DNA ANALYSIS: 'काल' से बचने के लिए महाकाल की शरण में पहुंचा विकास दुबे?

एक भगौड़ा अपराधी, जिसके पीछे पूरे प्रदेश की पुलिस लगी हो, वो महाकाल मंदिर क्यों गया भला? 

DNA ANALYSIS: 'काल' से बचने के लिए महाकाल की शरण में पहुंचा विकास दुबे?
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नई दिल्ली: आठ पुलिसवालों का कातिल विकास दुबे आखिर पकड़ा गया. हम पकड़ा गया इसलिए कह रहे हैं क्योंकि पुलिस भले ही इसे गिरफ्तारी बता रही हो लेकिन जिस तरह से पूरा घटनाक्रम हुआ, वो एक ऐसे सुनियोजित सरेंडर की तरह लगता है जिसकी पटकथा खुद विकास दुबे ने लिखी हो.

पहली वजह तो यही है कि यूपी पुलिस की भारी-भरकम फोर्स जो नहीं कर पाई, वो महाकाल मंदिर के एक सिक्योरिटी गार्ड ने कर दिखाया. जिसने ना सिर्फ विकास दुबे को पहचाना बल्कि अपने साथियों के साथ मिलकर उससे इतनी सख्ती से पूछताछ भी की कि विकास दुबे ने मान लिया कि हां वो ही विकास दुबे है. कानपुर वाला.

अब बताइए, एक भगौड़ा अपराधी, जिसके पीछे पूरे प्रदेश की पुलिस लगी हो, वो महाकाल मंदिर क्यों गया भला? माना कि बुरे वक्त में भगवान याद आ ही जाते हैं. लेकिन एक बात समझ में नहीं आती कि जो विकास दुबे तीस वर्षों से यूपी पुलिस के काबू में नहीं आया, उस विकास दुबे को महाकाल मंदिर के सिक्योरिटी गार्ड्स ने अपने कब्जे में भी ले लिया, उसे दो घंटे तक बिठाए भी रखा, उससे पूछताछ भी कर ली और पुलिस के हवाले भी कर दिया.

एनकाउंटर से बचने पहुंचा उज्जैन? 
कहीं ऐसा तो नहीं है कि विकास दुबे, एनकाउंटर से बचने के लिए ही उज्जैन पहुंचा था. अब वो कितना पढ़ा लिखा है ये तो पता नहीं, लेकिन उसमें इतना दिमाग तो होगा ही कि महाकाल मंदिर में पुलिस उसका काल नहीं बन पाएगी. आम-तौर पर अपराधी पुलिस से बचने के लिए अपनी पहचान छिपाते हैं, हुलिया बदल लेते हैं लेकिन विकास दुबे तो मंदिर परिसर में ऐसे घूमता रहा मानो गिरफ्तार होने ही आया हो.

मध्य प्रदेश पुलिस को तो तब भी यकीन नहीं हुआ जब विकास दुबे ने खुद चिल्लाकर अपनी पहचान बताई. वरना क्या मजाल कि आठ पुलिसवालों के कातिल गैंगस्टर पर कोई पुलिसवाला हाथ उठा दे.

विकास दुबे खैर मना रहा होगा कि चलो, उसका एनकाउंटर नहीं हुआ. कुल मिलाकर विकास दुबे भले ही गिरफ्तार हो गया हो लेकिन यूपी पुलिस के हाथ, निराशा ही लगी है और मध्य प्रदेश पुलिस के लिए ये बैठे बिठाए लॉटरी लग जाने जैसा है.

फिल्मी है विकास के गिरफ्तारी की कहानी?
ये कहानी पूरी तरह से फिल्मी लगती है और हो सकता है कि आने वाले समय में इस कहानी पर कोई फिल्म भी बन जाए. लेकिन एक फिल्मी गैंगस्टर और एक असली गैंगस्टर में क्या फर्क होता है ये आज हम आपको बताएंगे.

फिल्मों के जरिए गैंगस्टर शब्द को बहुत गलैमराइज किया गया है. फिल्मों में गैंगस्टर को बहुत ताकतवर और आकर्षक दिखाया जाता है. लेकिन असल जिंदगी के गैंगस्टर विकास दुबे की तरह कायर और डरपोक होते हैं जो या तो भागते रहते हैं या छिपते रहते हैं. लेकिन फिर भी ऐसे अपराधियों की कहानी पर बड़ी-बड़ी फिल्में बनती हैं और उनकी छवि में ग्लैमर भर दिया जाता है. जबकि असल में गैंगस्टर विकास दुबे की तरह होते हैं. जो समय आने पर एक गार्ड के हत्थे चढ़ जाते हैं.

