ईमानदारी पर भारी पड़ी बेरोजगारी! जानिए सरकारी नौकरी के लालच में क्यों फंसा भारत
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ईमानदारी पर भारी पड़ी बेरोजगारी! जानिए सरकारी नौकरी के लालच में क्यों फंसा भारत

सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, भारत के सरकारी स्कूलों में पढ़ाने वाले करीब 14 प्रतिशत टीचर्स बच्चों को पढ़ाने के योग्य ही नहीं है. कुल मिलाकर अगर नकल करने वाले या अयोग्य टीचर्स बच्चों को पढ़ाएंगे तो देश कभी आगे नहीं बढ़ पाएगा.

ईमानदारी पर भारी पड़ी बेरोजगारी! जानिए सरकारी नौकरी के लालच में क्यों फंसा भारत

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नई दिल्ली: नकल और भ्रष्टाचार का वायरस इतना घातक है कि देखते ही देखते एक देश का नैतिक पतन शुरू हो जाता है और फिर उस देश के लिए आगे बढ़ना बहुत मुश्किल हो जाता है. हमारे देश में लोग सबसे ज्यादा आलोचना सरकार की ही करते हैं. लोगों को सरकार का कोई विभाग अच्छा नहीं लगता, कोई दफ्तर अच्छा नहीं लगता और वो हर समय सरकार से नाराज भी रहते हैं लेकिन फिर भी नौकरी सबको सरकारी ही चाहिए. उत्तर प्रदेश (Uttar Pradesh) में हाल ही में स्कूल टीचर्स की भर्ती के लिए होने वाली परीक्षा का Question Paper Leak हो गया और फिर इस परीक्षा को रद्द करना पड़ा.

भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ी टीचर्स भर्ती की परीक्षा

उत्तर प्रदेश में रविवार को Teacher Eligibility Test की परीक्षा होनी थी जिसके लिए 20 लाख से ज्यादा लोगों ने आवेदन किया था, लेकिन ऐन मौके पर इस परीक्षा को रद्द कर दिया गया क्योंकि परीक्षा आयोजित होने से पहले ही इसका Question Paper Whatsapp पर Viral हो चुका था. जिसके बारे में दावा था कि ये इसी परीक्षा का प्रश्नपत्र है, जब जांच की गई तो ये दावा सही साबित हुआ, इसके फौरन बाद इस परीक्षा को रद्द करने का ऐलान कर दिया गया, हालांकि तब तक हजारों परीक्षा केंद्रों पर लाखों युवा परीक्षा देने के लिए पहुंच चुके थे जिन्हें वापस घर जाने के लिए कह दिया गया.

पेपर लीक करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई

इसके बाद पुलिस ने जांच शुरू की और उत्तर प्रदेश के शामली से तीन लोगों को गिरफ्तार किया. जिनसे पूछताछ करने पर पता चला कि इन्होंने 5 लाख रुपये में Question Paper की 10 कॉपियां खरीदी थीं और फिर इन्हें उन लोगों को 50 से 60 हजार रुपये में बांटा गया जो ये परीक्षा देकर भविष्य में टीचर बनना चाहते थे. इस मामले में उत्तर प्रदेश के अलग-अलग जिलों से अब तक 30 लोगों को गिरफ्तार किया गया है, जिनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून और गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई की जाएगी.

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पेपर लीक करने में सरकारी कर्मचारी भी हो सकते हैं शामिल

पुलिस को शक है कि इस मामले में कुछ सरकारी कर्मचारी भी शामिल हो सकते हैं, जिनकी मदद से प्रश्नपत्र लीक कराया गया था. अब ये परीक्षा अगले एक महीने में आयोजित हो सकती है और इसके लिए परीक्षा देने वालों से दोबारा Registration Fees नहीं ली जाएगी. ये फीस 400 से 600 रुपये के बीच होती है.

