दान करो पर उसका अभिमान मत करो, जानिए श्रीकृष्ण ने कैसे तोड़ा पांडवों का घमंड

इंद्रप्रस्थ में पांडवों को अपने दान का अभिमान होने लगा तब कृष्ण समझ गए कि इनका अभिमान तोड़ना होगा. प्रिय पांडवों को धर्म के मार्ग पर लाने के लिए श्रीकृष्ण ने लीला रची, जानिए कैसे पांडवों को हुआ अपनी गलती का अहसास

Written by - Zee Hindustan Web Team | Last Updated : May 15, 2021, 08:53 AM IST
  • ब्राह्मण ने मांगा पांडवों से चंदन की लकड़ी का दान
  • कर्ण ने बिना देर किए तोड़ अपने चंदन के दरवाजे
दान करो पर उसका अभिमान मत करो, जानिए श्रीकृष्ण ने कैसे तोड़ा पांडवों का घमंड

नई दिल्लीः राज्य का विभाजन होने के बाद पांडवों को इंद्रप्रस्थ मिला और वे सुख से राज्य करने लगे. प्रजा बहुत सुखी थी और युधिष्ठिर धर्म में रत रहते थे. वह नित्य दान-धर्म किया करते थे और द्वार पर आने वाला खाली नहीं जाता था. बल्कि कुछ दिनों बाद तो किसी को द्वार पर आना ही नहीं पड़ता था. हर जरूरत मंद की जरूरत पूरी हो जाती थी और वह संचय भी कर सकता था. 

पांडवों को होने लगा अभिमान
धीरे-धीरे पांडवों को इसका अभिमान होने लगा. खासकर अर्जुन और भीम तो इस अभिमान के अधिक ही प्रभाव में आ गए. एक दिन उन्होंने कृष्ण से भी यही बात कह दी. तब कृष्ण ने कर्ण की प्रशंसा करते हुए कहा कि उस जैसा महान दानी कोई नहीं है.

भीम-अर्जुन ने इसका प्रमाण मांगा. खुद युधिष्ठिर भी चकित रह गए और इसका कारण जानना चाहिए. तब श्रीकृष्ण ने इस बात को टाल दिया.

ब्राह्मण ने मांगी चंदन की लकड़ी
इस बात को कुछ महीने बीत गए और वर्षा के चौमासे शुरू हो गए. हर तरफ जल ही जल. सूखी धरती तो कहीं दिखती नहीं थी वृक्ष तो क्या ही दिखता और लकड़ी भी कहां ही मिलती. 

इस परिस्थिति में एक याचक युधिष्ठिर के पास आया और बोला, महाराज! मैं आपके राज्य में रहने वाला एक ब्राह्मण हूं और मेरा व्रत है कि बिना हवन किए कुछ भी नहीं खाता-पीता. कई दिनों से मेरे पास यज्ञ के लिए चंदन की लकड़ी नहीं है. यदि आपके पास हो तो, मुझ पर कृपा करें, अन्यथा हवन तो पूरा नहीं ही होगा, मैं भी भूखा-प्यासा मर जाऊंगा.

युधिष्ठिर नहीं दे सके दान
युधिष्ठिर ने तुरंत कोषागार के कर्मचारी को बुलवाया और कोष से चंदन की लकड़ी देने का आदेश दिया. संयोग से कोषागार में सूखी लकड़ी नहीं थी. तब महाराज ने भीम व अर्जुन को चंदन की लकड़ी का प्रबंध करने का आदेश दिया. लेकिन काफी दौड़- धूप के बाद भी सूखी लकड़ी की व्यवस्था नहीं हो पाई.

तब ब्राह्मण को हताश होते देख कृष्ण ने कहा, मेरे अनुमान से एक स्थान पर आपको लकड़ी मिल सकती है, आइए मेरे साथ.

तब सभी वेश बदलकर कर कर्ण के पास गए
ब्राह्मण यह सुनकर खुश हो गए. तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन व भीम से भी वेष बदलने को कहा और ब्राह्मण के संग लेकर चल दिए. वे सभी कर्ण के महल में गए. सभी ब्राह्मणों के वेष में थे, अत: कर्ण ने उन्हें पहचाना नहीं. याचक ब्राह्मण ने जाकर लकड़ी की अपनी वही मांग दोहराई. कर्ण ने भी अपने भंडार के मुखिया को बुलवा कर सूखी लकड़ी देने के लिए कहा, वहां भी सूखी लकड़ी नहीं थी.

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कर्ण ने ऐसे दान की चंदन की लकड़ियां
ऐसे में ब्राह्मण निराश हो गया. अर्जुन और भीम प्रश्न-सूचक निगाहों से भगवान कृष्ण को ताकने लगे. लेकिन श्री कृष्ण अपनी चिर-परिचित मुस्कान लिए चुपचाप बैठे रहे. तभी कर्ण ने कहा, हे ब्राह्मण देव! आप निराश न हों, एक उपाय है मेरे पास.

उसने अपने महल के खिड़की-दरवाजों में लगी चंदन की लकड़ी काट-काट कर ढेर लगा दी, फिर ब्राह्मण से कहा, आपको जितनी लकड़ी चाहिए, कृपया ले जाइए. कर्ण ने लकड़ी ब्राह्मण के घर पहुंचाने का प्रबंध भी कर दिया. ब्राह्मण कर्ण को आशीर्वाद देता हुआ लौट गया. 

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पांडवों का टूट गया अभिमान
पांडव व श्रीकृष्ण भी लौट आए. भीम और अर्जुन समझ गए थे कि साधारण अवस्था में दान देना कोई विशेषता नहीं है, असाधारण परिस्थिति में किसी के लिए अपना सबकुछ त्याग देने का ही नाम दान है. नहीं तो चंदन की लकड़ी के खिड़की-द्वार तो युधिष्ठिर के महल में भी थे. 

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