कॉरपोरेट का दुलारा YES Bank, आज सबको NO कहने पर क्यों मजबूर है

राणा कपूर आभूषण कारोबारी वाले परिवार से ताल्लुक रखते हैं. यस बैंक उनकी महत्वाकांक्षी शुरुआत थी. लिहाजा वह इसके शेयर को कभी भी बेचने की बात नहीं करते थे. लेकिन समय एक जैसा नहीं रहता है. राणा कपूर अक्टूबर 2019 में अपने शेयर बेच रहे थे. उनके ग्रुप की हिस्सेदारी अक्टूबर 2019 में घटकर 4.72 फीसदी रह गई थी. 

कॉरपोरेट का दुलारा YES Bank, आज सबको NO कहने पर क्यों मजबूर है

नई दिल्लीः यस बैंक, बाजार का चहेता और कॉरपोरेट का दुलारा बैंक. खुदरा बाजार का इस बैंक के प्रति कोई खास मोह नहीं था, लेकिन बड़े घराने और व्यापारिक समूह यस बैंक की ही माया में फंसे थे. पांच मार्च शाम 6 बजे जब रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने इसके निदेशक मंडल को भंग कर दिया और प्रशासक नियुक्त कर दिया तब इसके ग्राहकों में खलबली मच गई.

रिजर्व बैंक ने जमा निकासी पर भी पाबंदी लगा दी और कुछ रकम निकाल पाने के लिए लिमिट तय कर दी है. बाजार यस बैंक के धड़ाम होने का मातम मना रहा है और सोशल मीडिया ट्विटर पर #yesbankcrisis ट्रेंड कर रहा है. सवाल है कि इस लाड़ले-दुलारे बैंक की यह हालत हुई कैसे?

एक तथ्यः सड़क पर अपनी सुरक्षा सिर्फ आप तय नहीं कर सकते
इस तथ्य को आप सीधे-सीधे यस बैंक से जोड़कर नहीं समझ सकते, लेकिन बात है बिल्कुल उसके करीब की. खुदरा-थोक वाले यस बैंक के ग्राहक कम ही थे और बिजनेस मैन और कारपोरेट घराने अधिक. तो ऐसे समझिए कि यस बैंक अमीरों का बैंक था. सोचा था कि जिनके पास पैसा है, उन्हें लोन बांटने से कोई दिक्कत नहीं आएगी, लेकिन बैंक ने जिन्हें लोन दिया वह खुद अपनी स्थिति संभाल नहीं पाए.

इनमें सबसे बड़ा नाम तो अनिल अंबानी का ही शामिल है. अनिल अंबानी की कंपनी ADAG की हालत खराब है. इसके अलावा DHFL और इंडियाबुल्स हाउसिंग की हालत भी पिछले साल खराब रही हैं. इंडियाबुल्स पर पिछले साल ही वित्तीय अनियमितता के आरोप लगे थे. 

यस बैंक के तार 26/11 से भी छूते हैं
यस बैंक की शुरुआत हुई थी 2004 में. बिजनेस की दुनिया में कदम रखने वाले राणा कपूर ने इसे अपने एक रिश्तेदार अशोक कपूर के साथ शुरू किया था. चार साल तक दोनों ने मिलकर इसका प्रबंधन संभाला और फिर 2008 में हुआ मुंबई हमला. इस हमले मे अशोक कपूर की मौत हो गई. उनकी मौत के कुछ समय बाद दोनों कपूर परिवारों में वर्चस्व की लड़ाई होने लगी.

अशोक कपूर की पत्नी मधु अपनी बेटी को भी बैंक के बोर्ड में शामिल करना चाहती थीं. लिहाजा मामला हाईकोर्ट पहुंच गया और 2011 में बांबे हाइकोर्ट ने राणा कपूर के पक्ष में फैसला दिया. यानी कि प्रबंधन में उनका वर्चस्व बरकरार रहा. 

लेकिन समय एक सा नहीं रहता
राणा कपूर आभूषण कारोबारी वाले परिवार से ताल्लुक रखते हैं. यस बैंक उनकी महत्वाकांक्षी शुरुआत थी. लिहाजा वह इसके शेयर को कभी भी बेचने की बात नहीं करते थे. लेकिन समय एक जैसा नहीं रहता है. राणा कपूर को अक्टूबर 2019 में अपने शेयर बेच रहे थे. उनके ग्रुप की हिस्सेदारी अक्टूबर 2019 में घटकर 4.72 फीसदी रह गई थी.

3 अक्टूबर को बैंक के सीनियर ग्रुप प्रेसिडेंट रजत मोंगा ने इस्तीफा दे दिया. वे 2004 से ही यानी शुरुआत से ही बैंक के साथ जुड़े थे. मोंगा ने 18 और 19 सितंबर 2019 को बैंक में अपनी हिस्सेदारी बेची थी.

फिर जुड़ते चले गए विवाद दर विवाद
ऊपर जितनी भी बातें लिखी गई हैं, यह सब बाद की बात है. परिणाम है. इसकी शुरुआत तो इससे भी सालभर पहले 2018 से हो गई थी. या ऐसे कहें कि तभी यह मामले सामने आने शुरू हुए थे. जो राणा कपूर यस बैंक को शुरू करने वाले थे, रिजर्व बैंक ने उन्हें ही हटा दिया. कारण बताया गया कि बैंक अपने कामकाज में बहुत कुछ छिपा रहा है.

