशि मिली थी. इन्होंने भी ना तो स्मृति चिन्ह लौटाया और ना ही पैसे लौटाने का कोई ऑफर किया.

मराठी लेखक इब्राहिम अफगान को 2002 में साहित्य पुरस्कार मिला था, स्मृति चिन्ह के साथ 15 हजार रूपये की सम्मान राशि भी मिली थी लेकिन इन्होंने स्मृति चिन्ह और पैसे दोनों ही वापस करने का ऑफर साहित्य अकादमी को नहीं किया, सिर्फ अवार्ड वापसी का ऐलान ही किया.

अंग्रेजी लेखक अमन सेठी को 2012 में युवा साहित्य पुरस्कार से नवाजागया था, 50 हजार रूपये की सम्मान राशि दी गई थी. इन्होंने भी अवॉर्ड वापसी का सिर्फ ऐलान किया था. अमन सेठी ने भी ना ही स्मृति चिन्ह और ना ही पैसे वापस करने का ऑफर किया. 
 
26 लेखक जिन्होंने स्मृति चिन्ह नहीं लौटाया   
हिंदी के उदय प्रकाश को 2010 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था, अवॉर्ड के साथ 1 लाख रूपये की सम्मान राशि मिली थी. इन्होंने 1 लाख रूपये का चेक साहित्य अकादमी को सौंपा. साहित्य अकादमी के मुताबिक उदय प्रकाश ने स्मृति चिन्ह वापस नहीं किया है. हिंदी के अशोक वाजपेयी को 1994 में साहित्य पुरस्कार मिला था, उस वक्त अशोक वाजपेयी को 25 हजार रूपये की अवॉर्ड राशि मिली थी, हालांकि अशोक वाजपेयी ने 1 लाख रूपये का चेक साहित्य अकादमी को वापस किया है लेकिन स्मृति चिन्ह वापस नहीं किया.

कृष्णा सोबती को 1980 में साहित्य पुरस्कार और 5 हजार रूपये की अवॉर्ड राशि मिली थी. कृष्णा सोबती ने 10 हजार रूपये का चेक साहित्य अकादमी को सौंपा लेकिन स्मृति चिन्ह नहीं. काशीनाथ सिंह को 2011 में अवॉर्ड मिला था, 1 लाख रूपये की अवार्ड राशि भी मिली. 1 लाख रूपये साहित्य अकादमी को सौंप दिया लेकिन स्मृति चिन्ह अभी तक देने का ऑफर नहीं किया. नयनतारा सहगल को 1986 में साहित्य पुरस्कार मिला, 10 हजार रूपये की अवॉर्ड राशि मिली थी, हालांकि नयनतारा सहगल ने भी 1 लाख रूपये का चेक साहित्य अकादमी को लौटाया है लेकिन स्मृति चिन्ह वापस नहीं किया.

राजेश जोशी को 2002 में अवॉर्ड मिला था, पैसे वापस करने का ऑफर किया लेकिन स्मृति चिन्ह नहीं. केकी दारूवाला को 1984 में अवॉर्ड मिला था, पैसे वापस करने का ऑफर किया लेकिन स्मृति चिन्ह नहीं. गुजराती के अनिल जोशी को 1990 में अवॉर्ड मिला था, पैसे वापस करने का ऑफर किया लेकिन स्मृति चिन्ह नहीं. पंजाबी के वरयम सिंह संधु, सुरजीत पतार, जसविंदर, गुरवचन भुल्लर, बलदेव सिंह, दर्शन बुटेर, अजमेर सिंह औलख, मोहन भंडारी और परगट सिंह ने पैसे वापस करने का ऑफर किया लेकिन स्मृति चिन्ह नहीं.

