डियर जिंदगी : समय मिले तो घर आना कभी…

हम मिलने के अर्थ को ही खो बैठे हैं. सोचते हैं किसी तरह मिलना टल जाए. मिलते उससे हैं, जिससे 'काम' बनता है. इस तरह काम तो बनते रहते हैं, लेकिन बने हुए दोस्‍त बिखरते जाते हैं. 

डियर जिंदगी : समय मिले तो घर आना कभी…

उनका आना अचानक ही होता है. जब आते हैं, भरपूर उत्‍साह, उमंग से मिलते हैं. अपने लिए कुछ नहीं कहते. परेशानी का शायद ही कभी जिक्र करते हों. पिछले दिनों आए तो पूछ लिया, 'किसी के घर जाना हो तो मैं छोड़ दूं.' उन्‍होंने कहा, नहीं. वैसे भी लोग अब घर पर कम ही बुलाते हैं. उनके कहने से लगा कि कुछ कसक है! कुछ फंस गया है. मैंने कहा, जो हुआ है, कह दीजिए.

उन्‍होंने बताया, 'वह बचपन का मित्र है. जब भी बात होती, कहता, आना तो मिलना जरूर. सो जब आए तो फोन किया. इस बार नहीं उस बार, मुलाकात टलती रही. इस बार मैंने कहा, चलो सुबह आठ बजे ही आ जाता हूं. उसने कहा, नहीं. अच्‍छा चलिए रात आठ बजे आता हूं. उसने कहा, नहीं तुम समझते क्‍यों नहीं, मिलना संभव नहीं. घर आते-आते रात हो जाती है. उसे कहा, भाई बाहर मिल, तो उसने कहा, दिल्‍ली में मिलना संभव नहीं. समय ही नहीं रहता. तुम्‍हारे शहर आया तो मिलूंगा.'

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इस तरह वह बचपन, कॉलेज के मित्र से बिना मिले चले गए. उदासी का रंग लिए बिना, क्‍योंकि उनके मित्रों की सूची लंबी है, उनकी जरूरत कम और अपेक्षा न्‍यूनतम हैं.

प्रश्‍न उनके मिलने, न मिल पाने का नहीं है. बल्कि केवल इस बात का है, कि हम जो चाहते हैं, कह नहीं पाते और जो कहते हैं, उसे चाहते नहीं. हममें से अधिकांश लोग अपने मित्रों से इसलिए दूर नहीं हैं, क्‍योंकि वह मिलते नहीं, बल्कि इसलिए दूर हैं, क्‍योंकि वह मिलने को महत्‍व नहीं देते.

'मिलना' तनाव के विरुद्ध सबसे उपयोगी थेरेपी है. यह रिश्‍ते का ऑक्‍सीजन है. मिलने से आपको पढ़ा जा सकता है. आप दूसरे को 'पढ़' सकते हैं. इसलिए मिलना मत टालिए. यह मनुष्‍यता बचाने की पहल है. 

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हम मिलने के अर्थ को ही खो बैठे हैं. सोचते हैं किसी तरह मिलना टल जाए. मिलते उससे हैं, जिससे 'काम' बनता है. इस तरह काम तो बनते रहते हैं, लेकिन बने हुए दोस्‍त बिखरते जाते हैं. उनके साथ संवेदना के तार जो कभी अटूट लगते थे, अब जुड़ ही नहीं पाते. संबंधों में एक बार मोच आ जाए तो उसका दोबारा ठीक से चलना अंसभव नहीं, लेकिन बहुत मुश्किल है.

मोबाइल, वीडियो चैट आने के बाद मिलना इसलिए भी मुश्किल हुआ, क्‍योंकि हम हर मुलाकात से कुछ हासिल करना चाहते हैं. मिलने के लिए नहीं मिलते. सुख के लिए नहीं मिलते. हां, सुख खरीदने की चाह में मिलते हैं. व्‍यापारियों की तरह मिलते हैं. यात्रियों की तरह, मित्रों की तरह नहीं मिलते. इससे मिलने का सुख हमसे दूर होता जा रहा है.

इसलिए, बार-बार दिल, दिमाग को समझाइए कि घर, परिवार, मित्र, स्‍नेही से जितना मिल सकते हैं, मिलिए. घर के दरवाजे हवा के साथ दूसरों से मिलने के लिए भी खोलिए.

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मिलने को महत्‍व न देना आपकी व्‍यस्‍तता को नहीं, बल्कि उलझन को बताता है. तनिक व्‍यस्‍त लोगों के पास जाइए, उनके पास कभी समय नहीं होता. समय केवल उनके पास कम होता है, जो उसे मनुष्‍य, मनुष्‍यता और अध्‍ययन, चिंतन के अलावा कहीं और खर्च करते हैं. इसलिए अगर कोई निरंतर यह कहता है कि उसके पास समय नहीं, तो इस बात को गंभीरता से समझना चाहिए कि उसका समय जाता कहां है?

समय पर बड़ा लोकप्रिय किस्‍सा नेल्‍सन मंडेला का है. एक बार मंडेला साहब ने अपने मित्र को खूब बड़ा खत लिखा. उसकी अंतिम पंक्ति थी, 'समय कम था, इसलिए खत बड़ा हो गया.' मजेदार बात है, ना! समय कम था, इसलिए खत बड़ा हो गया, क्‍योंकि छोटी, संक्षिप्‍त बात कहने के लिए अधिक सोच-विचार की जरूरत होती है. जबकि खूब सारी बातें तो फटाफट कही जा सकती हैं.

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मंडेला, गांधी और आइंस्टीन जो दुनिया के सबसे रचनात्‍मक, चुनौतीपूर्ण काम कर रहे थे, उनके पास समय कभी नहीं था. हां, जीवन के प्रति, संबंधों के प्रति उनकी दृष्टि जरूर बेहद साफ थी, इसलिए उनके पास भरपूर समय था.

तो इस रविवार, किससे मिलने जा रहे हैं. किसे मिलने को बुला रहे हैं. कभी मत कहिए, समय मिले तो घर आना कभी! हमेशा समय के साथ बुलावा दीजिए! मिलिए और खुश रहिए.

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(लेखक ज़ी न्यूज़ में डिजिटल एडिटर हैं)

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