डियर जिंदगी : ‘मैं' ही सही हूं!

कठोर होना है तो अपने प्रति होइए. उदार होना है तो दूसरों के प्रति. सारी समस्‍या की जड़ इस सरल नियम का उल्‍टा होते जाना है.

डियर जिंदगी : ‘मैं' ही सही हूं!

वह युवा हैं. एक-दूसरे के प्रति उनमें अभी भी स्‍नेह, अनुराग बाकी है. उसके बाद भी दोनों का विवाह संकट में है. करियर के मोड़ में दोनों कुछ ऐसे मुड़े कि पहले शहर बदले, बाद में कब दिल बदल गए, पता ही नहीं चला. दूरियां कभी-कभी सहज मनमुटाव, मतभेद को भी मनभेद में बदल देती हैं. रिश्‍ते मतभेद से कम मनभेद से अधिक टूटते हैं. हमें इन्‍हें मनभेद की धूप से बचाने की कला सीखनी होगी.  
  
'डियर जिंदगी' को जोधपुर से सुरभि राजपूत ने लिखा, ‘ऐसा कौन है, जिसे सुख, आनंद, जीवन में रस नहीं चाहिए. हमारी आरजू तो यही होती है, लेकिन इन दिनों पति-पत्‍नी के संबंधों में जो दरार देखी जा रही है. वह समझ से परे है, हम अपनी ओर से कोशिश ही तो कर सकते हैं. उसके अलावा क्‍या! मुझे तो हमेशा से पता है कि मैं सही हूं, लेकिन जब ‘सामने’ वाला माने तब न!’ 

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यह तय करना कितना आसान है कि 'मैं ही सही' हूं! अक्‍सर हमें यही तो लगता है कि मैं सही हूं. मेरे साथ, मेरे सामने जो है, सारी गलती उसकी है. दूसरे की गलती सबसे अधिक नजर आने का स्‍वभाव आज का नहीं है. यह मनुष्‍य के आगे बढ़ते रहने के क्रम में विकसित होती गई बात है. 

कबीर ने कितनी सरलता से हमें समझा, ‘बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय, जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय .’ 

लेकिन हम कहां आसानी से चीजों को मानने वाले हैं. हम तो अपने सिवा सबको दोषी ठहराए घूम रहे हैं. जरा एक बार इसे आजमा कर देखिए. जिससे भी आपका विवाद है. चाहे वह परिवार, मित्रता या प्रोफेशनल जिंदगी की बात हो. 

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अक्‍सर यह होता है कि हम चीजों को सही संदर्भ में नहीं समझते. हम जो कहा जा रहा है, अगर केवल उसी पर ध्‍यान लगा दें तो आधी समस्‍या तो वहीं समाप्‍त हो जाती है. 
  
अब जहां तक हमेशा खुद के सही होने की बात है, तो यह समझना जरूरी हो गया है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि हम सबको अपने जैसा बनाने की कसम लिए बैठे हैं! ऐसा होने की संभावना इसलिए अधिक रहती है क्‍योंकि हम मूलत: एक सामंती, परंपरावादी समाज हैं. हमारे यहां हर चीज पहले एक पैटर्न में थी. उसमें बदलाव इधर कुछ बरसों में आना शुरू हुआ है लेकिन उस बदलाव के साथ हम तालमेल नहीं बैठा सके हैं. 

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अब आइए, सुरभि के सवाल पर. जैसा उन्होंने बताया कि वह अक्‍सर सही होती हैं, लेकिन ‘सामने’ वाला इस बात को स्‍वीकार करना नहीं चाहता. एक मिनट के लिए मान भी लिया जाए कि सुरभ‍ि अक्‍सर सही होती हैं, तो इसके मायने यह तो नहीं कि हर व्‍यवहार, चीज उनके अनुसार हो. क्‍योंकि जैसे ही हम हर चीज में यह आग्रह जोड़ते हैं कि इसमें ‘यह’ होना चाहिए, तो असल में हम सहिष्‍णुता, उदारता और बुद्धि‍ के सरल प्रवाह को रोकने की कोशिश कर रहे होते हैं. 
  
हमें इस बात को समझना होगा कि इस दुनिया में हमारी यात्रा केवल कुछ बरस पुरानी है. यह ब्रह्मांड हमारे आने से बहुत पहले से है और आगे भी उसके रहने की उतनी ही संभावना है. हमें केवल यह समझने की जरूरत है कि इसमें हमारी भूमिका क्‍या है! 
  
एक उम्र के बाद हर किसी के व्‍यवहार में परिवर्तन संभव नहीं. हमारी उम्र बढ़ने का एक अर्थ यह भी है कि हमारा मन कोमलता से कठोरता की ओर सफर कर रहा है. क्‍योंकि उसके अनुभव बढ़ते जा रहे हैं. अनुभव बढ़ने का अर्थ है कि उसमें अच्‍छे और बुरे दोनों का एक मिश्रण होगा. 

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आपने महसूस किया होगा कि अक्‍सर अलग-अलग जगह से आए लोगों से दोस्‍ती तो मजे में चलती है, लेकिन जैसे ही दो अलग बैकग्राउंड, धर्म, आर्थिक आधर के लोग किसी रिश्‍ते में बंध जाते हैं तो उनके बीच तनाव बढ़ने लगता है. 
  
जो लोग इसे सजगता से संभाल लेते हैं. मतभेद को मनभेद बनने से रोक लेते हैं, उनका जीवन ऐसे तूफान में उलझने से बच जाता है, जहां बड़े-बड़े नावों के उलटने का भय बना रहा है.   
  
इसलिए, अगर कठोर होना है तो अपने प्रति होइए. उदार होना है तो दूसरों के प्रति. सारी समस्‍या की जड़ इस सरल नियम का उल्‍टा होते जाना है...

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