Uttar Pradesh Teacher Eligibility Test में वो लोग हिस्सा लेते हैं, जो भविष्य में सरकारी स्कूलों में टीचर बनना चाहते हैं. ये परीक्षा 150 अंको की होती है, जिनमें सामान्य वर्ग के लोगों को 90 और आरक्षित वर्ग के लोगों को कम से कम 82 अंक लाने होते हैं. जो ये परीक्षा पास कर लेता है वो सरकारी स्कूलों में टीचर्स की नौकरी के लिए आवेदन करने के योग्य माना जाता है. यानी ये परीक्षा पास करके सीधे नौकरी नहीं मिलती, बल्कि परीक्षा देने वाला नौकरी का आवेदन करने के लिए योग्य हो जाता है. यानी जब उत्तर प्रदेश में टीचर्स की नौकरियां निकलेगी, तब उसके लिए आवेदन करने वालों की संख्या भी लाखों में होगी.

इसी साल जून में जब उत्तर प्रदेश सरकार ने सरकारी स्कूल में टीचर्स के 15 हजार पद भरने की घोषणा की थी, तब इसके लिए 12 लाख से ज्यादा लोगों ने आवेदन किया था यानी हर एक पद के लिए 134 लोग लाइन में थे. उत्तर प्रदेश में सरकारी स्कूल में पढ़ाने वाले एक शिक्षक की सैलरी 37 हजार रुपये से 45 हजार रुपये के बीच होती है. जबकि भारत में एक आम व्यक्ति औसतन 16 हजार रुपये महीने ही कमा पाता है यानी सरकारी स्कूलों के टीचर्स को जो सैलरी मिलती है, वो इससे दो से तीन गुना ज्यादा है. इसलिए हर साल लाखों लोग कुछ हजार पदों के लिए आवेदन करते हैं और किसी भी कीमत पर सरकारी नौकरी हासिल करने की जिद कुछ लोगों को बेइमानी के रास्ते पर ले जाती है.

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ये लोग लाखों रुपये देकर सरकारी नौकरी पाना चाहते हैं और नकल कराने वाले माफिया पेपर लीक कराकर एक झटके में लाखों रुपये कमाना चाहते हैं, जिनमें कई बार सरकारी कर्मचारी भी इनकी मदद करते हैं. यानी नकल और भ्रष्टाचार हमारे सिस्टम का हिस्सा बन चुका है और इसलिए ये सिलसिला कभी रुकता नहीं है और अक्सर हर बड़ी परीक्षा से पहले पेपर लीक होने की या परीक्षा के दौरान बड़े पैमाने पर नकल की खबर आ जाती है.

इसी साल सितंबर के महीने में राजस्थान में भी REET यानी Rajasthan Eligibility Exam for Teachers की परीक्षा रद्द कर दी गई थी और इसके पीछे की वजह भी नकल ही थी. इस परीक्षा के दौरान कुछ लोग पैरों में ऐसी चप्पल पहनकर परीक्षा दे रहे थे, जिनमें Bluetooth Device और Sim Card लगा था और इसकी मदद से ये लोग नकल कर रहे थे. उत्तर प्रदेश और राजस्थान के ये लाखों युवा स्कूल टीचर बनना चाहते थे लेकिन एक कड़वी सच्चाई ये भी है कि इनमें से बहुत सारे लोग ऐसे हैं, जो पैसे से Question Paper खरीदकर और नकल के माध्यम से टीचर बनना चाहते थे.

अब आप सोचिए जो व्यक्ति नकल और भ्रष्टाचार करके टीचर बना हो, वो अपने छात्रों को क्या सिखाएगा और यही वजह है कि हमारे देश में भ्रष्टाचार और नकल का ये चक्र ऐसे ही चलता रहता है क्योंकि हमारे देश में कानूनी रूप से नकल और भ्रष्टाचार करना अपराध जरूर है लेकिन समाज में इसे आज भी बुरा नहीं माना जाता है. खुद सरकार के आंकड़ों के मुताबिक भारत के सरकारी स्कूलों में पढ़ाने वाले करीब 14 प्रतिशत टीचर्स बच्चों को पढ़ाने के योग्य ही नहीं है. कुल मिलाकर अगर नकल करने वाले या अयोग्य टीचर्स बच्चों को पढ़ाएंगे तो देश कभी आगे नहीं बढ़ पाएगा.

