सादुलशहर: 15 साल के बेटे को चलता देखने के लिए दर-दर की ठोकरें खा रही मां, प्रशासन बना अंजान

15 वर्षीय गुरप्रीत जन्म से अपाहिज नहीं था. करीब 5 साल पहले इस किशोर को बीमारी ने जकड़ लिया, जिसकी वजह से गुरप्रीत के शरीर के अंगों ने काम करना छोड़ दिया और हाथ और पैर मुड़ गए. तब से वह चारपाई पर बैठा है.

सादुलशहर: 15 साल के बेटे को चलता देखने के लिए दर-दर की ठोकरें खा रही मां, प्रशासन बना अंजान
सादुलशहर पंचायत समिति के गांव दूदा खीचड़ का 15 वर्षीय गुरप्रीत जन्म से अपाहिज नहीं था.

कुलदीप गोयल, सादुलशहर: ऐ मौत कब से राह तेरी तक रहा हूं मैं… आ ज़िंदगी के पांव से कांटा निकाल दे... किसी शायर ने ये शेर शायद ऐसे ही लोगों के लिए लिखा या कहा होगा, जो जीवन के खेल में खुद को बेबस देखते हैं. इन्हें सरकार ने कागजों में दिव्यांग का दर्ज़ा देकर अपनी ज़िम्मेदारी निभा दी है लेकिन इन दिव्यांगों की उनके दर जाकर कभी सुध नही ली.

कागज़ी दिव्यांगों को दो वक़्त की रोटी मिल रही है या नहीं, इनके सर पर छत है कि नहीं, इन्हें मूलभूत सुविधाएं मिल रही हैं या नहीं... इसकी कभी सुध नहीं ली...? क्या कागजों में विकलांग को दिव्यांग बना देने से ऐसे लोगों को कोई लाभ मिल रहा है. यह दावे धरातल पर कितने सच साबित होते हैं, इस बात का अंदाजा गांव दूदा खिचड़ के 15 वर्षीय किशोर की लाचारी को देखकर लगाया जा सकता है, जो अपनी बीमारी के कारण पिछले 5 वर्षों से चारपाई पर बैठा है और सरकार से मूलभूत सुविधाएं और इलाज की आस अभी भी लगाए बैठा है.

सादुलशहर पंचायत समिति के गांव दूदा खीचड़ का 15 वर्षीय गुरप्रीत जन्म से अपाहिज नहीं था. करीब 5 साल पहले इस किशोर को बीमारी ने जकड़ लिया, जिसकी वजह से गुरप्रीत के शरीर के अंगों ने काम करना छोड़ दिया और हाथ और पैर मुड़ गए. तब से वह चारपाई पर बैठा है. गुरप्रीत की मां गीता देवी के अनुसार, कई जगह डॉक्टरों को दिखाया लेकिन सफतला नहीं मिली. परिवार की आर्थिक हालत काफी खराब है, जिससे अब इलाज के लिए जगह-जगह जाना भी मुमकिन नहीं है. अब गुरप्रीत पिछले 5 वर्षों से पीड़ित चारपाई पर पड़ा रहता है, जिसे नहाने और शौच के लिए भी उठाकर ले जाना पड़ता है, जिससे वह खुद भी बहुत ज्यादा परेशान है.

क्या है परिजनों का कहना
गुरप्रीत के पिता और मां का कहना है कि चुनावों के समय जनप्रतिनिधियो के बड़े-बड़े वायदे रहते हैं लेकिन चुनावों की बाद अनदेखी के चलते अब तक किसी सरकारी योजना का जरा लाभ भी नहीं मिल पाया है. उसका परिवार गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहा है. पिछले पांच वर्षों से गुरप्रीत की मां बेटे को मिलने वाली सुविधाओं के लिए दर-दर की ठोकरें खा रही है. दिव्यांगों की पेंशन के लिए कभी अधिकारी फिंगरप्रिंट नहीं आने का हवाला देते हैं तो कभी कहते हैं कि इनका नाम भामाशाह में नहीं जुड़ा. कर्मचारियों जनप्रतिनिधियों की उदासीनता के चलते इस दिव्यांग मिलने वाली सुविधाओं से वंचित है. चिकित्सा विभाग ने बेटे के दिव्यांग होने का प्रमाणपत्र तो जारी कर दिया लेकिन कोई सुविधा नहीं मिल रही.

सुविधाओं का पात्र है दिव्यांग
2 साल पहले सादुलशहर के पूर्व तहसीलदार मान सिंह प्रजापत ने रिपोर्ट दी जिसमे स्पष्ट लिखा है कि यह परिवार सुविधाओं का पात्र है. इनको लाभ दिया जावे लेकिन अधिकारी कर्मचारी इतने लापरवाह हो गए हैं कि मानवीयता को भी भूल बैठे हैं. गुरप्रीत कुमार के पिता राजेश ने बताया है कि उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत खराब है. उनके 4 बच्चे हैं, जो अभी छोटे हैं. अपने बेटे के इलाज पर उसने काफी रुपये खर्च कर दिए. वह दिन में दिहाड़ी मजदूरी करके अपने परिवार का पालन-पोषण मुश्किल से करता है जबकि पीड़ित की मां नरेगा में मजदूरी करने जाती है. इनको अभी भी अपने बेटे के इलाज के लिए स्थानीय जनप्रतिनिधियों और सरकार से आस है. वहीं इस पीड़ित परिवार का पता लगने पर क्षेत्र के समाजसेवी डॉ. राज मेहरा उनके घर पहुंचे और हर संभव मदद का भरोसा दिलाया.