Jagannath Rath Yatra 2021: वह करुण कथा जिसके कारण हर साल क्वारंटाइन होते हैं जगन्नाथ

आने वाली ज्येष्ठ पूर्णिमा को भगवान जगन्नाथ का अनासार उत्सव (Anasar Festival) मनाया जाएगा. यह उत्सव रथयात्रा (Jagannath Rath Yatra 2021) से ठीक 15 दिन पहले मनाया जाता है. 

Written by - Zee Hindustan Web Team | Last Updated : Jun 15, 2021, 08:12 AM IST
  • ज्येष्ठ पूर्णिमा को मनाया जाता है अनासर उत्सव
  • प्रभु जगन्नाथ पड़ जाते हैं बीमार, नहीं देते दर्शन
Jagannath Rath Yatra 2021: वह करुण कथा जिसके कारण हर साल क्वारंटाइन होते हैं जगन्नाथ

नई दिल्लीः Jagannath Rath Yatra 2021: ओडिशा के पुरी धाम की जगन्नाथ रथयात्रा जितनी अधिक प्रसिद्ध है, उससे कहीं अधिक वह रोचक, रहस्यमयी और विचित्रता से भरी है. जिसमें इतने सारे पौराणिक आख्यान और कारण हैं जो कहानियां बनकर लोगों के बीच मौजूद हैं और मानवों को देवताओं का आभास कराते रहते हैं. 

ऐसी ही एक कहानी है भगवान जगन्नाथ के बीमार पड़ जाने की. संसार के सारे रोग-कष्ट दूर करने वाले भगवान जगन्नाथ बीमार पड़ जाते हैं. आइसोलेशन और क्वारंटाइन जैसे शब्द तो कोरोना आने के बाद पिछले दो सालों में हमने जाने हैं, लेकिन सदियों पहले से चली आ रही परंपरा के मुताबिक भगवान जगन्नाथ एकांतवास में चले जाते हैं और वे बीमार भी पड़ जाते हैं. 

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ज्येष्ठ पूर्णिमा को बीमार पड़ते हैं भगवान

आने वाली ज्येष्ठ पूर्णिमा को भगवान जगन्नाथ का अनासार उत्सव (Anasar Festival) मनाया जाएगा. यह उत्सव रथयात्रा (Jagannath Rath Yatra 2021) से ठीक 15 दिन पहले मनाया जाता है. ज्येष्ठ पूर्णिमा को देव स्नान पूर्णिमा कहा जाता है. इसके बाद, देवता बीमार पड़ जाते हैं देवताओं के स्नान के लिए कुल 108 औषधिक एवं सुगंधित पानी के बर्तन का उपयोग किया जाता है. 

ज्येष्ठ पूर्णिमा के इस शाही स्नान समारोह के 15 दिन बाद तक तीनों देवता सार्वजनिक दर्शन से दूर रहते हैं इस अवधि को अनासार अवधि के रूप में जाना जाता है इस अवधि के दौरान, भक्त जगन्नाथ मंदिर में भगवान की एक झलक के दर्शन भी नहीं कर पाते हैं और भगवान एकांतवासा में चले जाते हैं. यानी आज की तरह क्वारंटाइन हो जाते हैं. 

इस लीला के पीछे की करुण कथा

इस लीला और उत्सव के पीछे बड़ी ही करुण कथा है. इतनी कि अगर किसी में वास्तव में श्रद्धा हो तो वह रो पड़े. सदियों पहले पुरी में भगवान के एक भक्त माधव दास रहते थे. वह नित्य भगवान की पूजा करते और भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण करते, सामान्य जीवन जीते थे. एक बार वह बीमार पड़े और उन्हें ज्वर (बुखार) हो गया. वह अकेले थे तो कोई उनकी सेवा के लिए नहीं था. फिर भी उन्होंने अपनी भक्ति में कोई कमी नहीं की. लोग उन्हें सलाह तो बहुत देते लेकिन उपचार के लिए कोई न ले जाता. 
 
माधवदास भी कहते कि जब भगवान मेरा ख्याल रख रहे हैं तो मुझे किसी की क्या जरूरत. बीमारी बढ़ते-बढ़ते अतिसार बन गई. तब एक दिन भगवान खुद आए और उनकी सेवा करने लगे. जगन्नाथ जी उनके मल-मूत्र साफ करते, नहलाते, कपड़े बदलते और अपने हाथ भोजन-औषधि देते. माधवदास जब ठीक होने लगे तब उन्होंने पहचाना कि भगवान खुद उनकी सेवा में लगे हैं. 

इसलिए पड़ते हैं भगवान बीमार

तब माधव दास रो पड़े. उन्होंने कहा कि आप मेरी सेवा करने क्यों आए? आप मुझे तुरंत ठीक भी तो कर सकते थे. तब जगन्नाथ जी ने कहा, मैं अपने भक्तों का साथ नहीं छोड़ता, लेकिन उनके कर्म में जो लिखा है वह तो होगा ही, लेकिन चलो, मैं एक एक काम करता हूं. अभी तुम्हारी बीमारी के 15 दिन और शेष हैं. वह मैं अपने ऊपर ले लेता हूं. उस दिन ज्येष्ठ पूर्णिमा थी. 

जगन्नाथ जी अपने श्रीमंदिर पहुंचे और स्नान के बाद से उन्हें ज्वर होने लगा. तब से यह परंपरा पुरी में चल पड़ी. भगवान अपने उसी भक्त माधवदास की बीमारी में बीमार होते हैं और इस दौरान एकांतवास में चले जाते हैं. इसके 15 दिन बाद जब भगवान ठीक होते हैं तब नैनासर उत्सव मनाते हैं, इसके बाद ही भ्रमण के लिए बाहर निकलते हैं. इसे ही संसार रथयात्रा (Jagannath Rath Yatra 2021) के नाम से जानता है. 

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