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भारत के गौरव : मुगलों के छक्के छुड़ाने वाले सम्राट का नाम था हेमू

सम्राट हेमू की वीरगाथा किसी ऐतिहासिक काल से कम नहीं है. महान योद्धा हेमचंद्र विक्रमादित्य इतिहास के पन्नों का एक शौर्ययुग हैं. वे किस तरह एक व्यापारी से एक महान सम्राट बने और हिन्दुओं को मुसलमान बनाने की मुगलों की क्रूरता के बीच महान हिन्दू राजा हेमू और उनके पिता की वीरता की कहानी यहां जानिये इंच बाई इंच और हर्फ़ दर हर्फ़..  

भारत के गौरव : मुगलों के छक्के छुड़ाने वाले सम्राट का नाम था हेमू

नई दिल्ली. भारत का एक युग साहित्य में वीरगाथा काल नाम से जाना जाता है. वीरगाथा काल में सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य की एक महान योद्धा के रूप में सशक्त परिचय है. एक साधारण से पुरोहित के घर में जन्मे हेमू सूरी वंश के सबसे अहम किरदार बन गए थे. विशाल मुगल सेना को शिकस्त दे कर हेमू ने दिल्ली की गद्दी पर कब्जा किया और पृथ्वीराज चौहान के बाद 350 साल से हिन्दू राजा की प्रतीक्षा कर रही दिल्ली की गद्दी पर एक बार फिर हिन्दू सम्राट आसीन हुआ था. लेकिन उसके बाद जो हुआ उस पानीपत के युद्ध ने भारत का समूचा इतिहास बदल दिया.

लड़े तेईस युद्ध और जीते बाइस 

हेमचंद्र विक्रमादित्य को हेमू के लोकप्रिय नाम से भी जाना जाता था. हेमू का जन्म 1501 ईस्वी में अलवर में हुआ. हेमू का जन्म सामान्य परिवार में हुआ था. उनके मन में मुगलों के खिलाफ प्रतिशोध कूट कूट कर भरा था. सम्राट हेमचंद्र ने अकबर को युद्ध में मात दी. पानीपत की दूसरी लड़ाई के वीर थे हेमू और इस लड़ाई ने इस वीर राजा का नाम इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज किया है. हेमू ने अपने जीवन में कुल 23 युद्ध लड़े. वीर हेमू को छोटे-बड़े 22 युद्ध में विजयश्री प्राप्त हुई किन्तु अंतिम और 23वें युद्ध में सम्राट हेमचंद्र को वीरगति मिली. उनकी आंख में तीर मारकर उनकी हत्या की गई.

पुरोहित का बालक बना सम्राट

उस परमवीर योद्धा का नाम था हेमचन्द्र विक्रमादित्य नाम, जिसने अपने साहस, युद्ध-कौशल और सूझबूझ की बदौलत मुगलिया सल्तनत को परास्त कर दिल्ली की गद्दी पर आसीन होने का गौरव पाया. एक साधारण पुरोहित के घर में जन्म लेने के बावजूद उस युग के सबसे बड़े राजसिंहासन पर बैठने वाला ये महान योद्धा इतिहास में हेमू नाम से जाना गया. 

पुरोहितों का परिवार था हेमू का 

हेमू का जन्म 1501 ईस्वी में अलवर के मछेरी गांव में हुआ था. पिता राय पूरनमल एक सम्मानित पुरोहित थे. लेकिन मुगलकाल में पुरोहितों की जिंदगी दुश्वारियों से भरी हुई थी. बेलगाम मुगल सैनिक पंडित पुरोहितों को खास तौर पर परेशान करते थे. इस कारण इस दुश्वारी और जलालत से बचने के लिए राय पूरनमल परिवार सहित राजस्थान के अलवर से हरियाणा के रेवाड़ी में आकर बस गए. पुरोहिती के काम से जीवन-यापन यहां भी आसान नहीं था, इसलिये परिवार का पेट पालने के लिए उन्होंने नमक का कारोबार शुरू कर दिया. पुरोहितों को लेकर मुगलों की नफरत प्रतिशोध की ज्वाला बनकर हेमू के सीने में बचपन से ही धधकने लगी थी.

