Year Ender 2019: कई अहम मामलों पर सुप्रीम कोर्ट के हथौड़े ने ठोंकी आखिरी कील

सुप्रीम कोर्ट ने इस साल किये कई ऐतिहासिक फैसले जो कि 2019 की याद के साथ सदा के लिये जुड़ जायेंगे..

Year Ender 2019: कई अहम मामलों पर सुप्रीम कोर्ट के हथौड़े ने ठोंकी आखिरी कील

नई दिल्लीः 12 महीनों का सफर पूरा कर साल 2019 जाने वाला है. समय के इस बदलते चक्र में बीते साल के तौर पर जाता हुआ यह साल ऐतिहासिक कहा जाएगा. भारतीय न्याय व्यवस्था की नजर से देखें तो इस साल ऐसे कई बड़े-बड़े फैसले सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे से निकले जिन्होंने न सिर्फ इतिहास में जगह पाई, बल्कि राजनीति की नई दिशा भी तय की. सुप्रीम कोर्ट का हथौड़ा जब चला तो वर्षों और दशकों पुराने मुद्दों ने फैसलों की शक्ल ली. नव वर्ष 2020 के आगमन से पहले इन सभी फैसलों पर डालते हैं एक नजर-



रामलला को मिला मंदिर

लगभग 26 सालों से देश की राजनीति की दशा-दिशा तय करने वाला राम मंदिर मुद्दा आखिर साल 2019 में खत्म ही हो गया. सुप्रीम कोर्ट की दहलीज पर पहुंचे इस मुद्दे को खत्म करने का श्रेय गया चीफ जस्टिस रहे रंजन गोगोई को, जिनकी अध्यक्षता वाली बेंच ने मामले की लगातार 40 दिन तक सुनवाई की. इसके बाद 9 नवंबर 2019 की तारीख यादगार बन गई. कोर्ट ने फैसला दिया कि मंदिर किसी खाली जमीन पर नहीं बनी थी, बल्कि जिस ढांचे पर थी वह इस्लामिक नहीं था. इस आधार पर विवादित जमीन रामलला विराजमान को दी गई, मस्जिद बनाने के लिए 5 एकड़ जमीन देने का प्रस्ताव दिया.



सीजेआई ऑफिस RTI के दायरे में आता है

सुप्रीम कोर्ट की एक संवैधानिक बेंच ने इसी साल यह फैसला भी सुनाया कि मुख्य न्यायधीश का कार्यालय RTI के दायरे में आता है.  सूचना अधिकार कार्यकर्ता कार्यकर्ता सुभाष चंद्र अग्रवाल ने सीजेआई ऑफ़िस को आरटीआई के दायरे में लाने के लिए याचिका दायर की थी. सुभाष चंद्र अग्रवाल का पक्ष रखने वाले वकील प्रशांत भूषण ने कहा था कि अदालत में सही लोगों की नियुक्ति के लिए जानकारियां सार्वजनिक करना सबसे अच्छा तरीका है. प्रशांत भूषण ने कहा, सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति और ट्रांसफ़र की प्रक्रिया रहस्यमय होती है. इसके बारे सिर्फ़ मुट्ठी भर लोगों को ही पता होता है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई फैसलों में पारदर्शिता की जरूरत पर ज़ोर दिया है लेकिन जब अपने यहां पारदर्शिता की बात आती है तो अदालत का रवैया बहुत सकारात्मक नहीं रहता. जिस बेंच ने यह फैसला सुनाया उसकी अगुवाई भी रंजन गोगोई ही कर रहे थे.

सबरीमला मंदिर का फैसला भी रहा यादगार

केरल स्थित सबरीमला अय्यपा मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर भी सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर में ही आखिरी फैसला सनाया. हालांकि मामले में 28 सितंबर, 2018 को कोर्ट ने सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश का अधिकारी बना दिया था. लेकिन फैसले की समीक्षा के लिए फिर से सुप्रीम कोर्ट में 60 याचिकाएं दायर की गईं थीं. 6 फरवरी, 2019 को इन सभी याचिकाओं पर कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था. पांच जजों वाली बेंच की अगुवाई भी जस्टिस रंजन गोगोई ने ही की थी. कई धार्मिक संगठनों की दलील है कि चूंकि अयप्पा ब्रह्मचारी माने जाते हैं, इसलिए 10-50 वर्ष की महिलाओं को उनके मंदिर में जाने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए. कोर्ट ने 14 नवंबर को यह मामला 7 जजों वाली संवैधानिक बेंच को भेज दिया था, साथ ही 28 सितंबर 2018 के फैसले को लागू रखने का आदेश देते हुए कहा था कि हमारे आदेश की अवहेलना न की जाए.