राजस्थानी के अंबिकादत्त को 2013 में अवॉर्ड मिला था, 1 लाख रूपये की अवार्ड राशि मिली थी. पैसे वापस करने का ऑफर किया लेकिन स्मृति चिन्ह नहीं. कश्मीरी भाषा के गुलाब नबी ख्याल को 1976 में अवार्ड मिला था, 5 हजार रूपये की अवॉर्ड राशि मिली थी. पैसे वापस करने का ऑफर किया लेकिन स्मृति चिन्ह नहीं. असमी भाषा के होमेन बोरगोहेन और बंगाली के मंडाक्रांता सेन ने भी स्मृति चिन्ह वापस नहीं किया. राजस्थान के नंद भारद्वाज ने अवॉर्ड वापसी का अपना फैसला वापस ले लिया था. 

अवॉर्ड राशि व स्मृति चिन्ह दोनों वापस करने का ऑफर करने वाले
मंगलेश डबराल, जी.एन. डेवी, आत्मजीत, कुम वीरभद्रप्पा, रहामत तरीकेरे, देवानुरू महादेवा, मरगूब बनीहली, मुनव्वर राणा (इन्होंने 1 लाख का चेक साहित्य अकादेमी को भेजा लेकिन बिना नाम का). सारा जोसेफ, कात्ययानी विद्महे, चमनलाल, जी.एन. रंगानथा राव, एम भूपाल रेड्डी. 

बता दें, साहित्य अकादमी एक स्वायत्त संस्था है, जो कि लेखकों के द्वारा ही चलाई जाती है. हर साल साहित्य पुरस्कारों का सेलेक्शन लेखकों और साहित्यकारों की ज्यूरी करती है. 1954 से साहित्य अकादमी पुरस्कार की शुरूआत हुई थी. पिछले 66 सालों में लगभग 1900 साहित्य पुरस्कार दिए गए हैं और मात्र 39 लोगों ने ही अवॉर्ड वापसी का ऐलान किया. हर साल लगभग 2,400 लेखक, साहित्यकार और विद्वान साहित्य के चारों पुरस्कारों की चयन प्रक्रिया में शामिल होते हैं.  

ज्यूरी और अवार्ड वापसी गैंग कनेक्शन!
अब आपको अवॉर्ड वापसी का ऐलान करने वाले लेखकों और साहित्यकारों के बारे में एक और रोचक तथ्य बताते हैं. दरअसल एक दूसरे को अवॉर्ड देने के लिए ज्यूरी में यह लेखक होते हैं. 2010 में उदय प्रकाश को साहित्य अकादमी अवॉर्ड के लिए चुना गया. उदय प्रकाश को अशोक वाजपेयी, चित्रा मुद्गल और एम पाण्डेय की ज्यूरी ने सेलेक्ट किया. यहां पर ध्यान देने वाली बात यह है कि जिन अशोक वाजपेयी ने इन्हें अवॉर्ड देने के लिए सेलेक्ट किया, उन्हीं अशोक वाजपेयी के साथ उदय प्रकाश ने साहित्य अकादमी अवॉर्ड वापसी का ऐलान किया. 2002 में राजेश जोशी को साहित्य अकादमी अवॉर्ड देने वाली ज्यूरी में भी अशोक वाजपेयी मौजूद थे, राजेश जोशी ने भी अवॉर्ड वापसी का ऐलान किया. 

2014 में पंजाबी भाषा से जसविंदर को साहित्य अकादमी अवॉर्ड देने वाली ज्यूरी में आत्मजीत मौजूद थे. इसके बाद आत्मजीत और जसविंदर दोनों ने ही अवॉर्ड वापसी का ऐलान किया. 2014 में उर्दू के लिए मुनव्वर राणा को साहित्य अकादमी अवॉर्ड देने वाली ज्यूरी में ख़लील मामून, शीन काफ निज़ाम और मोहम्मद इंद्रीश अंबर बहराइची थे. यहां पर ध्यान देने वाली बात यह है कि मुनव्वर राणा और ख़लील मामून दोनों ने ही अवॉर्ड वापसी का ऐलान किया. साहित्य अकादमी अवॉर्ड वापस करने का ऐलान करने वाली सारा जोसेफ 2017 के बाल साहित्य अवॉर्ड की ज्यूरी में शामिल थीं. जी.एन डेवी ने भी अपना अवॉर्ड वापस करने का ऐलान किया लेकिन 2019 में साहित्य अकादमी अवॉर्ड की ज्यूरी में वो शामिल रहे. साहित्य अकादमी के सचिव के. एस. राव ने बताया कि इसी ज्यूरी ने शशि थरूर को साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया. यही नहीं अवॉर्ड वापसी का ऐलान करने वाले अधिकतर साहित्यकार आज भी साहित्य अकादमी से जुड़े हैं और इनके अधिकतर कार्यक्रमों में हिस्सा लेते हैं. साहित्य अकादमी अवॉर्ड की ज्यूरी में शामिल होते हैं.   
 
