उदयपुर शिल्प महोत्सव में खास स्थान मिलने के बाद भी बदहाल गाडिया लोहार, जाने क्यों

प्रदेश की लोक कला और संस्कृति देश में अपना अलग स्थान रखती है.

उदयपुर शिल्प महोत्सव में खास स्थान मिलने के बाद भी बदहाल गाडिया लोहार, जाने क्यों
हनुमान सिंह, गाडिया लोहार

अविनाश जगनावत, उदयपुर: प्रदेश की लोक कला और संस्कृति देश में अपना अलग स्थान रखती है. यहां की सांस्कृतिक परंपरा और लोक कला रिहासत काल से चली आ रही है जो सात समन्दर पार से आने वाले विदेशी पापणों को भी अपनी ओर आकर्षित करती है. इन्ही में से एक है गाडिया लोहार की कला. इस कला से जुड़े कई सदस्य इन दिनों उदयपुर शहर में आयोजित हो रहे लोक संस्कृति और कला के महाकुंभ में अपनी कला का हुनर दिखाने पहुंचे हैं.

लेकसिटी उदयपुर में पश्चिम क्षेत्र सांस्कृति केन्द्र की ओर से आयोजित हो रहा शिल्पग्राम महोत्सव इन दिनों यहां आने वाले देशी-विदेशी सैलानियों के लिए आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है. लोक कला और संस्कृति के इस महाकुंभ में वे देश के कई राज्यों की संस्कृति और कला से रूबरू हो रहे हैं. शिल्पग्राम महोत्सव में आए इन कलाकारों से सदियों पुरानी अपनी कला और संस्कृति को संजाए रखा और इस महोत्सव में वे उनका प्रदर्शन कर रहे हैं. 

लोक कला के इस महाकुंभ में एक ऐसा भी कलाकार है जो अपने बाप दादाओं के समय से चली आ रही लोहे की धातु से बनी वस्तुओं को बनाने की कला को जीवित रखे हुआ है. हनुमान सिंह और उसके परिवार के सदस्यों ने अपनी कला के जरिए लोहे में जान डालने की कला का हुनर रखते हैं, जिसमें मुख्य रूप से टिड्डी, मक्खी, कॉक्रोच, चींटी, कौवा और मगरमच्छ सहीत कई उत्पाद शामिल हैं. यही नहीं हनुमान ने देश की आजादी के समय अंग्रेजो के हाथ से बने उत्पादों को भी प्रदर्शित कर रखा है, जिनमें लोटा, घड़ा, गिलास, पानदान और हुक्का आदि प्रमुख हैं. 

हनुमान का परिवार अपने हाथों से लोहे को पिगलाकर विभिन्न आकृतियो में ढालता है, जिसमें पीतल और तांबें का मिश्रण होता है. अनुठी कला के धनी हनुमान और इसके परिवार के लोगों को करीब 150 पुरस्कार मिल चुके हैं, लेकिन परिवार के बच्चों को आगे बढ़ाना और उन्हें अच्छी शिक्षा देने के लिए काई विशेष आर्थिक मदद नहीं मिली है.

अुनठी कला का धन हनुमान के परिवार का यह हुनर देख कर शिल्पग्राम महोत्सव में आने वाले लोग भी अचंभीत रहते हैं. लोहे से बने सुक्ष्म जिवों को देखना उनके लिए किसी नए अनुभव से कम नहीं है. वहीं लोगों को उनकी ओर से बनाए गए ये उत्पाद काफी पसंद भी आ रहे हैं.

बहरहाल गाडोलिया लोहार की यह कला अपने आप में अनुठी है, लेकिन इस कला से जुड़े कलाकारों का आर्थिक पक्ष मजबूत नहीं होने से ये कला अब विलुप्त होने के कगार पर है. ऐसे में सरकारी तंत्र को चलाने वाले जिमेदार नुमाइंदो को चाहिए की वे इस लोककला और इससे जुड़े कलाकारों को ओर अधिक सरक्षण दे ताकि यह कला आने वाली कई पीढियों कायम रह सके.