राजनीति से नहीं है हिंदुत्व, हिंदुओं से है राजनीति

भारत में पिछले कुछ दिनों से एक अजीब ट्रेंड देखा जा रहा है कि चुनावी जीत या हार से हिंदुत्व को जोड़कर देखा जाने लगा है. जैसे किसी खास राजनीतिक पार्टी की जीत ही 'हिंदुत्व की जीत' है या फिर किसी उसकी हार 'हिंदुत्व की हार' बता दी जाती है. ये उचित नहीं है. धर्म आदिकाल से शेष सनातन है. वह अपने आप में इतना मजबूत है कि देश को कोई भी राजनीतिक दल उसकी उपेक्षा नहीं कर पा रहा है. इसी में हिंदुत्व की जीत है.

राजनीति से नहीं है हिंदुत्व, हिंदुओं से है राजनीति

नई दिल्ली: राजनीति और धर्म दो अलग विषय वस्तु हैं. दोनों को एक करके नहीं देखा जा सकता. चुनावी राजनीति की उम्र महज 5 साल की होती है. जबकि सनातन धर्म आदि और अनंत है. यह सच है कि भाजपा के शासनकाल में धर्म और उससे जुड़े मुद्दों को तरजीह दी जाती है. लेकिन ये बिल्कुल गलत है कि सनातन धर्म भाजपा या शिवसेना जैसे हिंदूवादी दलों की राजनीतिक दलों की जीत या हार पर निर्भर करता है.

राजनीति से जोड़ने से कम होती है सनातन धर्म की गरिमा
सनातन धर्म आदि और अनंत है. इसके लिए हजारों वर्षों से करोड़ों लोगों ने अपने निजी हितों की बलि चढ़ाई है. भाई मतिदास, सतीदास, पूज्य गुरु गोविंदसिंह जी का परिवार जैसे अनंत उदाहरण हैं जो यह दर्शाते हैं कि धर्म भारत की धर्मप्रेमी जनता के हृदय में निवास करता है. इसका राजनीति से कोई लेना देना नहीं है. देश की राजनीतिक व्यवस्था महज 73 साल पुरानी है. जब हम राजनीति से सनातन धर्म को जोड़ते हैं तो हम इसके लिए बलिदान होने वाले करोड़ो लोगों के बलिदानों का उपहास करते हैं. जो बिल्कुल उचित नहीं है.

राजनीति का उद्देश्य सत्ता जबकि धर्म का उद्देश्य ईश्वर
राजनीतिक लड़ाई 5 सालों के लिए सत्ता हासिल करने के लिए लड़ी जाती है. लेकिन सनातन धर्म के नियम आपको असीम शांति और ईश्वर की प्राप्ति कराते हैं. दोनों में कोई तुलना ही नहीं है. राजनीतिक जंग राजनेता लड़ते हैं. लेकिन सनातन धर्म के लिए आम जनता संघर्ष करती है.
सदियों से भारत भूमि पर आततायी मजहबी कट्टरपंथी हमला करते आ रहे हैं. जिन्होंने मिस्र, ईरान, बेबीलोन, दजला फरात की घाटियों में वहां के मूल धर्मों को नष्ट करके 'एक पैगंबर एक किताब' की क्रूर सेमेटिक व्यवस्था नाजिल कर दी.
लेकिन हजारों बर्बर हमलों के बावजूद भारत भूमि से सनातन धर्म नष्ट नहीं हो पाया. क्या ये राजनीतिक जंग की वजह से था? कतई नहीं. ये इसलिए संभव हुआ क्योंकि भारत के सनातनी लोगों ने अपनी आस्था और विश्वास के संरक्षण के लिए चप्पे चप्पे पर संघर्ष किया और मजहबी आततायियों के मंसूबों को नाकामयाब बनाया. इसका राजनीति से क्या लेना देना?  