लेकिन अपराध और अपराधियों को ग्लैमराइज करने का नतीजा ये होता है कि जब छोटे-मोटे अपराधी, अपराध की दुनिया में कदम रखते हैं तो वो सब एक ना एक दिन गैंगस्टर या कुख्यात अपराधी बनना चाहते हैं क्योंकि अपराध की दुनिया में गैंगस्टर को सबसे बड़ी पदवी माना जाता है. लेकिन सवाल ये उठता है कि विकास दुबे की हालत और कद काठी देखकर भला कोई कैसे डर सकता है. जबकि सच तो ये है कि अगर ये आदमी आपको कहीं आते-जाते मिल जाए तो शायद आप इसे गंभीरता से भी नहीं लेगे. लेकिन दुख की बात ये है कि ऐसे अपराधियों के सामने हमारा सिस्टम पहले दिन से ही सरेंडर कर देता है.

विकास दुबे ने बिना किसी गोलीबारी के, बिना कोई विरोध किए. खुद को पुलिस के हवाले कर दिया. उसने ये सब एक सार्वजनिक स्थान पर किया. विकास दुबे का जिंदा पकड़ा जाना उन लोगों के लिए एक झटका है जिनके बारे में विकास बहुत कुछ जानता है. विकास जिनका राजदार है. वो लोग दुआ कर रहे होंगे कि विकास दुबे को पुलिस एनकाउंटर में मार देती. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. इसलिए अब आपको ये समझना चाहिए कि विकास दुबे का मंदिर से गिरफ्तार होना पुलिस की जीत है या फिर विकास दुबे की.

पहली बात ये है कि विकास दुबे के सीने में बड़े-बड़े और ताकतवर लोगों से जुड़े राज दफ्न हैं. इसलिए बहुत सारे लोग उम्मीद कर रहे थे कि पुलिस उसे एनकाउंटर में मार गिराएगी.

दूसरी बात ये है कि विकास दुबे चाहता था कि वो किसी सार्वजनिक जगह पर जनता के बीच सरेंडर करे इसलिए शायद उसने महाकाल मंदिर में जाकर बार-बार अपनी पहचान उजागर की. ताकि लोग उसे पहचान लें.

तीसरी बात ये है कि एक सार्वजनिक स्थान में पुलिस के लिए भी किसी अपराधी का एनकाउंटर करना मुश्किल होता है और विकास दुबे से ये बात अच्छी तरह जानता था. इसीलिए उसने पकड़े जाने पर कैमरों के सामने चिल्लाकर कहा कि वो कानपुर वाला विकास दुबे है. वो अपनी पहचान जानबूझकर उजागर करना चाहता था ताकि उसके एनकाउंटर के चांस खत्म हो जाएं.

लेकिन जिस दौरान विकास दुबे चिल्ला कर अपना नाम और अपनी पहचान बता रहा था. उस समय एक पुलिस वाला विकास दुबे के सिर पर जोर से थप्पड़ मारता है. और इसके बाद विकास दुबे एकदम शांत हो जाता है.

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अपराधियों का सपना 
अमेरिका के मशहूर मुक्केबाज माइक टाइसन ने एक बार कहा था- तब तक हर छोटा-मोटा अपराधी खुद को एक गैंगस्टर मानता है जब तक उसे जोर से मार नहीं पड़ती. हर अपराधी जब अपना करियर शुरू करता है तो वो यही सपना देखता है कि एक दिन वो बहुत बड़ा गैंगस्टर या कुख्यात अपराधी बन जाएगा और लोगों में उसका खौफ होगा. लेकिन असल में आम लोग ऐसे अपराधियों को देखकर हंसते हैं. कहा जा रहा है कि विकास दुबे को जिन पुलिस वालों ने पकड़ा वो महाकाल मंदिर के बाहर पुलिस की उस क्विक रिस्पॉन्स टीम का हिस्सा थे जो जेबतकरों और चोरों को पकड़ती है. विकास दुबे ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि बड़े-बड़े पुलिस अधिकारियों को चकमा देने के बाद उसे एक दिन किसी छोटे-मोटे जेब कतरे की तरह पकड़ लिया जाएगा.

हो सकता है कि आज विकास दुबे के सिर से गैंगस्टर होने का भूत उतर गया हो. लेकिन सवाल ये है कि उन लोगों पर कानून की मार कब पड़ेगी जिन्होंने विकास दुबे को 30 वर्षों तक संरक्षण दिया और इतने वर्षों तक उसे पुलिस के हाथ नहीं आने दिया. इन लोगों के गुनाहों का हिसाब कब होगा?

कहते हैं कर्म का अपना कोई मेनू नहीं होता. आपकी जीवन की थाली में वही परोसा जाता है जिसके आप लायक होते हैं. विकास दुबे ने वर्षों तक नेताओं और पुलिस वालों को अपने इशारों पर नचाया. लेकिन अब उसके कर्म उसका पीछा कर रहे हैं और उसने 30 वर्षों तक जो बोया उसे काटने का समय आ गया है. और शायद यही वजह है कि ईश्वर की शरण में जाकर भी वो खुद को बचा नहीं पाया.