 

अफगानों का साथ लेकर आगे बढे हेमू 

हेमू का वर्चस्व अफ़गानों के साथ के बाद बढ़ने लगा. हेमू ने उनके साथ मंडियों में काम किया और धीरे धीर अधिकारी बना. एक मामूली व्यक्ति से ऊपर तक आया. उसने अफ़गानों के लिए जितनी नौकरी और वफादारी दिखाई, उसकी बदौलत अफ़गान मुग़लों पर भारी पड़े. वैसे भी अफगानों और मुगलों में रार थी, इस हालत में ये स्वाभाविक था कि हेमू मुग़लों के खिलाफ लड़े.

मुगलों से नफरत हेमू के खून में थी 

हेमू के मन में मुगलों के खिलाफ प्रतिशोध का आलम ये था कि उन्होंने नमक छोड़ अमोनियम नाइट्रेट का कारोबार शुरू कर दिया. अमोनियम नाइट्रेट तब कारतूस और तोप के गोले के लिए बारूद बनाने के काम आता था. ये वो दौर था जब हिन्दुस्तान पर हुमायूं की बादशाहत में मुगलों की हुकूमत बुलंद थी. अफगानी आक्रांता शेरशाह सूरी मुगलिया सल्तनत की सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभर रहा था. हेमू शेरशाह सूरी के लश्कर के लिए अमोनियम नाइट्रेट सप्लाई करने लगे. 

अफगानों के तोपखाने मजबूत कराये हेमू ने 

इस तरह धीरे-धीरेअफगान सेना से उनकी नजदीकी बढ़ने लगी. मौके की नजाकत को देखते हुए हेमू ने रेवाड़ी में ही धातु से तमाम घातक हथियार बनाने की फैक्ट्री शुरू की और इस फैक्ट्री में बने हथियार शेरशाह सूरी की सेना को सप्लाई करने लगे जिनका प्रयोग अफ़गान बारूद बनाने के लिए करते थे. इसलिए इसमें कोई शक नहीं कि अफ़गानों की सेना के तोपखानों को मजबूत करने में हेमू का सहयोग रहा है .

 

हुमायूं के खिलाफ साथ दिया सूरी का 

17 मई,1540 को कन्नौज के पास बिलग्राम में एक भयंकर युद्ध में शेरशाह सूरी ने हुमायूं को करारी शिकस्त दी. हुमायूं भारत छोड़ कर काबुल भाग गया और दिल्ली पर सूरी वंश आधिपत्य हो गया. दिल्ली पर सूरी वंश की स्थापना के बाद भी हेमू उसकी सेना को हथियार सप्लाई करते रहे. इस तरह सूरी वंश की सेना में हेमू की अच्छी पैठ हो गई. 

सूरी के साथ आ कर ताकत बढ़ी हेमू की 

1445 में शेरशाह सूरी की मृत्यु के बाद उसका बेटा इस्लाम शाह तख्तनशीन हुआ. इस्लाम शाह को हेमू की योग्यता और काबिलियत के बारे में अच्छे से पता था. लिहाजा उसने हेमू को दिल्ली का बाजार अधीक्षक नियुक्त किया. कुछ समय बाद बाजार सुपरवाइज़र के साथ-साथ हेमू को आंतरिक सुरक्षा का मुख्य अधिकारी भी नियुक्त किया गया और इस पद को वजीर के पद के बराबर मान्यता दी गई. हेमू पर इस्लाम शाह का भरोसा इतना बढ़गया कि उसने उन्हें दारोगा-ए-चौकीकी अहम और सैन्य जिम्मेदारी भी सौंप दी. इस तरह हेमू के पास वित्त,आंतरिक सुरक्षा के साथ ही सैन्य जिम्मेदारी भी आ गई.

सेनापति बने हेमू 

1553 में हेमू की जिंदगी ने बड़ी करवट ली. 1553  में इस्लाम शाह की मृत्यु हो गई. उसके बाद उसका 12 साल का नाबालिग बेटा गद्दी पर बैठा, लेकिन इस्लाम शाह के भतीजे आदिलशाह ने साजिश करके उसकी हत्या करवा दी और खुद उत्तराधिकारी बन बैठा. आदिलशाह धोखे से बादशाह तो बन गयालेकिन उसके भीतर सल्तनत संभालने की काबिलियत नहीं थी. लिहाजा उसने हेमू को अपना वजीर नियुक्त कर पूरी सल्तनत की जिम्मेदारी उन्हें सौंप दी. आदिलशाह ने हेमू को प्रधान सेनापति भी नियुक्त कर दिया. 

