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केरल के राजा मार्तण्ड वर्मा यूरोपीय सेना को समुद्र में हराने वाले पहले राजा थे

सौ साल पहले तक यूरोपीय देश के लोगों को समुद्र में अजेय माना जाता था. अगर आप जानना चाहेंगे कि सबसे पहले किस यूरोपीय ताकत को एशियाई लोगों ने समुद्र में हराया था. तो आपको 1905 के रुस-जापान युद्ध का वर्णन मिलेगा. लेकिन ये सच नहीं है. इससे लगभग 150 साल पहले केरल के राजा मार्तण्ड वर्मा ने डच समुद्री सेना को हरा दिया था. वह भी पारंपरिक हथियारों से. लेकिन विदेशियों के मानसिक गुलाम हमारे इतिहासकारों ने इस गौरवपूर्ण युद्ध को इतिहास की परतों में दबा देने की कोशिश की.   

केरल के राजा मार्तण्ड वर्मा यूरोपीय सेना को समुद्र में हराने वाले पहले राजा थे

नई दिल्ली: भारतीय युद्ध इतिहास में 1741 का साल बेहद अहम है. ये वही साल था जब जुलाई के महीने में त्रावणकोर के राजा मार्तण्ड वर्मा ने डच ईस्ट इंडिया कंपनी को अपने पारंपरिक हथियारों से समुद्री युद्ध में पराजित कर दिया था.

महान शासक थे मार्तण्ड वर्मा
केरल के इतिहास में त्रावणकोर राजघराने का सबसे बड़ा योगदान है. इसमें भी राजा मार्तण्ड वर्मा के बारे में जाने बिना त्रावणकोर का इतिहास अधूरा है. उन्होंने 1729 से 1758 के बीच लगभग 29 साल तक शासन. इन 29 सालों में उन्होंने त्रावणकोर को एक बड़ा राज्य बनाया और अपने सभी दुश्मनों को परास्त किया. चाहे वह घर के अंदर के दुश्मन हों या बाहर के. मार्तण्ड वर्मा ने उस जमाने की बड़ी शक्ति समझे जाने वाली डच नौसेना को पराजित किया.

समुद्र पर चलता था डच नौसेना का राज
डच नीदरलैंड के लोगों को कहा जाता है. पुर्तगाली और अंग्रेजों की तरह डच भी यूरोप की एक बड़ी ताकत थे.  लगभग 50 साल तक दुनिया के व्यापार पर उनका कब्जा रहा.  1602 में डच सरकार ने एक कम्पनी बनाई थी. जिसे डच ईस्ट इंडिआ कम्पनी के नाम से जाना जाता था.
इसमें 17 शेयर होल्डर थे.  जब ये कम्पनी बनी, तब इसमें लगभग 6.5 मिलियन गिल्डर का इन्वेस्टमेंट किया गया.  जो आज के दौर में लगभग 100 मिलियन डालर जितना है. कम्पनी के पास एशिया में 21 साल तक व्यापार करने का अधिकार था. ये अपनी सेना  बना सकती थी या अपनी तरफ से लड़ाई शुरू कर सकती थी और दूसरे  देशों में अपने उपनिवेश यानी कलोनी  बना सकती थी.
दुनिया की इस सबसे अमीर और ताकतवर कम्पनी की ताकत उस समय पुर्तगालियों और अंग्रेजों से भी ज्यादा हो गई थी. उन्होंने एशिया के मसाला व्यापार पर कब्जा कर लिया था. उस दौर में मसाला सोने से ज्यादा कीमती था.

काली मिर्च की वजह से हुआ झगड़ा
केरल में काली मिर्च सबसे ज्यादा होती है. जिसपर डच ईस्ट इंडिया कंपनी की नजर थी. ये एक ऐसा मसाला था, जिसकी पूरी दुनिया में बड़ी मांग थी. उस जमाने में काली मिर्च सोने से ज्यादा कीमती थी.
उस जमाने में काली मिर्च के खजाने की तलाश यूरोपीय ताकतों को केरल के समुद्री तटों पर खींच लाई थी.

ये वही दौर था जब त्रावणकोर के राजा मार्तण्ड वर्मा अपने पांव जमा रहे थे. वो त्रावणकोर को बड़े साम्राज्य में बदलना चाहते थे. आस पास के राज्यों को जीतने के बाद उसकी नज़र ओडनाड राज्य पर थी, जहां काली मिर्च की खेती सबसे ज्यादा होती थी. लेकिन ओडनाड के मिर्च व्यापार पर डच कम्पनी का एकाधिकार था. मार्तण्ड वर्मा उसे तोड़ना चाहते थे.

