उत्तराखंड: बर्फीले इलाकों में कैसे रहते है ग्रामीण, जानेंगे तो चौंक जाएंगे आप
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उत्तराखंड: बर्फीले इलाकों में कैसे रहते है ग्रामीण, जानेंगे तो चौंक जाएंगे आप

सालों से उच्च हिमालयी क्षेत्र के ग्रामीण भारी बर्फबारी में भी बिना किसी मुश्किल के रहते है. ​

स्थानीय लोग पहाड़ी दालें, आलू,सब्जियों को सुखा देते हैं. कई गांवों के लोग मीट के टुकड़ों को भी सूखा कर सर्दियों में खाते हैं.

देहरादून: उत्तराखंड के कई गांव बर्फ में ढक चुके हैं. उत्तरकाशी, देहरादून, चमोली, रुदप्रयाग, बागेश्वर, टिहरी और पिथौरागढ़ के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में भारी बर्फबारी से जनजीवन अस्त व्यस्त है. करीब 15 सालों के बाद व्हाइट अटैक से सब कुछ जम गया है. जब कई फीट बर्फ जमने के साथ हाड़ कंपाने वाली सर्दी हो तो आप खुद सोचिए कि ग्रामीण कैसे जीते होंगे. भले ही आज आवागमन के लिए सड़कें हों, बिजली और संचार की व्यवस्था हो लेकिन जब कुदरत का व्हाइट अटैक शुरु होता है तो सब कुछ ठप हो जाता है. क्या आप जानते हैं कि बर्फ में पहाड़ों के लोग कैसे चलते होंगे और कौन से कपड़े पहनते होंगे.

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बर्फीली दुनिया में रह रहे लोगों का जीवन भी बन जाता है ऐसे आसान
सालों से उच्च हिमालयी क्षेत्र के ग्रामीण भारी बर्फबारी में भी बिना किसी मुश्किल के रहते है. क्योंकि उनके पारम्पिक परिधान ही ऐसे है. पहाड़ों में भेड और बकरी पालन उनका मुख्य व्यवसाय है और उन्हीं के ऊन से बने कपड़े पहनते हैं. देहरादून के चकराता, उत्तरकाशी के मोरी, पुरोला, यमुनोत्री घाटी और गंगोत्री घाटी, टिहरी के घनसाली, रुद्रप्रयाग के उच्च हिमालयी क्षेत्र, केदारघाटी, मदमहेश्वर घाटी चमोली गढ़वाल के नीति माणा, ऊर्गम, घाट, देवाल जैसे दुर्गम क्षेत्र और पिथौरागढ के मुनस्यारी और धारचूला में इन्हीं भेड़ और बकरियों के ऊन से बने कपड़े बनाए जाते हैं. 

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चकराता से आगे के गांवों में स्थानीय लोग पुरुषों के जो वस्त्र तैयार करते है उन्हें ऊपरी हिस्से को चूड़ा और नीचे के पायजामा को जंगेल कहा जाता है जबकि महिलाएं ठालकी पहनती हैं. बर्फ में पाला पड़ने के बाद काफी फिसलन होती है लिहाजा ऊन से ही जूते बनाए जाते है जिन्हें खुरसा कहा जाता है जिनसे बर्फ में फिसलन नही होती. लोहरी गांव की दर्शनी राणा कहती है कि जब बर्फ ज्यादा होती है तो वे इन्हीं कपडों को पहनते है जिससे ना तो ठंड लगती है और ही बर्फबारी में ये गीले होते है.

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मकान भी ऐसे है जो सर्दियों में आपको रखेंगे गर्म
इन इलाकों में घर भी लकड़ी के 3 से 4 मंजिला बनाये जाते हैं, जो ना सिर्फ भूकंप रोधी होते है बल्कि सर्दियों में गर्म और गर्मियों में ठंडे होते है. लोखंडी निवासी कुंवर सिंह बताते है कि उनका मकान करीब दो सौ साल पुराना है जो मिट्टी पत्थर और देवदार की लकडियों से बनाया गया है.

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भवनों में लकडियों से खाना भी बनाया जाता है और कमरों में आग भी सेकी जाती है लिहाजा हर कमरों में 4 रोशनदान रहते है जिससे धूप और ताजी हवा प्रवेश करती है और दो रोशनदान छत पर रहते है जिससे धुंआ बाहर चला जाता है. 

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जब खेतों में बर्फ तो फिर सब्जियां कैसे उगाई जाएंगी
स्थानीय लोग पहाड़ी दालें, आलू,सब्जियों को सुखा देते हैं. कई गांवों के लोग मीट के टुकड़ों को भी सूखा कर सर्दियों में खाते हैं. कुछ सब्जियां भी बर्फ में दबी होती है लेकिन खराब नही होती. हर परिवार अपने मकानों में अनाज के लिए कोठार बनाते है और उन्ही में राशन संभाल कर रखते है. कृषि और बागवानी के विशेषज्ञ डॉ. महेन्द्र कुंवर बताते है कि जो बर्फीले इलाके के ग्रामीण पारम्परिक ढंग से रहते है वे सर्दियों की तैयारी पहले ही कर लेते है और इनके कोठार में अनाज सुरक्षित रहता है.

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