बेताज बादशाह बने हेमू  

इसके बाद हेमू का कद काफी बढ़ गया और एक तरह से सल्तनत की सत्ता उनके हाथ में आ गई. शासन की बागडोर हाथ में आते ही हेमू ने टैक्स न चुकाने वाले अफगान सामंतों को कुचलना शुरू करदिया. इब्राहिम खान,सुल्तान मोहम्मद खान, ताज कर्रानी, रसखान नूरानी जैसे विद्रोहियों को युद्ध में शिकस्त दे उन्हें मौत के घाट उतार दिया. बंगाल पर फतह हासिल कर शाहबाज खान को अपना गवर्नर नियुक्त किया. आलम ये हो गया कि हेमू को ही लोग बादशाह मानने लगे.

आगरा पर हुआ कब्ज़ा हेमू का 

24 जनवरी 1556 को मुगल वंश के शासक हुमायूं का निधन हो गया. हुमायूं के निधन के बाद उसके नाबालिग बेटे 13 साल के अकबर का 14 फरवरी 1556 को पंजाब के कलानौर में राज्याभिषेक हुआ. हुमायूं की मौत के समय हेमू बंगाल में थे. मौत की खबर मिलने के बाद उन्होंने अपने सैनिकों को दिल्ली पर कब्जा करने का हुक्म दिया. हेमू ने खुद विशाल सेना के साथ बंगाल से दिल्ली के लिए कूच किया और रास्ते में कई सामंतों और सूबेदारों को शिकस्त देते हुए आगरा का रुख किया. हेमू के युद्ध कौशल, पराक्रम और वीरता का ये खौफ था कि आगरा का मुगलवंश का गवर्नर इस्कंदर खान उज्बेग हमले से पहले ही भाग खड़ा हुआ. इस तरह आगरा पर हेमू का कब्जा हो गया. 

हेमू बने दिल्ली के बादशाह 

आगरा फतह के बाद हेमू ने दिल्ली कूच किया. 6 अक्टूबर 1556 को दिल्ली के तुगलकाबाद इलाके में सेनापति तरदी बेग के नेतृत्व में मुगलों ने हेमू के अजेय अभियान को रोकने की कोशिश की. लेकिन हेमू की रणनीति के आगे तरदी बेग कहां टिकने वाला था. मुगलों की करारी शिकस्त हुई. हेमू की सेना ने 3000 मुगल सैनिकों का संहार कर दिया. बाकी युद्ध का मैदान छोड़कर भाग खड़े हुए. अगले दिन 7 अक्टूबर 1556 को दिल्ली के पुराने किले में हेमू का विधिवत वैदिक रीति-रिवाज से राज्याभिषेक हुआ. इस तरह पृथ्वीराज चौहान के निधन के 350 साल बाद दिल्ली की गद्दी पर पहली बार हिन्दू सम्राट तख्तनशीं हुआ.

 

हेमू धार्मिक भेदभाव नहीं करते थे 

एक दिलचस्प तथ्य ये है कि हेमू की सेना में 30 फीसदी हिन्दू और 70 फीसदी अफगान सैनिक थे, पर हेमू दोनों के बीच कोई भेदभाव नहीं करते थे. यही वजह है कि अफगान सैनिक उनके प्रति काफी वफादार थे. उधर हेमू के दिल्ली फतह की सूचना पाकर अकबर और उसके सिपहसालार काबुल भागने की योजना बनाने लगे, लेकिन अकबर का संरक्षक बैरम खान युद्ध के बगैर हथियार छोड़ देने के पक्ष में नहीं था. उसने हेमू से लोहा लेने के लिए अपने सैनिकों के साथ दिल्ली की ओर कूच किया. 5 नवंबर 1556 को उसी पानीपत के ऐतिहासिक मैदान में दोनों सेनाओं का आमना-सामना हुआ जहां ठीक 30 साल पहले अकबर के दादा बाबर ने इब्राहिम लोदी को हराकर हिन्दुस्तान में मुगलवंश की नींव रखी थी. बैरम खान ने हेमू से लड़ाई तो मोल ली थी लेकिन उसके मन में भी इस शूरवीर को लेकर इतना खौफ था कि खुद युद्धभूमि में ना वो खुद आया और ना ही अकबर को आने दिया. 