भारत में करीब 47 करोड़ लोग, किसी ना किसी तरह की नौकरी करते हैं लेकिन इनमें से सिर्फ 1 करोड़ 70 लाख यानी साढ़े तीन प्रतिशत लोग ही सरकारी नौकरियों में है. हालांकि सरकारी नौकरी हासिल करने का सपना देखने वालों की संख्या इससे कहीं ज्यादा है. उदाहरण के लिए वर्ष 2019 में जब भारतीय रेलवे में 90 हजार पद निकले थे, तब इसके लिए ढाई करोड़ से ज्यादा लोगों ने Apply किया था. ये विडंबना ही है कि हमारे देश में लोग अक्सर सरकार की आलोचना करते हैं, उसे नाकाम बताते हैं और हमेशा सरकार से नाराज रहते हैं लेकिन फिर यही लोग नौकरी भी सरकारी ही करना चाहते हैं.

भारत में बहुत सारे लोग परीक्षा देकर, पैसे देकर या किसी नेता, सांसद या विधायक से पहचान के दम पर किसी भी तरह से सरकारी नौकरी पाना चाहते हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि सरकारी नौकरियों में काम के घंटे तय होते हैं और ज्यादातर सरकारी कर्मचारियों को तय घंटों से ज्यादा काम नहीं करना पड़ता. हालांकि इसमें कुछ अपवाद भी हैं.

दूसरी वजह ये है कि सरकारी नौकरी, प्राइवेट नौकरी के मुकाबले ज्यादा सुरक्षित होती है. सरकारी नौकरी से निकाले जाने की संभावनाएं बहुत कम होती हैं जबकि प्राइवेट सेक्टर में आपकी नौकरी सिर्फ तब तक चलती है जब तक आप ईमानदारी से अपना काम करते हैं.

सरकारी नौकरियों में तनख्वाह भी अच्छी होती है और दूसरे भत्ते भी मिलते हैं. समय पर छुट्टियां भी मिल जाती है, घर खरीदने के लिए आसानी से लोन मिल जाता है और बीमा और पेंशन जैसी सुविधाएं भी मिलती हैं. इसके अलावा निश्चित समय पर आपकी सैलरी बढ़ जाती है, चाहे काम में आपका प्रदर्शन औसत ही क्यों ना हो जबकि प्राइवेट सेक्टर में लोगों को सैलरी में Increament के लिए जी तोड़ मेहनत करनी पड़ती है.

सरकारी नौकरियों की चाहत के पीछे एक बड़ी वजह रिश्वत भी है. सरकारी नौकरी में अगर पैसा कम भी हो तब भी कई कर्मचारी रिश्वत लेकर अच्छा खासा पैसा कमा लेते हैं. वर्ष 2019 में हुए एक सर्वे में हर दो में से एक भारतीय ने माना था कि उन्होंने अपना काम करवाने के लिए सरकारी कर्मचारियों को रिश्वत दी है. यानी सरकारी नौकरी में ऊपर की कमाई की संभावना बनी रहती है. महान साहित्यकार मुंशी प्रेम चंद ने अपने मशहूर उपन्यास नकम का दारोगा में लिखा था. मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चांद है, जो एक दिन दिखाई देता हैं और घटते-घटते लुप्त हो जाता है. ऊपरी आय बहता हुआ स्रोत हैं, जिससे सदैव प्यास बुझती है.

और आज भी भारत के लोगों को ऊपरी आय की यही प्यास सरकारी नौकरियों की तरफ खींचती है. हालांकि हम यहां पर ये बिल्कुल नहीं कह रहे कि हर सरकारी कर्मचारी ऐसा ही करता है, या हर सरकारी कर्मचारी बेइमान है. इस देश के हजारों लाखों सरकारी कर्मचारी भी प्राइवेट सेक्टर के लोगों की तरह दिन रात मेहनत करते हैं और ईमानदारी से काम करते हैं. लेकिन आज भी देश के करोड़ों युवाओं को सरकारी नौकरी इसलिए लुभाती है क्योंकि ये कहीं ज्यादा सुरक्षित, ज्यादा आय वाली है, इसमें मेहनत कम करनी पड़ती है और लाभ बहुत ज्यादा होता है.

भारत में सरकारी नौकरियों का आकर्षण कितना ज्यादा है इसे आप गुजरात के बनासकांठा की घटना से समझिए. जहां परसो यानी 27 नवंबर को ग्राम रक्षक दल के 600 पदों पर भर्ती की प्रक्रिया चल रही थी, जिसके लिए 6 हजार से ज्यादा लोग पहुंच गए. इसके बाद इस भीड़ को नियंत्रित करना पुलिस के लिए भी मुश्किल हो गया.