संघ के बड़े नेता भैयाजी जोशी ने दिया इसी बात का संकेत
सनातन धर्म के लिए संघर्ष राजनीति से कहीं परे है. देश के तमाम बुद्धिजीवी इस बात को अच्छी तरह समझते हैं. 9 फरवरी 2020 यानी रविवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर कार्यवाह भैयाजी जोशी ने इसी बात के संकेत दिए थे. उन्होंने कहा कि 'हिंदू समुदाय का मतलब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से संबंधित होना नहीं है. साथ ही, भाजपा के विरोध को हिंदुओं के विरोध के तौर नहीं देखा जाना चाहिए. राजनैतिक लड़ाई चलती रहेगी, लेकिन इसे हिंदुओं से नहीं जोड़ा जाना चाहिए.'

संघ की स्थापना करने वाले केशव बलिराम  हेडगेवार जी की मृत्यु के बाद बेहद मुश्किल समय में संघ की कमान संभालने वाले गुरु गोलवलकर जी के भी विचार कुछ इसी प्रकार के थे. वह सनातन धर्म के संवर्द्धन के लिए देश के हर राजनीतिक दल में हिंदूवादी विचारों वाले नेताओं को बढ़ावा देने के पक्ष में थे.

सनातन धर्म इतना मजबूत है कि वह राजनेताओं की मजबूरी बन गया है
सनातन धर्म(हिंदुत्व) का पालन करने वालों को यह ध्यान रखना होगा कि उनके हित या अनहित का ध्यान उन्हें स्वयं रखना है. किसी राजनैतिक दल के नेता से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह सत्ता का लोभ छोड़कर हिंदुत्व के मूल उद्देश्यों को प्रश्रय देगा. हालांकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जैसे व्यक्ति इसके अपवाद हैं. क्योंकि उनकी कार्यप्रणाली में यह स्पष्ट दिखाई देता है कि उनके लिए सत्ता से ज्यादा जरुरी सनातन धर्म के मूर्त स्वरुप भारत भूमि की सत्ता को सर्वोपरि बनाना है. क्योंकि पीएम मोदी साधारण राजनेता नहीं बल्कि आधुनिक वस्त्रों में लिपटे अंदर से एक संन्यासी का हृदय रखने वाले व्यक्ति हैं.


लेकिन उनके अतिरिक्त देश में और भी राजनेता है. जो सत्ता हासिल करना चाहते हैं. ऐसे में हिंदुओं को अपने मुख्य मुद्दों की पहचान करके तमाम अवसरवादी राजनेताओं मजबूर कर देना चाहिए कि वह बहुसंख्यक हिंदूवादी जनता की उपेक्षा करने का साहस नहीं कर पाएं.

पिछले कुछ वर्षों से सनातन धर्म ने दिखाई है अपनी राजनीतिक ताकत
ये हिंदू वोटों की ही ताकत है कि चुनाव के समय दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल को स्वयं को 'हनुमान भक्त' घोषित करना पड़ा.

राहुल गांधी जैसे नेता को भी लोकसभा चुनाव के समय खुद को शिवभक्त-जनेऊधारी और पता नहीं क्या क्या बताना पड़ गया. यहां तक कि मुसलमान वोटों की सौदागरी करने में माहिर AIMIM के असदुद्दीन ओवैसी इन दिनों हैदराबाद की माता सिंहवाहिनी कालिका के मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए पैसों की भीख मांग रहे हैं.


यह सभी हिंदुत्व की बढ़ती ताकत के संकेत हैं. भारत की सनातनी जनता को इन संकेतों की पहचान करनी होगी और अपने मुद्दों को इतनी मजबूती से सामने रखना होगा कि कोई भी उन्हें नजरअंदाज करके सत्ता हासिल करने का सपना नहीं देख पाए.

लेकिन इसके लिए सबसे जरुरी है अपनी जातीय, भाषायी और क्षेत्रीय पहचान को भुलाकर स्वयं को सनातन धर्मी हिंदू के रुप में स्थापित करना. ताकि आप एक मजबूत और बड़ी राजनीतिक इकाई(वोट बैंक) के रुप में राजनीति को अपने हिसाब से चला सकें.