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आखिर हम कब बंद करेंगे जलवायु और पर्यावरण से छेड़छाड़

करीब एक हफ्ते से दिल्ली-एनसीआर में हेल्थ इमरजेंसी लागू है. यह स्थिति हर साल की हो चली है, लेकिन न हम खुद को बदलना चाहते हैं और न ही इस स्थिति को. यह सिर्फ एक शहर, राज्य या देश की बात नहीं है, बल्कि यह पूरे विश्व की बात है. जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग आज की एक बड़ी समस्या है, लेकिन हम सभी आज खुद में नीरो बने पड़े हैं और पर्यावरण को जलता देख रहे हैं.  

आखिर हम कब बंद करेंगे जलवायु और पर्यावरण से छेड़छाड़

नई दिल्लीः रोम जल रहा था तब नीरो बंसी बजा रहा था. किसी समय का यह वाकया आज कहावत बनकर प्रसिद्ध है. हालांकि हमने न रोम को जलते देखा और न ही नीरो की मधुर बंसी सुनी, लेकिन आज सारा विश्व जल रहा है और हम वाकई बंसी बजा रहे हैं. अमेजन के जंगल जले, आरे के जंगल कटे, समुद्रों का जल स्तर बढ़ता गया, ग्लेशियर पिघलते गए. कहीं सूखा तो कहीं भारी बारिश. हम हर रोज, महीने और साल दर साल बिगड़ती हुई स्थितियों को झेल रहे हैं साथ ही और बिगड़ी स्थिति के लिए तैयार हो रहे हैं, लेकिन इसे बदल डालने की कोशिश नहीं कर पा रहे हैं. बैंकॉक में सोमवार को हुए आसियान सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरस इसी ओर ध्यान दिलाने आए थे. उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन बड़ी समस्या है.

गुटेरस बोलेः 2050 तक दुनिया के 30 करोड़ लोग समुद्र में बह जाएंगे

 एंटोनियो गुटेरस ने एक गंभीर रिपोर्ट के आंकड़े सामने रखे और कहा कि समुद्र का जलस्तर तेजी से बढ़ रहा है. इस समस्या से निपटने के लिए जल्द ही कदम उठाने होंगे. जलवायु परिवर्तन (Climate Change) पर लगाम लगाने की दिशा में सही कोशिश नहीं की गई तो 2050 तक दुनियाभर में 30 करोड़ लोग समुद्र में बह जाएंगे.


 उन्होंने कहा कि भारत, बांग्लादेश, चीन और जापान पर समुद्र का जलस्तर बढ़ने का सबसे अधिक जोखिम है. आज दुनिया में जीवन की निरंतरता यानी वर्तमान अवस्था में खुद को बनाए रखने की क्षमता के आगे सबसे बड़ा जोखिम जलवायु परिवर्तन है.

यूएन महासचिव की चेतावनी से संबंधित पूरी खबर यहां पढ़ें

लेकिन हमारे कानों पर जूं कहां रेंगती हैं
पर्यावरण संरक्षण को लेकर बातें बहुत लंबे समय से हो रही हैं. इसका सबसे आसान उदाहरण लें तो पिछले पांच दशकों से तो यह मुद्दा स्कूली किताबों में विषय बनकर मौजूद है ही. यानी कि पर्यावरण बचाने की बात करते हुए इस समय एक पीढ़ी बुढ़ापे के करीब है और दूसरी पूरी तरह युवा हो चुकी है, लेकिन दुनिया को हासिल हुआ है, घोर प्रदूषित माहौल, तेजी से बदलता मौसम और प्राकृतिक आपदाएं. हम लगातार इस बड़ी समस्या पर आंखें बंद किए बैठे हैं. डालते हैं एक नजर, हमने क्या-क्या बिगाड़ लिया है-

अमेजन के जंगल जले

इस साल जुलाई-अगस्त में ब्राजील से खबर आई की धरती का फेफड़ा कहा जाने वाला अमेजन जंगल भयंकर आग से घिरा हुआ है. ब्राजील समेत इसके निकटवर्ती आठ देशों के शहरों का आसमान इसके धुएं से ढक गया था. पहले तो मामले को दबाने की कोशिश हुई, लेकिन इसमें असफलता के बाद आरोप-प्रत्यारोप का लंबा दौर चला. यानी तकरीबन 20 दिन तक इसी लगी हुई आग को बुझाने की कोशिश ही नहीं शुरू हुई


 वैश्विक स्तर पर निंदा होने के बाद ब्राजील के राष्ट्रपति जैर बोल्सोनारो ने आग बुझाने के इंतजाम के आदेश दिए. बताया जाता है कि तबतक अमेजन के जंगल का एक बड़ा इलाका राख हो चुका था.

