क्या एक हो पाएगा ठाकरे परिवार?

बाल ठाकरे के परिवार के एक महत्वपूर्ण स्तंभ हैं राज ठाकरे. जो कि उद्धव को शिवसेना प्रमुख बनाए जाने के बाद महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के नाम से अपनी पार्टी  बनाकर अलग हो गए थे. लेकिन अब, जब ठाकरे परिवार से पहला मुख्यमंत्री बनने वाला है. तब लगता है राज और उद्धव के बीच दूरियां मिटने लगी हैं. 

क्या एक हो पाएगा ठाकरे परिवार?
क्या राज और उद्धव ठाकरे की दूरियां कम होने लगी हैं

मुंबई: शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे इन दिनों बेहद खुश हैं. क्योंकि वह ठाकरे परिवार से ऐसे पहले शख्स होंगे, जो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठेगा. शायद इसी खुशी में उन्होंने अपने भूले बिसरे चचेरे भाई राज ठाकरे से अपनी दूरियां कम करने का फैसला किया है. जो कि बरसों पहले उनसे नाराज होकर अलग हो गए थे. 

भाईयों के बीच टूटेगी नफरत की दीवार
28 नवंबर को शाम 6.40 बजे महाराष्ट्र की सियासत में नया इतिहास लिखा जाएगा. मुंबई के शिवाजी पार्क में जब उद्धव ठाकरे की ताजपोशी होगी. खबर है कि उद्धव ठाकरे शपथ ग्रहण समारोह मे अपने चचेरे भाई राज ठाकरे को पूरे परिवार के साथ न्योता देने वाले हैं.

अगर ऐसा हुआ तो ये तस्वीर सचमुच देखने लायक होगी. 

राज और उद्धव के एकीकरण में बाधक रही है महत्वाकांक्षा

जिस शिवसेना के विरोध में राज ठाकरे ने महाराष्ट्र नवनिर्वाण सेना को खड़ा किया. आज वो पल बदल गया है और कहीं ना कहीं दो परिवार पूरी तरह से एक होने की पृष्ठभूमि तैयार की जा रही है. हालांकि दोनों भाईयों के अलगाव के पीछे राजनीतिक महत्वाकांक्षा ही थी. 

अलग वजूद बनाने में राज ठाकरे रहे असफल
राज ठाकरे ने बहुत कुछ देखा था, बहुत कुछ सोचा था, हो सकता है राज ठाकरे ने ये भी सोचा हो कि हम शिवसेना के बराबर अपनी महाराष्ट्र नवनिर्वाण सेना खड़ी कर ले जाएंगे और  इसका एक वजूद बना देंगे. लेकिन अब उनके सामने दिख रहा है कि वजूद नहीं बन रहा है. आखिर में अगर दोनों आपस में मिलना चाह रहे हैं तो परिस्थितियां बनने लगी हैं. 

आखिर राज-उद्धव में क्यों हुआ था अलगाव
उद्धव ठाकरे अपने सामने आने वाली हर बाधा को रौंदते चले गए और अब महज कुछ वक्त के फासले के बाद वे महाराष्ट्र के सीएम होंगे. लेकिन इतिहास गवाह है कि एक वक्त ऐसा भी था जब बाला साहेब ठाकरे के सामने धर्मसंकट खड़ा हो गया था. उनके सामने अपने बेटे और भतीजे के बीच में से उन्हें किसी एक को चुनने की मजबूरी थी. 
जिस वक्त महाराष्ट्र में बाला साहेब ठाकरे की तूती बोलती थी. उस दौरान उद्धव और राज उनके दो सिपहसालार थे. उद्धव और राज चचेरे भाई थे. हालांकि उद्धव सियासत से खिंचे-खिंचे रहते थे, उनका फोटोग्राफी में मन लगता, लेकिन राज ठाकरे दबंग और मुखर थे. लोगों को उनमें चाचा बाल ठाकरे की छवि नजर आती थी. राज ठाकरे तेजी से शिवसैनिकों के बीच लोकप्रिय होते गए.

साल 2002 में बीएमसी के चुनावों में शिवसेना को कामयाबी मिली तो बाला साहेब ठाकरे ने उद्धव को 2003 में शिवसेना का कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया.
जिसके बाद राज ठाकरे के मन में खटास बढ़ती चली गई. आखिरकार 2006 में राज ठाकरे मातोश्री से अलग हो गए. उन्होंने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना नाम से अलग पार्टी बना ली. हालांकि उद्धव कहते रहे कि उन्होंने कभी राज ठाकरे को मातोश्री छोड़कर जाने को नहीं कहा था...।

उद्धव का हाल जानने अस्पताल पहुंचे थे राज ठाकरे
उद्धव ने राज ठाकरे को अपने शपथग्रहण समारोह में सपरिवार बुलाया है. लेकिन इसके पहले साल 2012 में जब पूरे साढ़े तीन साल बाद राज ठाकरे और उद्धव के दिल मिलते हुए दिखे थे. जब उद्धव ठाकरे के सीने में दर्द हुआ तो राज ठाकरे का दिल पसीज गया. उनसे अपने भाई की पीडा बर्दाश्त नहीं हुई और वो फौरन मुंबई के लीलावती अस्पताल पहुंच गए. जहां उन्होंने उद्धव ठाकरे का हाल चाल जाना.

राज ठाकरे ने उद्धव को अपनी काले रंग की मर्सडीज़ कार में उद्धव को ना सिर्फ अपनी बराबर वाली सीट पर बैठाया बल्कि मातोश्री भी ले गए. 

जनवरी में भी हुई थी दोनों भाईयों की मुलाकात
राज ठाकरे ने उद्धव ठाकरे से मुलाकात कर उन्हें इसी साल जनवरी में अपने बेटे की शादी में शामिल होने का न्योता दिया था. अब उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बनने वाले हैं तो लग रहा है जैसे दोनों भाईयों के बीच की दरार लगभग खत्म हो गई है. 

उद्धव ने पहले ही कहा था कि फडणवीस बहुमत साबित नहीं कर पाएंगे. यहां देखें वीडियो