काली मिर्च के लिए घिर गए युद्ध के बादल
डच गवर्नर ने मार्तण्ड वर्मा को ओडनाड से दूर रहने को कहा. लेकिन ये बात राजा मार्तण्ड वर्मा को मंजूर नहीं थी. जिसके बाद डच सेना और त्रावणकोर की सेना के बीच में युद्ध होना तय हो गया. 1741 की शुरुआत में डच कैप्टन डी. लेनॉय की कमांड में डच सेना कोलाचल पहुँच गयी. 1741 मई के महीने में लड़ाई की शुरुआत हो गई.

राजा मार्तण्ड वर्मा भी तैयार थे. वह तिरुवत्तार के आदि केशव मंदिर में गए.  जहां उन्होंने अपनी तलवार की पूजा करवाई.

कम्पनी की सेना के पास थे आधुनिक हथियार
डच ईस्ट इंडिया कंपनी के पास उस समय के सबसे आधुनिक हथियार थे. वह उस वक़्त दुनिया की सबसे अमीर कंपनी थी. डच कमांडर डी लेनॉय श्रीलंका से सात बड़े युद्ध जहाजों और कई छोटे जहाजों के साथ पहुंचा था. डच सेना ने कोलचल बीच पर अपना कैम्प लगाया. कोलचल से मार्तण्ड वर्मा की राजधानी पद्मनाभपुरम सिर्फ 13 किलोमीटर दूर थी. डच समुद्री जहाजों ने त्रावणकोर की समुद्री सीमा को घेर लिया. उनकी तोपें लगातार शहर पर बमबारी करने लगीं. डच कम्पनी ने समुद्र से कई हमले किये. तीन दिन तक लगातार शहर में गोले बरसते रहे.  शहर खाली हो गया.  अब राजा को सोचना था कि उनकी फौज कैसे डच सेना के आधुनिक हथियारों का मुकाबला कर पाएगी.

हिम्मत से जीती मार्तण्ड वर्मा ने लड़ाई
लेकिन लड़ाई आधुनिक हथियारों से नहीं दिमाग और हिम्मत से जीती जाती है. डच सेना तोपों से बमबारी कर रही थी. लेकिन मार्तण्ड वर्मा ने दिमाग से काम लिया. उन्होंने नारियल के पेड़ कटवाए और उन्हें बैलगाड़ियों पर इस तरह लदवा दिया जैसे लगे कि तोपें तनी हुई हैं.
डच  सेना की एक रणनीति थी वो पहले समुद्र से तोपों के जरिये गोले बरसाते. उसके बाद उनकी सेना धीरे धीरे आगे बढ़ती हुई खाईयां खोदती और किले बनाती थी. इस तरह वो धीरे धीरे अपनी सत्ता स्थापित करते थे. लेकिन मार्तण्ड वर्मा की नकली तोपों के डर से डच सेना आगे ही नहीं बढ़ी.

डच सेना की फूड डालने की कोशिश हुई विफल
उधर मार्तण्ड वर्मा ने अपने दस हजार सैनिकों के साथ घेरा डाल दिया.  दोनों तरफ से छोटे छोटे हमले होने लगे. डच कप्तान डी लेनॉय ने केरल के मछुआरों को अपने साथ मिलने की कोशिश की.  उन्हें पैसों का लालच दिया गया लेकिन विदेशियों की ये चाल नाकामयाब रही. मछुआरे अपने राजा से जुड़े रहे उन्होंने पूरी तरह से त्रावणकोर की सेना का साथ दिया.

आखिरी जंग में डच सेना की कमर टूट गई
मार्तण्ड वर्मा ने आखरी लड़ाई के लिए मानसून का वक़्त चुना था.  ताकि डच सेना फंस जाय और उन्हें श्रीलंका या कोच्चि से उन्हें कोई मदद ना मिल पाए. वही हुआ डच सेना पर मार्तण्ड वर्मा की सेना ने जबरदस्त हमला किया और उनके हथियारों के गोदाम को उड़ा दिया गया. जिसके बाद यूरोप की सबसे ताकतवर कम्पनी की सेना ने भारत के एक छोटे से राज्य के सामने घुटने टेक दिए. इस महान जीत की याद में कोलाचल में एक स्मारक बनाया गया.

मार्तण्ड वर्मा ने डच कमांडर की हत्या नहीं की
राजा मार्तण्ड वर्मा ने इतनी बड़ी जीत हासिल करने के बाद भी डच कमांडर डी लेनॉय को किसी तरह का दंड नहीं दिया. बल्कि उसे त्राणवकोर की सेना को आधुनिक बनाने की जिम्मेदारी सौंपी. क्योंकि वह जानते थे कि आने वाले वक्त में वही राज करेगा, जो युद्ध की बदलती तकनीक की जानकारी रखता हो. अपनी इसी दूरदर्शिता की वजह से उन्होंने पूरे 29 साल तक राज किया और अपने उत्तराधिकारियों को एक सुरक्षित शासन सौंप कर गए.

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