जन्मदिन विशेष: पहलवानी की धोबी पछाड़ से राजनीति की उठा-पटक तक कठोर मुलायम

पहलवानी के अखाड़े से हिंसक रूप लेते हुए राजनीतिक सफर तय करने वाले मुलायम सिंह यादव आज जीवन के 81 बसंत देख चुके हैं. उत्तरप्रदेश की राजनीति के बड़े नामों में शामिल मुलायम सिंह यादव के नाम कई किस्से या यूं कहें कि कई कांड दर्ज हैं. आइए आपको मुलायम सिंह यादव के राजनीतिक करियर और राजनीति के कुछ बड़े कांड और विवादों से परिचित कराते हैं 

जन्मदिन विशेष: पहलवानी की धोबी पछाड़ से राजनीति की उठा-पटक तक कठोर मुलायम

नई दिल्ली: मुलायम सिंह यादव आज 81 के हो गए हैं. सैफई में इस मौके पर उन्होंने 81 किलो का केक भी काटा. राजनीति के बैड मैन मुलायम सिंह कई बार और कई कांडों में संलिप्त रहे हैं. देखा जाए तो समाजवाद को अपनी राजनीतिक जमीन बताने वाले मुलायम उत्तर प्रदेश में हर समाजिक नरसंहार में अप्रत्यक्ष रूप से अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में गुदवाया करते थे. फिर चाहे वह मायावती के जीवन की सबसे विध्वंसक घटना गेस्ट हाउस कांड को अंजाम देने की बात हो या फिर उत्तराखंड विभाजन को लेकर चलाए जा रहे रामतिराहा आंदोलन पर गोली कांड का मामला. 

अयोध्या कांड में कारसेवकों पर चलवा दी गोली 

इतना ही नहीं आज जिस अयोध्या राम मंदिर विवाद पर ऐतिहासिक फैसले का सबको इंतजार था, उसका एक सिरा मुलायम सिंह की ओर भी जाता है. यह कहानी 1990 की है जब बाबरी मस्जिद को तोड़ने का स्वांग रचा जा रहा था तब कारसेवकों की बड़ी टोली अयोध्या पहुंची थी. उनका एक समूह जब अयोध्या की गलियों से गुजर रहा था, तो पुलिस ने उन्हें घेरकर अंधाधुन फायरिंग शुरू कर दी. बताया गया कि उस गोलीकांड में 8 कारसेवक मारे गए लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स की तफ्तीश में यह जानकारी मिली कि कम से कम 15-20 कारसेवकों को गोलियों से छलनी कर दिया गया था और 42 कारसेवक घायल हो गए थे. पुलिस के इस अराजकतापूर्ण व्यवहार को मंजूरी तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के अलावा और कौन दे सकता है. यह कांड भी उनकी व्यक्तित्व को बखूबी गरिमामय कर देता है. 

गेस्ट हाउस कांड उत्तरप्रदेश की राजनीति की स्याह हकीकत

मुलायम सिंह यादव की बात हो और उनके करियर पर लगे सबसे बड़े दाग की बात न हो तो किस्सा पूरा नहीं होता. अपने राजनीतिक करियर में मुलायम रसूखदारी या यूं कहें कि फौजदारों की तरह ही रहे. मायावती के खिलाफ गेस्ट हाउस कांड के मास्टरमाइंड लोगों में अपना नाम दर्ज करा चुके मुलायम की आलोचना कहिए या उनके बाहुबली छवि का उदहारण, यह उत्तरप्रदेश के राजनीति की सबसे खतरनाक कांडों में से एक है. दरअसल, बसपा प्रमुख मायावती के राजनीतिक जीवन की तब शुरुआत ही हो रही थी. कांशीराम की बेटी मायावती गेस्ट हाउस में अपने विधायकों संग बैठक कर रही थीं और षडयंत्र को अंजाम देने पहुंचे मुलायम सिंह यादव, कल्याण सिंह ने उनके साथ वह व्यवहार करने की असफल कोशिश की जिसे आज की भाषा में महिला उत्पीड़न का भी भीषण रूप कहा जाता है.   

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समाजवाद की लहर में बनाई समाजवादी पार्टी

मुलायम सिंह यादव का राजनीतिक करियर बड़ा दिलचस्प रहा है. खुद को लोहिया और जयप्रकाश नारायण नक्शे कदम पर चलने वाला बताने वाले मुलायम सिंह यादव उस दौर के नेता हैं जब राजनीतिक अस्थिरता अपने चरम पर थी. राजनीतिक पार्टियों की अदलाबदली करने वाले नेताओं की कोई कमी न थी. यूं कहिए कि हर दिन और कभी भी हो जाने वाले चुनावों में इस पार्टी से उस पार्टी में दलबदलू लोगों की संख्या भरपूर थी. मुलायम सिंह यादव भी राजनीति के अपने शुरुआती दिनों में सोशलिस्ट और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से आए थे. बाद के दिनों में जनता पार्टी के कर्मठ लोगों में से एक थे. फिर बाद में जब जनता पार्टी टुकड़ों में बंटी तो उत्तरप्रदेश में एक टुकड़ा समाजवादी पार्टी के नाम से जाना जाने लगा. मुलायम सिंह यादव इसके पोषक थे. 

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सैफई महोत्सव करा कर फिर चर्चा में आए मुलायम

1967 में पहली बार विधायक बने 1989 में आखिरकार पहली बार देश के सबसे बड़े राज्य के मुख्यमंत्री बने लेकिन तीन साल तक ही कार्यकाल रहने का मलाल उनको खूब हुआ. इसके बाद मुलायम ने समाजवादी पार्टी की नींव रख दी. वक्त था 1992 में उत्तरप्रदेश में एक और विधानसभा चुनाव का. 1993 में मुलायम सिंह यादव फिर मुख्यमंत्री बने और फिर 3 साल यानी 1996 तक रह सके. तीसरी बार 2003 में सीएम की कुर्सी पर बैठने वाले मुलायम सिंह ने अपने आखिरी कार्यकाल में एक ऐसा काम किया कि राजनीतिक हलकों में उफान आ गया. दरअसल, मुलायम सिंह यादव ने अपने पैतृक स्थान सैफई में सैफई महोत्सव का आयोजन करना शुरू कर दिया. जो काफी विवादित था. लेकिन कोई महोत्सव विवादित कैसे हो सकता है, यह सवाल बनता है. तो जवाब यह है कि इस महोत्सव का आयोजन राज्य सरकार अपने कोष से बड़ा फंड दे कर कराती थी जिसमें सांस्कृतिक कार्यक्रम के नाम पर नाच-गाना-बजाना का कार्यक्रम किया जाता था. राजनीतिक पार्टियों ने इस मुद्दे पर जमकर घेरा लेकिन मुलायम को फिर भी कुछ खास फर्क न पड़ा.