जो दिखता है वो होता नहीं?
कुल मिलाकर यह समझा जा सकता है कि जो दिखता है वो होता नहीं है. कुछ खास एजेंडे के लिए कई लोग साहित्य अकादमी जैसे बड़े सम्मान को वापस करने का ऐलान करते हैं लेकिन पूरी तरह से कोई भी नियम फॉलो नहीं करते हैं. यह अवॉर्ड उनके लेखन के लिए दिया गया है, इन अवॉर्ड का किसी सरकार के पक्ष या विरोध से क्या मतलब हो सकता है. साहित्यकार, लेखक हमेशा देश और समाज को नया रास्ता दिखाते हैं लेकिन क्या इस तरह का अवॉर्ड वापसी एजेंडा हमारे समाज के लिए ठीक है. यह विचार और बहस का विषय है.  

मैंने साहित्यकार अशोक वाजपेयी से अवॉर्ड वापसी को लेकर बातचीत करनी चाही. पिछले कई दिनों से उन्हें फोन कर रहा था, उनसे बातचीत हुई. 24 दिसंबर सुबह 9 बजे इंटरव्यू के लिए तैयार हुए लेकिन 24 दिसंबर की सुबह अशोक वाजपेयी ने लगभग 10 बजे मैसेज किया कि ‘इस वक्त वो किसी से मिल नहीं सकते, अपने प्रश्न आप मुझे मैसेज कर दीजिए’. मैंने 4 सवाल अशोक वाजपेयी को मैसेज पर भेजे, फिर उन्होंने अपना ईमेल आईडी मुझे दिया और कहा कि अपने प्रश्न मुझे ईमेल कर दीजिए. मैंने अशोक वाजपेयी को 4 सवाल ईमेल पर भी भेज दिए और शाम 5 बजे तक जवाब देने के लिए निवेदन किया. लेकिन अशोक वाजपेयी का जवाब 24 दिसंबर, रात 9 बजे तक भी नहीं आया. 

जो 4 सवाल मैंने अशोक वाजपेयी से पूछे- 
आपने साहित्य अकादमी अवॉर्ड को वापस करने का ऐलान किया था, क्या आपने अपना स्मृति चिन्ह और अवॉर्ड की राशि वापस की? 
क्या सिर्फ मीडिया की सुर्खियों में बने रहने के लिए आपने ऐलान कर दिया कि अवॉर्ड वापस करेंगे, सच्चाई में तो आपने वापस करने का ऑफर नहीं किया, हमें जो जानकारी साहित्य अकादमी से मिल रही है. 
साहित्य अकादमी के मुताबिक आपकी तरफ से अवार्ड की राशि वापस करने का चेक ऑफर किया गया है लेकिन स्मृति चिन्ह वापस करने का ऑफर नहीं किया गया है, क्या कहना चाहेंगे आप? 
इतना बड़ा अवॉर्ड, साहित्य के सम्मान में आपको मिला था. आपको यह अच्छे से जानकारी थी कि यह अवॉर्ड वापस करने का नियम साहित्य अकादमी का नहीं है. लेकिन फिर भी आपने ऐसा ऐलान किया, क्या यह साहित्य अकादमी अवॉर्ड का अपमान नहीं? हमें अभी भी अशोक वाजपेयी के जवाब का इंतजार होगा, उनका बयान अगर आता है तो उसे जरूर शामिल किया जाएगा. 

