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भीलवाड़ा में अंधविश्वास के नाम पर हो रहा मासूमों की जान से खिलवाड़, जानें पूरा मामला

बाल कल्याण समिति की अध्यक्ष डॉ. सुमन त्रिवेदी कहती है कि वर्श 2017 से अब तक मासूमों पर डाव लगाने के 13 मामले में सामने आए है, जिन पर पुलिस एफआईआर दर्ज करवाई गई है.

भीलवाड़ा में अंधविश्वास के नाम पर हो रहा मासूमों की जान से खिलवाड़, जानें पूरा मामला
पिछले 6 माह में एमजी हॉस्पिटल में गर्म सलाखों से दागने के आधा दर्जन से अधिक मामले सामने आ चुके हैं.

दिलशाद खान/भीलवाड़ा: विज्ञान के इस युग में आज भी अंधविश्वास के चलते कई मासूमों की जिंदगी से खिलवाड़ किया जा रहा है. पिछले कुछ सालों में भीलवाड़ा और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में इलाज के नाम पर मासूमों को दागने के मामले थमने का नाम नहीं ले रहे है. अंधविश्वास के नाम पर मासूमों की जिन्दगियों से खिलवाड़ अब एक गम्भीर समस्या बनता जा रहा है, लेकिन जिम्मेदार ना जाने क्यों अब तक खामोश हैं.
  
वहीं, इस मामले में बाल कल्याण समिति की अध्यक्ष डॉ. सुमन त्रिवेदी कहती है कि वर्श 2017 से अब तक मासूमों पर डाव लगाने के 13 मामले में सामने आए है, जिन पर पुलिस एफआईआर दर्ज करवाई गई है. हकीकत की अगर बात की जाए तो अमूमन यह आंकड़ा एक वर्श में 80 से 100 बच्चों का होता है. मामले हॉस्पिटल से पुलिस तक नहीं पहुंच पाते, जिसके कारण आंकड़ों में भले ही कमी हो सकती है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में अधंविश्वास की कमी नहीं है. 

बता दें कि, पिछले 6 माह में एमजी हॉस्पिटल में गर्म सलाखों से दागने के आधा दर्जन से अधिक मामले सामने आ चुके हैं. अंधविश्वास से ग्रस्त लोग ये नहीं समझ पाते कि बीमारी से ग्रस्त मासूम को दागना मासूम के लिए खतरनाक साबित हो सकता है. डॉ त्रिवेती ने बताया कि निमोनिया से ग्रस्त मासूम को दागना जानलेवा हो सकता है, ऐसे में मासूमों का उपचार नहीं करवा कर बच्चे को दागने से सेप्टीसिमिया और तार से दागने से टिटनेस जैसे जानलेवा संक्रमण का भी खतरा बढ़ जाता है. किशोर अधिनियम 15 के तहत बच्चों पर इस तरह की क्रूरता करने पर कार्रवाई का प्रावधान है. इसमें तीन साल की सजा और एक लाख के जुर्माने का प्रावधान है. इसी के तहत अब तक 13 मामलों में एफआईआर भी दर्ज करवाई गई है.

बता दें कि भीलवाड़ा में विगत कुछ सालो में सामने आये मामलों में कई बार मासूमों को गर्म सलाखों के अलावा सेविंग की ब्लैड़ से पेट पर 100 से ज्यादा जगहों पर ऐसा घाव दिया जाता है, जिसे एक व्यस्क व्यक्ति भी सहन नहीं कर सकता. अंधविश्वास से भ्रमित परिजन बच्चों को तड़पता छोड़ देते है, लेकिन अस्पताल लेजाकर ईलाज नहीं करवाते.

दरअसल, गांव-गांव में अफसर और कर्मचारियों के घूमने पर अब तक 617 मासूम ऐसे मिले हैं, जिन्हें सांस लेने में तकलीफ और बीमार होने की स्थिति में अंधविश्वास के फेर मे गर्म लोहे से दागकर इलाज किया गया है. महिला एवं बाल विकास विभाग ने गांव-गांव घूमकर ऐसे मासूमों को चिहिंत किया गया, जिन्हें दागा गया है. इसमें आंगनबाड़ी पहुंचने वाले मासूमों की भी स्क्रीनिंग की गई. जहां पर 617 मासूमों को चिहिंत किया गया है. बाल कल्याण समिति ने ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता को लेकर पैम्पलेंटों का भी वितरण किया, साथ ही डोर टू डोर सर्वे कर लोगों को जागृत करने का प्रयास किया है, लेकिन विगत दो माह में ही सामने आये 4 मामलों से साफ है कि इस अंधविश्वास को खत्म करने के लिए सरकार, सामाजिक संगठनों के साथ-साथ आमजन को उम्मीद से दुगनी मेहनत करने की आवश्यकता है.