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पहलू खान मामले में SIT रिपोर्ट का है इंतजार, प्रदेश की सियासत में मचा है भूचाल

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के निर्देशों के बाद इस प्रकरण की जांच के लिए गठित एसआईटी की रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है.

पहलू खान मामले में SIT रिपोर्ट का है इंतजार, प्रदेश की सियासत में मचा है भूचाल
मामले में बीजेपी अपने पुराने रुख पर कायम है. (प्रतीकात्मक फोटो)

जयपुर: प्रदेश की सियासत में भूचाल लाने वाले बहुचर्चित पहलू खान मॉब लिंचिंग मामले को लेकर एसआईटी रिपोर्ट का बेसब्री से इंतजार किया जा रहा है. माना जा रहा है कि इस मामले में एसआईटी रिपोर्ट ही तय करेगी कि आखिर पहलू खान केस की जांच में लापरवाही किस स्तर पर हुई है. 

राजस्थान के बहुचर्चित पहलू खान मॉब लिंचिंग मामले को लेकर प्रदेश में सियासत एक बार फिर से तेज हो गई है. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के निर्देशों के बाद इस प्रकरण की जांच के लिए गठित एसआईटी की रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है. एसआईटी को 15 दिनों में राज्य सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपनी है. वहीं, इस मुद्दे पर बीजेपी अपने पुराने रुख पर कायम है.

सीएम ने अपना सख्त रवैया
माना जा रहा है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इस मामले को लेकर बहुत सख्त रवैया अपनाया है. उन्होंने दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की बात कही है.

एडीजी बीएल सोनी के निर्देशन में एसआईटी गठित
बताया जा रहा है कि एडीजी बीएल सोनी के निर्देशन में काम कर रही एसआईटी यह पता लगाने में जुटी है. इस प्रकरण की जांच में महत्वपूर्ण तथ्यों को शामिल क्यों नहीं किया गया. इस दौरान जांच में यह भी पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है कि क्या इसके लिए राजनीति या प्रशासनिक दबाव था या फिर जांच करने वाले अधिकारियों ने ही जानबूझकर ऐसा किया.

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कई अधिकारियों की लापरवाही आई सामने 
सूत्रों के अनुसार, प्रारंभिक जांच में कई सक्षम स्तर के अधिकारियों की लापरवाही सामने आई है. माना जा रहा है कि जांच में शामिल कई अधिकारियों पर गाज गिर सकती है. 

इस बातों पर उठ रहा है सवाल
अपनी मौत से पहले पहलू खान ने साफ तौर पर 6 लोगों का नाम हमलावर के तौप पर पहचाना था. जिसमें ओम यादव, हुकुम चंद यादव, सुधीर यादव, जगमल यादव, नवीन शर्मा और राहुल सैनी की नाम शामिल है. लेकिन पुलिस की दर्ज एफआईआर में पुलिस ने इन 6 आरोपियों में से किसी का भी नाम नहीं डाला. 

बताया जा रहा है कि पुलिस ने अपनी 'जांच' के आधार पर ये भी कहा कि जिस वक़्त घटना हुई इनमें से कोई भी व्यक्ति क्राइम सीन पर मौजूद नहीं था. इसके अलावा एफआईआर दर्ज करने में 9 घंटों से अधिक का समय लगने पर भी सवाल खड़ा हो रहा है. जबकि घटना स्थल से पुलिस स्टेशन महज 2 किलोमीटर की दूरी पर था. 

मामले में आईपीसी को क्यों किया गया नजरअंदाज
घटना पर कार्रवाई करते हुए पुलिस ने गौ रक्षकों पर सेक्शन 147, 143, 323, 308, 379, 379 में धाराएं लगाई. अब यदि इन धाराओं पर गौर करें तो मिलता है कि ये बेहद ही हल्की धाराएं हैं. इसलिए अगर वाकई पुलिस इस मामले को लेकर गंभीर होती तो इसे 120-B (आपराधिक साजिश) बताया जाता. अगर मामले को लेकर जरा भी गंभीर होती तो केस 308 की जगह 307 में दर्ज हुआ होता. साथ ही पुलिस गौ रक्षकों पर सबूत नष्ट करने का भी अभियोग दर्ज करती. 

मेडिकल रिकॉर्ड में किसके इशारे पर किया गया हेर फेर
पहलू का पोस्ट मार्टम कम्युनिटी हेल्थ सेंटर बहरोर के तीन डॉक्टर्स की टीम ने किया था. जिन्होंने अपनी रिपोर्ट में इस बात का जिक्र किया था कि पहलू की मौत सदमे के कारण हुई थी और ये सदमा उन्हें उनकी चोटों के कारण लगा था. 

पुलिस ने इस बात को सिरे से खारिज करते हुए अपनी जांच में कैलाश हॉस्पिटल के डॉक्टर्स के शुरूआती बयानों को ही दिया. जिसके मद्देनजर मामले की विवेचना की गई. मामला पुलिस ने कितना पेचीदा बनाया इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि पुलिस ने ये तक कह दिया था कि पहलू की मौत का कारण दिल का दौरा पड़ना था. 

खंगाला जा रहा पत्राचार
उस समय के तत्कालीन थाना अधिकारी से लेकर एडीजी स्तर के अधिकारियों के बीच चली पत्रावली को भी खंगाला जा रहा है. साथ ही गृह विभाग से मिले निर्देशों की भी पड़ताल की जा रही है.

बीजेपी पुराने रुख पर कायम
इस पूरे मामले में बीजेपी अभी भी अपने पुराने रुख पर कायम है. बीजेपी का कहना है कि जब कोई दोषी ही नहीं था तो किसी को जबरन दोषी बनाना कहां तक ठीक है. बीजेपी का कहना है कि जो जांच हुई और कोर्ट ने जो फैसला दिया उसे सही माना जाना चाहिए. बीजेपी का कहना है कि कांग्रेस जबरन पहलू खान को अपना ब्रांड एंबेस्डर बना रही है. जबकि मॉब लिंचिंग के दूसरे मामले हरीश जाटव को लेकर सरकार गंभीर नहीं है.