ख़लील मामून भी नहीं दे पाए जवाब
इसी तरह से मैंने ख़लील मामून से भी प्रतिक्रिया लेने की कोशिश की. उनसे 22 दिसंबर को फोन पर बातचीत हुई, वो शुरूआत में तो इंटरव्यू के लिए तैयार हो गए. ख़लील मामून बेंगलुरु में थे, मैंने अपने सहयोगी को इंटरव्यू के लिए सूचित किया लेकिन थोड़ी देर में ख़लील मामून का Whats App पर मैसेज आया कि वो 2-3 दिन निजी कार्यों में व्यस्त हैं, इसलिए बातचीत नहीं हो पाएगी. उसके बाद मैंने उनसे Whats App पर पूछा कि क्या आपने साहित्य अकादमी को अपने अवॉर्ड का स्मृति चिन्ह और राशि का चेक वापस कर दिया है? खल़ील मामून ने जवाब भेजा कि ‘आप साहित्य अकादमी से पता करिए’. उसके बाद मैंने कहा कि साहित्य अकादमी के मुताबिक आपने ना तो स्मृति चिन्ह वापस किया है और ना ही अवॉर्ड राशि का चेक. मैंने खल़ील मामून को भी 4 सवाल Whats App पर भेजे, उन्होंने पढ़ भी लिया लेकिन कोई जवाब नहीं दिया. 

लेखिका नयनतारा सहगल से मैंने फोन पर बात की, उनसे उनका पक्ष जानना चाहा. उन्होंने टीवी पर कोई भी इंटरव्यू देने से मना कर दिया लेकिन अवॉर्ड वापसी के बारे में काफी जानकारी दी. नयनतारा सहगल जी ने कहा कि मेरा बयान कहीं भी इस्तेमाल नहीं किया जाए, हम उनकी भावनाओं का सम्मान करते हैं, इसलिए बिना उनकी मर्जी के उनका बयान इस्तेमाल नहीं करेंगे. अंग्रेजी साहित्यकार अमन सेठी को भी ईमेल भेजकर उनका पक्ष जानने की कोशिश की लेकिन उनकी तरफ से भी अभी तक का जवाब नहीं आया है. 

क्या कहना है साहित्य अकादमी का
वहीं Zee News से बातचीत के दौरान साहित्य अकादमी के सचिव के.एस. राव ने कहा कि अवॉर्ड वापसी का ऐलान करने वाले अधिकतर साहित्यकार आज भी साहित्य अकादमी से जुड़े हुए हैं. साहित्य अकादमी का कोई ऐसा नियम नहीं है, जिसके तहत अवॉर्ड वापस लिया जा सके. इस नियम से सभी साहित्यकार अच्छी तरह से परिचित हैं. जिन लोगों ने 2015 में अवॉर्ड लौटाने का ऐलान किया था, वो उसके बाद भी अवॉर्ड सेलेक्शन ज्यूरी में रहे हैं. साहित्य अकादमी एक स्वायत्त संस्था है जो कि साहित्यकारों द्वारा ही चलाई जाती है. हम सभी साहित्यकारों का सम्मान करते हैं. कुछ साहित्यकारों ने अवॉर्ड की राशि का चेक लौटाया है लेकिन आज भी वो चेक वैसे ही रखे हैं, उसके पैसे उनके बैंक खाते से कटे नहीं हैं, क्योंकि हम वापस नहीं ले सकते हैं. कई साहित्यकारों ने स्मृति चिन्ह और चेक दोनों लौटाए हैं लेकिन कई ऐसे भी हैं जिन्होंने ना तो स्मृति चिन्ह लौटाने और ना ही चेक वापस करने का ऑफर किया. कई ने चेक लौटा दिए लेकिन स्मृति चिन्ह नहीं लौटाए. 

अब आप स्वयं अंदाजा लगाइए कि अवॉर्ड वापसी का ऐलान करने वाले साहित्यकारों का असली एजेंडा क्या हो सकता है? 

(लेखक विशाल पाण्डेय, ZEE NEWS में पत्रकार हैं. इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी विचार हैं)

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