लेकिन कानपुर से फरीदाबाद और फरीदाबाद से उज्जैन तक का सफर उसने एक शातिर अपराधी की तरह तय किया. कहा जा रहा है कि इस दौरान उसके पास कोई मोबाइल फोन नहीं था. ऐसा उसने इसिलए किया ताकि पुलिस उसे ट्रेस ना कर पाए. उसके घर वालों को भी उसकी गिरफ्तारी की खबर टीवी पर न्यूज देखकर ही मिली. यानी विकास दुबे अपने पीछे अपना कोई डिजिटल फुटप्रिंट नहीं छोड़ना चाहता था. वो कहीं ना कहीं जानता था कि टेक्नोलॉजी उसे एक दिन पुलिस की गिरफ्त में पहुंचा देगी और मजे की बात ये है कि 2020 के इस साल में जब सर्विलांस को सबसे बड़ी कुंजी माना जाता है ये कहा जाता है कि हर एक व्यक्ति की जानकारी संबंधित संस्थाओं को है. ऐसे में पुलिस द्वारा एक अपराधी को ना पकड़ पाना, पुलिस के काम करने के तरीके पर भी सवाल खड़े करता है.

खुद को रॉबिन हुड समझते हैं अपराधी
कुख्यात अपराधियों की एक बुरी आदत होती है और वो ये कि उन्हें पुलिस से तो डर लगता है लेकिन आम लोगों को वो अपने लिए कोई खतरा नहीं मानते. ये अपराधी मानकर चलते हैं कि आम लोगों के बीच इनकी छवि रॉबिन हुड वाली है और इन्हें कोई कुछ नुकसान नहीं पहुंचाएगा. लेकिन पब्लिक सब जानती है और वो इन अपराधियों से कुछ समय के लिए डर तो जाती है लेकिन इनके बहकावे में नहीं आती.

उदाहरण के लिए कोलंबिया का ड्रग माफिया पाब्लो एस्कोबार भी खुद को लोगों के बीच रॉबिन हुड मानता था. जब उसका साम्राज्य अपने चरम पर था तो उसके संगठन की रोज की कमाई 500 करोड़ रुपये से आप पास थी. लेकिन एक दिन वो उसी जनता के बीच पुलिस की गोली का शिकार हो गया. जिनके बीच वो खुद को रॉबिन हुड साबित करता था. 

इसी तरह मैक्सिको का ड्रग माफिया एल चापो गुजमैन भी लोगों के बीच ऐसी ही छवि रखता था. एक समय में उसकी रोज की कमाई 20 करोड़ रुपये से ज्यादा थी. लेकिन वर्ष 2016 में आम लोगों की सूचना पर ही एक दिन उसे गिरफ्तार कर लिया गया और आज वो अमेरिका की जेल में अपने गुनाहों की सजा भुगत रहा है. इसलिए अपराधी कोई भी हो एक ना एक दिन उसका और उसके अपराधों का अंत जरूर होता है. बुरे कर्म ऐसे कारागार यानी जेल की तरह होते हैं. जिसकी सजा हर किसी को एक ना एक दिन जरूर भुगतनी पड़ती है.

गैंगस्टर बनने का सपना
जब गैंगस्टर बनने के सपने के साथ कोई अपराधी अपराध की दुनिया में कदम रखता है. सिस्टम में बैठे लोग ऐसे अपराधियों के सपनों को साकार करते हैं, उन्हें बाहुबली बना देते हैं और फिर उनसे पूरा काम लेते हैं. इसलिए आज हम आपको बताएंगे कि 30 वर्षों तक विकास दुबे किसी को नजर ही नहीं आया या फिर सिस्टम विकास दुबे को देखकर बार-बार अपनी आंखे बंद कर लेता था? 

8 पुलिसकर्मियों की हत्या करने के बाद, शान के साथ अपना नाम बताने वाले इस अपराधी को कोई डर नहीं. इसे यकीन होगा कि करीब 30 वर्षों के आपराधिक इतिहास में नेताओं और सिस्टम के जिस आशीर्वाद से ये अब तक बचा रहा, वो आगे भी इसे बचाते रहेंगे.

विकास दुबे की 'आपराधिक जन्म कुंडली'
विकास दुबे ने 1992 में पहली हत्या की थी, इसके बाद डर फैलाकर, उसने अपने इलाके में पकड़ बनाई. इससे वो नेताओं की नजर में आ गया. क्योंकि वोट के लिए नेता, अपराधियों को भी संरक्षण देने से नहीं हिचकते, और यही विकास दुबे के साथ भी हुआ.

