वैश्विक महामंदी की आहट

साल 2008 की वैश्विक मंदी की सटीक भविष्‍यवाणी करने वाले अर्थशास्‍त्री और भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने दुनिया को चेतावनी दी है कि वैश्‍विक अर्थव्‍यवस्‍था के सामने 1930 जैसी महामंदी का खतरा पैदा हो सकता है। ऐसे में दुनि‍या भर के केंद्रीय बैंकों को ‘इकोनॉमी के नए नि‍यम’ परि‍भाषि‍त करने की जरूरत है। राजन ने पूंजी प्रवाह पर विभिन्न देशों के साथ मिलकर काम करने की जरूरत पर भी जोर दिया है।

मालूम हो कि साल 2008-09 में जिस वैश्विक मंदी से दुनिया को दो चार होना पड़ा था, उसको लेकर रघुराम राजन ने सालों पहले ही घोषणा कर दी थी। तब राजन को चौतरफा आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था। अमेरिकन फेडरेल बैंक के चीफ ने तो रघुराम राजन को पिछड़ी सोच का आदमी तक बता दिया था और कहा था कि दुनिया की अर्थव्यवस्था ऐतिहासिक दौर से गुजर रही है। बाद में राजन की भविष्यवाणी सच साबित हुई। ऐसे में राजन की इस ताजा चिंता को हल्के में लेना देश और दुनिया के लिए नादानी होगी।

लंदन बिजनेस स्कूल (एलबीएस) में एक समिट को संबोधित करते हुए राजन ने कहा, 'मुझे इस बात की चिंता है कि हम धीरे-धीरे उसी स्थिति में पहुंच रहे हैं जिसमें 1930 के संकट के दौरान थे। मेरा ऐसा मानना है कि यह दुनिया के लिए एक परेशानी का विषय है। यह केवल औद्योगिक देशों या उभरते बाजार के लिए ही केवल परेशानी नहीं है। भारत में ब्याज दरों में कटौती पर राजन ने कहा, 'जहां तक संभव था मैंने कीमत कटौती का दरवाजा बंद रखने का प्रयास किया था। भारत में हम अभी भी उस हालात में हैं जहां हमें निवेश को बढ़ावा देना है और मैं उसके लिए चिंतित हूं।'

दरअसल, यूरोप अपने कर्ज संकट में फंसा है। दिवालिया होते देशों को संभालने में उसकी सांस फूल रही है। वृद्धि दर भी खास नहीं दिख रही। अगर कोई देश डिफॉल्ट होता है तो ताश का महल पूरी तरह से बिखर जाएगा। उभरते देश (भारत, ब्राजील, रूस और चीन) भी इससे बचे नहीं रह सकते। अमेरिकी मंदी सबसे ज्यादा चीन को सताती है, क्योंकि वह अमेरिका का सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है। भारत में महंगाई और ब्याज दरों ने पहले ही अर्थव्ववस्था का गला दबा रखा है। मांग कमजोर पड़ रही है, बाजार सुस्त है और लोगों का भरोसा हिल सा गया है। ऐसे में अगर मंदी का नया दौर आता है, तो हो सकता है यह उतना तीखा न हो, लेकिन यह पिछली बार से लंबा जरूर खिंच सकता है।

अब बड़ा सवाल यह कि क्या भारत आने वाली मंदी से निपटने में सक्षम है? कैसे बचेगा भारत? अमेरिका और यूरोप में मंदी का सीधा असर तेल, धातु और दूसरी जिंसों पर पड़ना तय है। अगर ये चीजें सस्ती होती हैं, तो भारत में भी लागत घटेगी। महंगाई का चढ़ना रुक जाएगा और रिजर्व बैंक ब्याज दरों में कमी कर सकेगा। इससे डिमांड पैदा होगी। 

भारत सरकार के पास इस बार पैसा नहीं है, सो सामाजिक योजनाओं में पैसे लुटाकर वह लोगों को खरीदार नहीं बना सकती। उसे नई स्कीमें शुरू करने से परहेज करना होगा। यह वक्त आर्थिक सुधार के बड़े फैसले लेने का है जैसे इंश्योरेंस, बैंकिंग और रिटेल में खुलापन। यही वक्त इन्फ्रास्ट्रक्चर पर फोकस करने का भी है। हाइवे के अलावा फ्रेट कॉरिडोर जैसी योजनाओं को फौरन आगे बढ़ाया जाना चाहिए। हालांकि इन मोर्चों पर मोदी सरकार काम करती दिख रही है।

