भाषाई मर्यादा के टूटे दरवाजे से राजनीति में आई थीं स्वाति, विवादों से गहरा नाता

जिस घटना से स्वाति सिंह के राजनीति में आने के दरवाजे खुले वह घटना ही भारतीय राजनीति का दुर्भाग्य थी. हालांकि यह माना गया कि भुक्तभोगी पीड़ित को मौका मिलेगा तो वह ऐसी पीड़ा किसी को नहीं पहुंचाएगा. लेकिन स्वाति सिंह के साथ जिस तरह के विवाद सामने आए हैं वह उनकी राजनीतिक मंशा पर सवाल उठाते हैं. कई बार जाहिर होता है कि उस समय भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष रहे दयाशंकर सिंह और उनकी पत्नी स्वाति सिंह ने बेटी के खिलाफ हुई टिप्पणी का सीधा-सीधा राजनीतिक इस्तेमाल किया.

भाषाई मर्यादा के टूटे दरवाजे से राजनीति में आई थीं स्वाति, विवादों से गहरा नाता

लखनऊः राजनीति किसी की मां-बहन, बेटी जैसी सगी नहीं होती, लेकिन वक्त-जरूरत पड़ने पर यह मां-बहन, बेटी को कहीं भी खींच सकती है. बशर्ते आपको उनके वोट की कीमत पता होनी चाहिए. इस बात के उदाहरण में अभी तक कभी दबी तो कभी ऊंची आवाज में कांग्रेस और गांधी परिवार का नाम लिया जाता है. लेकिन 2016 की उस जुलाई में उत्तर प्रदेश का लखनऊ भी ऐसी ही एक कहानी लिखने-सुनने बैठा था. जब राजनीतिक प्रचार, राजनीतिक सद्भावना और राजनीतिक विरोध किसी घर की शीलता की दीवार फांद गया और सीधे एक बेटी पर चोट की. जिसका न वोट से सीधा कोई मतलब था और न ही राजनीति से. वह अचानक इस्तेमाल कर ली गई थी. बिना सोचे, बिना समझे और बिना पूछे.

उस साल यूपी में चुनावी हलचल थी
साल-महीने की तारीख से साफ है कि वह समय उत्तर-प्रदेश में विधानसभा चुनाव का था. केंद्र में तो भाजपा की सरकार जादुई आंकड़ों के साथ बन गई थी, देश की राजनीति की धुरी तय करने वाले सूबे में भाजपा, कांग्रेस, सपा, और बसपा यानि चारों प्रमुख दल अपने-अपने लिए मुद्दों की जमीन तलाश रहे थे. इससे पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हुए दंगों से भाजपा को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तो ध्रुवीकरण में आसानी हो गई थी, जिसका लोक सभा चुनाव में फायदा मिला भी था, लेकिन विधानसभा चुनाव में सिर्फ इस बलबूते समीकरण नहीं साधे जा सकते थे. उधर अखिलेश-राहुल ने एक-दूसरे के कंधे पर हाथ रख लिया और अच्छे लड़के बन गए, लेकिन भाजपा की चिंता नीला सैलाब था जो कि मुखर हो रहा था. असल में उत्तर प्रदेश में भाजपा को यहीं से कड़ी टक्कर मिल रही थी. 

फिर भाजपा से हो गई एक गलती
पसोपेश वाली भाजपा में एक नेता थे दयाशंकर सिंह. प्रदेश की राजनीति में कद उनका ठीक ही था. उन्होंने टिकट बांटने को लेकर मायावती पर अभद्र टिप्पणी कर दी. कहा-जो सबसे अधिक पैसे दे, उन्हें टिकट देती हैं. बसपा को यह टिप्पणी नागवार गुजरी. धरने-प्रदर्शन हुए.

भाजपा को भी बीच चुनाव में ऐसा माहौल खराब होना ठीक नहीं लगा. नैतिकता के लिहाज से भी दयाशंकर ने गलत बोला था तो पार्टी की कमान संभाल रहे केशव प्रसाद मौर्य ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया और 6 साल के लिए दयाशंकर निलंबित हो गए.