विकास दुबे 1996 में तत्कालीन बीएसपी नेता हरिकिशन श्रीवास्तव के संपर्क में आया. तब विधानसभा चुनाव में हरिकिशन श्रीवास्तव की विकास दुबे ने बहुत मदद की और वो चुनाव जीत गए थे. तब से विकास दुबे हरिकिशन श्रीवास्तव का दाहिना हाथ बन गया था. इस चुनाव के दौरान विकास दुबे का विवाद बीजेपी के नेता संतोष शुक्ला से हुआ था.

2001 में शिवली थाने में घुसकर विकास दुबे ने तत्कालीन दर्जा प्राप्त राज्य मंत्री संतोष शुक्ला की बेरहमी से हत्या कर दी थी, उस वक्त उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सरकार थी. लेकिन उस वक्त भी उत्तर प्रदेश पुलिस विकास दुबे को गिरफ्तार कर नहीं पाई थी. 6 महीने बाद विकास दुबे ने कोर्ट में सरेंडर किया था.

विकास दुबे का डर ऐसा था कि 30 पुलिसकर्मियों के बीच थाने के अंदर मंत्री की हत्या करने के बाद भी उसके खिलाफ किसी ने गवाही देने की हिम्मत नहीं दिखाई. यहीं से विकास दुबे का अपराध और राजनीति दोनों में कद बढ़ता चला गया.

नेताओं के लिए काम करता था विकास दुबे
नेताओं के लिए काम करना, ठेकों में कमीशन लेना, किसी की जमीन पर कब्जा कर लेना, व्यापारियों से अवैध वसूली करना, इस तरह से विकास दुबे, उत्तर प्रदेश के कई नेताओं का चहेता बन गया.

कानपुर की बिठूर, कल्याणपुर, बिल्हौर जैसी विधानसभा में विकास दुबे का रसूख बढ़ता चला गया और ये ब्राह्मण राजनीति को आगे बढ़ाने लगा. पिछले 20 सालों से कानपुर के घिमाऊ जिला पंचायत क्षेत्र से इसके परिवार से कोई ना कोई जिला पंचायत सदस्य रहा है.

विकास दुबे खुद भी जिला पंचायत सदस्य रह चुका है, मौजूदा समय में विकास दुबे की पत्नी ऋचा दुबे जिला पंचायत की सदस्य है. ऋचा दुबे के बारे में बताया गया कि उसने 2015 में समाजवादी पार्टी की सदस्यता ली थी. विकास दुबे की मां ने बताया कि वो समाजवादी पार्टी में था.

हालांकि विकास दुबे अपनी सुविधा के हिसाब से अपना नेता और अपनी पार्टी बदलता रहा है. उसका संपर्क उत्तर प्रदेश के करीब-करीब सभी राजनैतिक दलों के नेताओं से रहा, खासतौर पर कानपुर और आसपास के इलाकों में, उसकी पहचान करीब-करीब हर पार्टी के नेता से रही है.

कहा जाता है कि 2017 में STF की पूछताछ में विकास दूबे ने बीजेपी विधायक अभिजीत सांगा और भगवती सागर को अपना करीबी बताया. विकास दूबे ने दावा किया था कि ये नेता उसकी मदद करते हैं. हालांकि बीजेपी के नेताओं ने इस आरोप का खंडन किया था.

राजनीति से विकास दुबे का पुराना नाता
बीएसपी के स्थानीय नेताओं से विकास दुबे का पुराना और अच्छा संपर्क रहा है. जब 2007 से 2012 तक मायावती की सरकार थी, तो विकास दुबे का प्रभाव और बढ़ गया था. तब इसने कीमती जमीनों पर जमकर अवैध कब्जा किया और करीब 200 करोड़ रुपये की अवैध संपत्ति बना ली.

उत्तर प्रदेश के कई नेताओं और कई पुलिस अधिकारियों के साथ विकास दुबे या फिर उसके सहयोगियों की तस्वीरें भी वायरल हुई हैं. हालांकि अब हर पार्टी और उसके नेता, विकास दुबे से पल्ला झाड़ रहे हैं और एक दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं.

विकास दुबे की गिरफ्तारी पर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा है कि विकास दुबे के मोबाइल कॉल्स की डिटेल्स सार्वजनिक की जाएं, जिससे सच्ची मिलीभगत का पता चल सके. बीएसपी की अध्यक्ष मायावती ने कहा कि विकास दुबे के राजनैतिक संरक्षकों को को भी सजा मिले.

आज भले ही उत्तर प्रदेश की राजनीति, विकास दुबे के अपराधों से किनारा कर रही है, लेकिन कड़वा सच यही है कि राजनीतिक दल ऐसे अपराधियों की वोट बैंक वाली शक्ति के आगे सरेंडर हो जाते थे और इसके अपराध के आरोपों को छिपा देते थे.