अंदेशा था कि बैलेंस शीट में सही जानकारी नहीं दी जा रही है. फिर RBI ने कपूर साहब को 31 जनवरी 2019 तक पद छोड़ने के लिए कह दिया. राणा कपूर के हाथ बंधे थे, कुछ नहीं कर सके. 

मार्च 2019 में लगा स्विफ्ट नियमों को तोड़ने का आरोप
रिजर्व बैंक, यस बैंक पर शिकंजा कसता ही जा रहा था. राणा कपूर हटाए गए, जांच हुई और बैंक पर एक करोड़ का जुर्माना लगा दिया गया. मार्च 2019 में आरोप लगा कि बैंक स्विफ्ट नियमों का उल्लंघन कर रहा है. स्विफ्ट एक तरह का मैसेजिंग सॉफ्टवेयर होता है. वित्तीय संस्थाएं लेनदेन में इसका उपयोग करती हैं. आगे सामने आया था कि इसी स्विफ्टि का गलत उपयोग कर नीरव मोदी और मेहुल चौकसी ने धोखाधड़ी की है. दोनों ने पंजाब नैशनल बैंक में 14 हजार करोड़ की धोखा धड़ी की. 

फिर यस बैंक अपने बचाव के लिए पूंजी नहीं जुटा पाया
बैंकिग में एक प्रचलित शब्दावली है QIP. इसका मतलब है क्वालिफाइड इंस्टीट्यूशनल प्लेसमेंट. वित्तीय संस्थाएं या कंपनियां इसके जरिए अपने लिए फंड जुटाती हैं. इय उनके उबरने के लिए बचाव का एक विकल्प होता है. यस बैंक ने यह भी कोशिश करके देख ली. QIP से उन्हें झटका ही लगा. बैंक ने क्यूआईपी के जरिए फंड इकट्ठा करने का जो लक्ष्य रखा था वहां तक पहुंच नहीं पाया. बैंक ने क्यूआईपी के जरिए 1,930 करोड़ रुपये ही जुटाए थे.

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बचा-खुचा मूड, मूडीज ने खराब कर दिया, रेटिंग घटा दी
अगस्त 2019 में मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस ने यस बैंक की रेटिंग घटा दी. इसके अलावा दुनिया भर की रेटिंग एजेंसियां यस बैंक को संदिग्ध नजर से देखने लगीं. ये एजेंसियां कंपनियों को उनके कामकाज के हिसाब से रेटिंग देती हैं. मूडीज ने यस बैंक को जंक वर्ग में डाल दिया.

यानी कि एक तरह से पूरी छवि ही खराब कर दी. यह रेटिंग दुनिया भर में इन्वेस्टर्स को यह बताने के लिए काफी है कि बैंक या कंपनी में कुछ गलत हुआ तभी उसे डिग्रेड किया गया है. सबसे पहले आता है एएए, फिर एए फिर ए और फिर बीबीबी इसी तरह से डी आता है. डी का मतलब होता है जंक. यस बैंक को जंक की कैटेगरी में डाल दिया गया. 

राणा कपूर ने की थी वापसी की मांग
बैंक के दिन लगातार खराब चल रहे थे. जून 2019 में बैंक के 2 इंडिपेंडेंट डायरेक्टर मुकेश सभरवाल, अजय कुमार ने इस्तीफा दे दिया था. राणा कपूर बोर्ड में वापसी करना चाहते थे. राणा कपूर ने मई में चिट्टी लिखकर बोर्ड में सीट की मांग की, साथ में मुआवजे की भी मांग की. लेकिन बोर्ड ने राणा कपूर की मांग को RBI के फैसले के उल्लंघन का हवाला देकर नकार दिया. 

बैंक शुरू करने वाले राणा कपूर फिर अलग-थलग रह गए. उस दौरान की चौथी तिमाही के नतीजों में फंसे हुए कर्ज के लिए बैंक ने प्रावधान 10 गुना बढ़ाकर 3661.7 करोड़ रुपये कर दिया था. इसका असर और बुरा हुआ था. मार्च तिमाही में बैंक को 1506 करोड़ रुपये का भारी भरकम नुकसान हुआ.

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...और आज बैंक बाजार में खड़ा है अकेला
संत कबीर का एक दोहा है, कबिरा खड़ा बाजार में, मांगे सबकी खैर. 2004 में शुरू होने के बाद यस बैंक कई कारपोरेट घरानों का खैर ख्वाह बना. जुलाई 2005 में लिस्टिंग के बाद से निवेशकों को लगातार मालामाल करने वाला रहा है यस बैंक. लेकिन बीते दो सालों में उबरने के लिए इतने हाथ-पांव मारे, लेकिन कहीं कोई सहारा नहीं मिला. बैंक अब यूंही खड़ा है खाली हाथ. उस पर RBI का शिकंजा है और ग्राहक परेशान हैं कि इसमें से जमा निकासी कैसे निकलेगी. डूब तो नहीं जाएगी.