ग्राम रक्षक दल पुलिस विभाग के अंतर्गत आता हैं और इसमें काम करने वाले लोगों पर गांवों में कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी होती है. इसमें शामिल लोग अपराध रोकने में पुलिस की मदद करते हैं, ये एक सरकारी नौकरी है जिसमें ग्राम रक्षक दल के जवानों को हर रोज 230 रुपये यानी महीने के करीब 7 हजार रुपये मिलते हैं. यानी ये कोई बहुत बड़ा सरकारी पद नहीं है, फिर भी इस देश में बेरोजगारी की स्थिति ऐसी है कि प्रतिदिन 200 से 250 रुपये देने वाली सरकारी नौकरी को हासिल करने के लिए भी हजारों लोग आवेदन कर देते हैं.

ये सब देखकर आपको लग सकता है कि सिर्फ भारत में ही सरकारी नौकरियों का इतना आकर्षण है लेकिन सच ये है कि Norway जैसे देश में प्रति एक हजार लोगों में से 159 लोग सरकारी नौकरियों में हैं. स्वीडन में ये आंकड़ा 138, फ्रांस में 114 और ब्राजील में 111 है, अमेरिका में हर एक हजार लोगों में से 77 लोग सरकारी नौकरियों में है. जबकि भारत में प्रति एक हजार लोगों में सिर्फ 16 लोग सरकारी नौकरी करते हैं.

लेकिन अमेरिका जैसे देश में सरकारी नौकरी करना आसान नहीं है. सरकारी नौकरी करने वालों को वहां भी कई तरह के फायदे और अच्छी तनख्वाह मिलती है. लेकिन वहां प्राइवेट सेक्टर की तरह सरकारी कर्मचारियों के प्रदर्शन पर नजर रखी जाती है और खराब प्रदर्शन या भ्रष्टाचार करने वाले लोगों को फौरन नौकरी से हटा दिया जाता है और उनका Demotion भी कर दिया जाता है यानी उनका पद घटा दिया जाता है. उदाहरण के लिए अगर अमेरिका में सरकार को बजट बनाने में देर हो जाए तो कई बार इससे संबंधित विभाग में काम कर रहे लोगों को नौकरियों से निकाल दिया जाता है और ये खबर हर बार वहां के अखबारों की सुर्खियां बन जाती है.

यानी अमेरिका जैसे देशों में प्राइवेट और सरकारी सेक्टर के लोगों के साथ अलग-अलग व्यवहार नहीं होता जबकि भारत में सरकारी नौकरी जीवन भर सुरक्षा की गारंटी बन जाती है. भारत में सरकारी नौकरी में कर्मचारियों को तमाम सुख सुविधाएं मिलती हैं लेकिन इसके बावजूद भारत में सरकारी कंपनियों की हालत अच्छी नहीं है.

वर्ष 2019 में Comptroller and Auditor General of India यानी CAG की एक रिपोर्ट आई थी, जिसके मुताबिक उस साल 31 मार्च तक भारत की 189 सरकारी कंपनियों को 1 लाख 40 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का घाटा हुआ था, जबकि देश की बड़ी सरकारी कंपनियों पर 30 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज था.

Air India इसका सबसे बड़ा और ताजा उदाहरण है, जिसे इसी साल अक्टूबर में TATA समूह ने सरकार से 18 हजार करोड़ रुपये में खरीद लिया है. ये भारत की सरकारी Air Lines थी जिसमें 10 हजार से ज्यादा कर्मचारी काम करते थे लेकिन इस कंपनी को वर्ष 2020 और 2021 में 80 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था. जबकि प्राइवेट Air Lines इसके मुकाबले कहीं ज्यादा बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं.

इसी तरह सरकारी Telecom कंपनी BSNL को पिछले साल साढ़े 15 हजार करोड़ रुपये और इस साल साढ़े सात हजार करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है. जबकि MTNL का पिछले साल का नुकसान 3800 करोड़ रुपये और इस साल का नुकसान ढाई हजार करोड़ रुपये है. ये हाल तब है जब BSNL में डेढ़ लाख और MTNL में 18 हजार कर्मचारी काम करते हैं.

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