बसपा से हुई और भयंकर गलती, जिसकी कोई माफी नहीं
भाजपा की इस टिप्पणी पर बसपा काफी हमलावर थी. वह इसे आन का मुद्दा बनाने चली थी. इसके खिलाफ बड़ी-बड़ी रैलियां और धरने-प्रदर्शन आयोजन हो रहे थे. इसी दौरान जोश-जोश बसपा नेता नसीमुद्दीन सिद्दकी की जुबान फिसल गई. ऐसी फिसली की बसपा को ले डूबी. उन्होंने नारे लगवा दिए कि दयाशंकर सिंह अपनी बेटी को पेश करो. इस तरह एक स्कूल जाने वाली किशोरी बिना मतलब राजनीति के चौसर पर खींच लाई गई. यह बसपा के लिए बड़ी गलती साबित हुई. जिसके लिए चारों ओर से बसपा की आलोचना होने लगी.

इसके बाद सामने आईं स्वाति सिंह, बनी पोस्टर लेडी
बात राजनीति के रण तक रहती तो समझ आता, लेकिन वह तो कुंडी तोड़कर दयाशंकर सिंह के घर में घुस आई थी. बेटी के मन को भी ठेस पहुंची थी. स्वाति सिंह इस अपमान का बदला लेने अपनी सास तेतरा सिंह के साथ खुद मैदान में उतर आईं.

उन्होंने कहा कि यह कहां का न्याय है कि राजनीति के लालच में उनकी मासूम बेटी के नाम पर नारे लगाए जाएं. भाजपा, जो अभी तक बैकफुट पर थी. जोश में उठ खड़ी हुई. विधानसभा चुनाव को नारा मिला  बेटी के सम्मान में, भाजपा मैदान में. बसपा के चार नेताओं के खिलाफ मामला दर्ज हुआ और भाजपा ने इसी दम पर चुनाव लड़ा.

स्वाति का राजनीति में प्रवेश
यह वही स्वाति सिंह हैं जो आज अंसल ग्रुप की एफआईआर लिखने को लेकर सीओ को धमका रही हैं. तब भाजपा ने इन्हें बेटी के सम्मान में मैदान में उतारा था. यूपी भाजपा की महिला इकाई का अध्यक्ष बनाया. विधानसभा चुनाव में वह लखनऊ के सरोजिनीनगर से विधायक बनीं और उन्हें योगी आदित्यनाथ सरकार में मंत्री बनाया गया. वह यूपी सरकार में राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) हैं. सीओ को धमकाने को लेकर उनका मामला तूल पकड़ा है. सीएम योगी ने भी इस मामले पर नाराजगी जताई है.

विवादों में रही हैं स्वाति, बीयर बार का किया उदघाटन
 20 मई 2017 को स्वाति सिंह ने गोमती नगर इलाके में 'बी दी बीयर' नाम के बार का उद्घाटन किया था. यूपी के सीएम ने इस कार्यक्रम को लेकर उनसे जवाब मांगा था. स्वाति के अलावा रायबरेली के एसपी गौरव सिंह और उनकी पत्नी उन्नाव की एसपी नेहा पांडे भी यहां पहुंची थीं.

इसे लेकर विपक्ष ने भाजपा का दोहरा चरित्र कहकर पार्टी का घेराव किया था. इस दोहरा चरित्र के पीछे वही बेटी के सम्मान में वाला नारा ही था. कार्यक्रम को लेकर जो तस्वीरें सामने आई थीं, उसमें स्वाति एक हाथ से बार का रिबन काट रही थीं और उनके दूसरे हाथ में बार का मेन्यू कार्ड था. हालांकि तब उन्होंने सफाई दी थी कि वह बार नहीं बल्कि एक रेस्टोरेंट का उद्घाटन था.

भंडारे में बांटे थे रुपये
एक भंडारे के दौरान मंत्री स्वाति सिंह ने खाने के साथ-साथ लोगों को 100-100 रुपये भी बांटे थे. ऐसा कहकर उनकी आलोचना की गई थी. यह भंडारा लखनऊ के गोमतीनगर में था. हालांकि स्वाति सिंह के एक करीबी ने बताया कि 100-100 रुपये केवल 5 कन्याओं को दिए गए थे.

स्वाति सिंह ने भी रुपये बांटे जाने की बात से इनकार किया था. लगातार इस तरह के विवाद उठने पर सीएम योगी ने चिंता जाहिर की थी. 

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