हां! एक संकट भारतीय बैंकों के समक्ष जरूर है। कर्ज की अदायगी न करने वाले लोगों के बोझ से दबे पड़े भारतीय बैंकों को अब जब्त सम्पत्तियों के खरीददार नहीं मिल रहे हैं। ये सम्पत्तियां बैंकों ने उन डिफाल्टरों से जब्त की हैं जो बैंक के कर्ज को चुकता नहीं कर सके। बैंकों ने नीलामी के जरिए इन सम्पत्तियों को बेचने के प्रयास भी किए लेकिन मंदी की आहट के चलते खरीददार नहीं मिल रहे हैं। जानकार इसकी एक वजह यह भी बता रहे हैं कि इन दिनों भूमि अधिग्रहण का मुद्दा जोर-शोर से छाया हुआ है। खरीददारों के मन में इस बात का डर है कि वे जमीन खरीद तो लें, लेकिन कहीं वह अधिग्रहण के दायरे में न आ जाए। आंकड़ों पर भरोसा करें तो बैंकों का आउट स्टैण्डिंग लोन तीन लाख करोड़ तक पहुंच गया है जिसकी वसूली नहीं हो पा रही है। 

क्यों आती है मंदी?
मंदी आने का मुख्य कारण सकल घरेलू उत्पाद का कम होना है। लेकिन वैश्विक हो चुकी अर्थव्यवस्था में मंदी कई अन्य कारणों पर भी निर्भर करती है। विशेषज्ञ ऐसा मानते हैं कि जब उपभोक्ता अपने खर्च में कमी कर देते हैं तो मंदी आती है। जब लोगो का अर्थव्यवस्था में भरोसा कम होने लगता है तो लोग खराब समय के लिए पैसा बचाकर रखने लग जाते हैं। लोग पैसा कम खर्च करने लगते हैं। जाहिर है इससे मांग कम हो जाती है और इसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ता है। मांग कम होने से कम्पनियां अपना उत्पादन कम करना शुरू कर देती हैं। उत्पादन कम होने से नौकरियों में भी कटौती होने लगती है। जाहिर है इससे बेरोज़गारी फैलनी शुरू हो जाती है तथा लोगों के खर्च करने की क्षमता कम हो जाती है। और इस तरह से देश की अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट मे आ जाती है।

इसके उलट अर्थव्यवस्था के अच्छे दिन की बात करें तो यह सर्वविदित तथ्य है कि मांग कम होने से कम्पनियों का उत्पादन घट जाता है, जिससे उन्हें लाभ नहीं होता। लाभ बढ़ाने के लिए कम्पनियां कीमत बढ़ा देती हैं और इस तरह से तेजी की शुरूआत होती है। लाभ बढ़ाने के लिए कम्पनियां उत्पादन बढ़ा देती है। उत्पादन बढ़ाने के लिए कम्पनियों को अधिक लोगों की जरूरत होती है, इसके लिए कम्पनियां अधिक लोगों को नौकरियों में रखती है तथा लोगों का वेतन भी बढ़ा देती है। इस तरह लोगों को नौकरियां मिलने तथा वेतन में वृद्धि के कारण लोग खर्च अधिक करना शुरू कर देते हैं। इस तरह से देश की जीडीपी बढ़ती जाती है और देश की अर्थव्यवस्था अच्छे दिन लौट में आते हैं। 

कैसे निपटें मंदी से?
जब मंदी आती है तो अपने साथ बहुत सारी मुश्किलें लेकर आती है। बेरोजगारी या वेतन में कटौती जैसी बातें मंदी के वक्त आम हो जाती हैं। लेकिन, अगर आप सही रणनीति बनाकर चलें तो इन मुश्किलों से आसानी से निपट सकते हैं। बस जरूरत है सही बजट बनाने की, क्योंकि आपका बजट देता है आपके खर्चों और बचत को सही दिशा। बजट बना लेने से आमदनी और खर्चों में तालमेल बिठाना और बचत करना आसान हो जाता है। 

खर्चों का हिसाब लगाकर हम आसानी से अपने खर्चों में कटौती कर सकते हैं। खर्चे काबू में रहेंगे तो वित्तीय लक्ष्यों के लिए बचत हो सकती है और जब मंदी में आमदनी नहीं बढ़ती तब खर्च घटाने में भी मदद मिलेगी। खर्च तय करते वक्त अपने आमदनी का हिसाब जरूर रखना चाहिए। हर महीने की बचत खर्च से पहले अलग कर लें तो उचित होगा। नियमित आय को डिविडेंड और बोनस जैसी अनियमित आय से अलग रखना चाहिए। बजट बनाने के बाद यह देखना जरूरी होगा कि कहां-कहां कटौती की जा सकती है।