राफेल मामलाः सरकार को दोबारा दी क्लीन चिट

सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई गोगोई की अगुवाई वाली तीन जजों की बेंच ने राफेल सौदा मामले पर फैसला सुनाया था. बेंच में जस्टिस रंजन गोगोई के अलावा जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस केएम जोसेफ शामिल थे. राफेल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 14 दिसंबर, 2018 को अपना फैसला सुनाया था और केंद्र सरकार को क्लीन चिट दे दी थी. हालांकि इस फैसले की समीक्षा के लिए अदालत में कई याचिकाएं दायर की गईं और 10 मई, 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने इन याचिकाओं पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था. फ़्रांस से 36 रफाल फाइटर जेट के भारत के सौदे को चुनौती देने वाली जिन याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की, उनमें पूर्व मंत्री अरुण शौरी, यशवंत सिन्हा, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण और आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह की याचिकाएं शामिल थीं. सभी याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से उसके पिछले साल के फ़ैसले की समीक्षा करने की अपील की थी. कोर्ट ने एक बार फिर से सरकार को क्लीन चिट दी है.

राहुल गांधी अवमानना केसः चौकीदार चोर नहीं है

राफेल मामले से जुड़ा ही एक मामला कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ भी दर्ज था. सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी के चौकीदार चोर है वाले व्यकतव्य पर उनका माफीनामा मंजूर किया साथ ही उन्हें भविष्य में समझकर बोलने की हिदायत दी. कोर्ट का कहना था कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोगो के प्रति बयान सोच समझकर दें. दरअसल चुनाव के दौरान राहुल गांधी ने कई जनसभाओं में सार्वजनिक तौर पर चौकीदार चोर है कहा था, जिसमें सीधेतौर पर पीएम मोदी पर निशाना साधा गया था. इस मामले में भजपा सांसद मीनाक्षी लेखी ने शिकायत दर्ज कराई थी.

महाराष्ट्र सरकार को बहुमत साबित करने का आदेश

अक्टूबर में हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद यहां सरकार बनाने के लिए लगातार उठा-पटक चल रही थी. इसी बीच भाजपा ने रातों रात वहां सरकार बना ली थी. महाराष्‍ट्र में रातों रात शपथ लेने वाले देवेंद्र फडणवीस सरकार के खिलाफ जब विपक्ष ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया तो कोर्ट ने उन्‍हें न सिर्फ विधानसभा में बहुमत साबित करने का आदेश दिया बल्कि उसका लाइव टेलिकास्‍ट कराने तक का भी आदेश दिया. जस्टिस एनवी रमण, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस संजीव खन्ना की खंडपीठ ने राज्यपाल को अस्थाई अध्यक्ष की नियुक्ति करने का भी आदेश दिया. पीठ का कहना था कि सदन में कोई गुप्‍त मतदान नहीं होगा.

प्रदुषण पर सरकार को लिया आड़े हाथ

दिल्‍ली में बढ़ते प्रदुषण पर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सरकार पर तल्‍ख टिप्‍पणी की. कहा कि दमघोंटू हवा में सांस लेने से बेहतर है कि एक बार में विस्‍फोट से जनता को मार दिया जाए. इस दौरान कोर्ट ने यहां तक कहा कि दिल्‍ली सरकार को सत्‍ता में रहने का कोई अधिकार नहीं है. इस तरह की तल्‍ख टिप्‍पणी पहली बार सुप्रीम कोर्ट की तरफ से किसी सरकार के खिलाफ की गई थी. अक्टूबर-नवंबर में दिल्ली लगातार गैस चैंबर बनती जा रही है. यहां के वातावरण में प्रदूषक तत्वों की मात्रा इन दो महीनों काफी बढ़ जाती है. इस समस्या का हल न निकलते देख और केवल पराली और दुसरे राज्यों पर इसका ठीकरा फोड़ने के कारण कोर्ट ने नाराजगी जताई थी.  

मैमोरी कार्ड भी अहम दस्‍तावेज

सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक मामलों में मैमोरी कार्ड को एक अहम दस्‍तावेज माने जाने की व्‍यवस्‍था दी. जस्टिस एएम खानविलकर और दिनेश माहेश्वरी की बेंच ने यौन उत्पीड़न के एक मामले में यह फैसला सुनाया था. यह मामला फरवरी 2017 का है. आरोप के मुताबिक कोच्चि में एक कार में केरल की एक अभिनेत्री का यौन उत्पीड़न किया गया था जिसका वीडियो एक फोन के मेमोरी कार्ड में है.  सुप्रीम कोर्ट ने 29 नवंबर को मेमोरी कार्ड या पेन ड्राइव की सामग्रियों को इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड मानते हुए उन्हें भारतीय साक्ष्य अधिनियम के तहत 'दस्तावेज' ठहराया है. शीर्ष अदालत ने मलयालम फिल्म अभिनेता दिलीप की याचिका पर यह फैसला दिया है.

समझौते से बने संबंध तो दुष्कर्म नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाईकोर्ट के फैसले को दरकिनार करते हुए दुष्कर्म के आरोपी को पीड़ित महिला के साथ हुए समझौते के बाद उसपर दुष्कर्म के मामले में चल रही कार्रवाही समाप्त करने का आदेश दिया है. केरल हाईकोर्ट ने इस मामले में मामला बंद करने से इनकार कर दिया था. कोर्ट का कहना था कि सहमति से शारीरिक संबंध बनने के बाद भी यह मामला 376 के तहत ही बनता है. लिहाजा इसे निरस्‍त नहीं किया जा सकता है. इसके खिलाफ आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिसके बाद शिकायतकर्ता लड़की के शपथपत्र और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट का मानना है कि अपीलकर्ता के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही खत्म करनी चाहिए.

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