डरे हुए थे अकबर और बैरम खान  

अंग्रेज इतिहासकार एच जी कीन के मुताबिक अकबर और उसके संरक्षक बैरम खान ने लड़ाई में भाग नहीं लिया. दोनों युद्भभूमि से 8 मील दूर सुरक्षित जगह पर थे. दोनों अपने 5000 सबसे ट्रेंड और वफादार सैनिकों के सुरक्षा घेरे में थे ताकि हमले की स्थिति में काबुल भागने का मौका मिल सके.

पानीपत का दुर्भाग्यपूर्ण युद्ध 

पानीपत के मैदान में दोनों सेनाएं आमने-सामने थीं. हेमू अपनी सेना का नेतृत्व खुद कर रहे थे.  मैदान-ए-जंग में हेमू की मौजूदगी मुगल सैनिकों के हौसले पस्त करने के लिए काफी थी. हेमू की सेना 1500 ट्रेंड हाथियों और तोपों से लैस थी. हेमू की विशाल और बहादुर सेना के आगे मुगल सैनिक कहां टिकने वाले थे. हेमू खुद हाथी के हौदे में बैठे हुए थे. ऐसा लगा रहा था कि एक दिन में ही युद्ध समाप्त हो जाएगा. लेकिन तभी इतिहास ने एक खतरनाक करवट ले ली. हेमू की आंख में कहीं से एक तीर आकर धंस गया. हेमू निढाल हो गए. हेमू का महावत भी मारा गया. मुगल सैनिकों ने मौके की नजाकत को देखते हुए हेमू को बंदी बना लिया. अपने परमवीर राजा के बंदी बनने की खबर से हेमू की सेना के हौसले एक झटके में पस्त हो गए. मुगल सेना की जीत हुई. भारत का इतिहास बदलते-बदलते रह गया.

बंधे हुए जख्मी सम्राट का सर कलम किया बैरम खान ने 

उधर जख्मी हेमू को अकबर के सामने पेश किया गया. जिस हेमू से बैरम खान काफी खौफा खाता था वो अब जख्मी हालत में उसके सामने थे. बैरम खान इस मौके को कैसे हाथ से जाने देता. उसने 13 साल के अकबर को कहा कि दुश्मन कब्जे में है उसके धड़ से सर अलग कर जीत का ऐलान किया जाए. कहते हैं  कि जख्मी हेमू का सर कलम करने की हिम्मत अकबर नहीं जुटा पाया. अकबर के दरबारी अबुल फजल ने आईने अकबरी में लिखा है कि अकबर ने जख्मी और अचेत दुश्मन को मारने से इंकार कर दिया था. सच्चाई जो भी हो पर ऐतिहासिक तथ्य ये है कि बैरम खान ने अपनी तलवार से जख्मी सम्राट हेमू का सिर धड़ से अलग कर दिया.

हेमू के 82 वर्षीय पिता को मुसलमान नहीं बना सका बैरम 

कहते हैं कि मुगलवंश ने इस फतह को भुनाने और विद्रोहियों में खौफ पैदा करने के लिए हेमू का कटा हुआ सिर काबुल के दिल्ली दरवाजा पर प्रदर्शन के लिए भेज दिया और उसके धड़ को दिल्ली के पुराने किले में वही लटकाया गया जहां एक महीने पहले उसका राज्याभिषेक हुआ था. इस जीत के बाद मुगलवंश की क्रूरता का आलम ये हो गया कि उसके दुर्दांत सैनिकों ने हेमू के 82 साल के बुजुर्ग पिता को भी बंदी बना लिया और उनसे इस्लाम कबूल करने को कहा. इंकार करने पर 82 साल के बुजुर्ग का भी सिर कलम कर दिया गया.

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