आरे के जंगल कट गए

मुंबई के आरे कॉलोनी में घने एरिया लगे पेड़ों का समूह अब जंगल का रूप ले चुका था. यहां मेट्रो शेड बनाने की तैयारी थी, जिसके लिए इसके हजारों पेड़ों को काटने की अनुमति दे दी गई. यहां भी सितंबर से लगातार दो महीने तक आरे को लेकर हाई वोल्टेज ड्रामा चला. लोगों के साथ-साथ फिल्मी सितारों ने भी इसे न काटे जाने की मांग की थी. 


1951 में मुंबई में डेयरी उद्योग को बढ़ावा देने के लिए पंडित नेहरू ने आरे मिल्क कॉलोनी की नींव रखी थी. इस मौके पर उन्होंने पौधारोपण किया था. यह पूरा इलाका 3166 एकड़ में फैला है. जब तक पेड़ काटने पर रोक लगाई जाती 2500 पेड़ काटे जा चुके थे.

नदियों की स्थिति बदतर है ही

पानी के प्राकृतिक स्त्रोत के तौर पर मौजूद सदानीरा नदियों को हम पहले ही प्रदूषण की भेंट चढ़ा चुके हैं. दिल्ली में यमुना का हाल किसी छिपा नहीं है और गंगा की सफाई को लेकर भी अब तक केवल कोरी गप्प ही होती रही है. इसके अलावा कई सहायक नदियां थीं जो शहरों से होते हुए गांवों को सींचती जाती थीं, लेकिन आज वह सभी सूख चुकी हैं. 2014 से अब तक गंगा की सफाई के लिए 3475.46 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं, लेकिन कहां, इसका जवाब नहीं.


 यमुना एक्शन प्लान के तहत 1500 करोड़ रुपये का बजट 2018 में जारी किया गया था, लेकिन मई 2019 में आई यूपीपीसीबी (उत्तर प्रदेश प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड) की रिपोर्ट कहती है कि पर्यटन के लिहाज से आगरा-मथुरा में यमुना की सफाई के लिए सबसे अधिक बजट दिया गया, लेकिन यमुना वहीं अधिक मैली मिली.

शाबाश ! पहाड़ों पर भी कचरा फैला आए हम

जून की गर्मियों में संसार की सबसे ऊंची चोटी से बुरी खबर आई थी. यहां पर्वत पर फतह हासिल करने पहुंचे लोगों की चढ़ाई में मौत हो गई थी. वजह सामने आई कि सबसे ऊंची चोटी पर भीड़ काफी बढ़ गई है, साथ ही यहां कचरा भी खूब हो गया है. 


एक रेस्क्यू टीम के मुताबिक ऊंचे-संकरे मार्ग पर 10 टन कचरा मिला. एक तो यह पहाड़ का मिजाज बिगाड़ रहा है, दूसरा चढ़ाई में भी रुकावट पैदा कर रहा है. बेस कैंपों में कचरा तेजी से बढ़ रहा है. करीब 8 हजार मीटर की ऊंचाई पर पर्वतारोही केन, बोतल, प्लास्टिक, क्लाइंबिंग गियर, टेंट और गैस के कनस्तर छोड़कर जा रहे हैं.

इसलिए जरूरी है गुटेरस की बात पर ध्यान देना


गुटेरस ने बताया कि पिछले 2-3 सालों से बढ़ते प्रदूषण और ग्‍लोबल वार्मिंग के कारण पूरी दुनिया को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. धरती को प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याओँ से बचाने के लिए विश्व के कई देश एक साथ आगे आए हैं. अगर इस प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग पर अभी से हम लोग जागरूक नहीं हुए तो आने वाली पीढ़ियों को शुद्ध हवा और साफ पानी के लिए भी तरसना पड़ सकता है. खैर, जहां तक शुद्ध हवा की बात है तो हमसे बेहतर इस स्थिति को कौन समझ सकता है, जहां हफ्ते भर से हेल्थ इमरजेंसी लागू हो. गला चोक, नाक बंद और आंखों में जलन हो. हम इससे बचने के लिए मास्क इंडस्ट्री को बढ़ावा दे सकते हैं, खुद की आदतें नहीं बदल सकते हैं.