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न्यू इंडिया की सफलता के लिए 'माय लार्ड' का सामंती सिस्टम सुधरे

राजस्थान हाईकोर्ट के सभी जजों ने मिलकर फैसला लेते हुए वकीलों से कहा है कि वे कोर्ट में जजों को 'माय लार्ड' या 'योर लॉर्डशिप' कहकर न बुलाएं. गुलामी की इस निशानी को खत्म करने के लिए वकीलों की संस्था बार काउसिंल ने बहुत पहले 2006 में सर्कुलर जारी किया था. 

न्यू इंडिया की सफलता के लिए 'माय लार्ड' का सामंती सिस्टम सुधरे

राजस्थान हाईकोर्ट के सभी जजों ने मिलकर फैसला लेते हुए वकीलों से कहा है कि वे कोर्ट में जजों को 'माय लार्ड' या 'योर लॉर्डशिप' कहकर न बुलाएं. गुलामी की इस निशानी को खत्म करने के लिए वकीलों की संस्था बार काउसिंल ने बहुत पहले 2006 में सर्कुलर जारी किया था. सांकेतिक परिवर्तन की बजाए ठोस कार्यवाही के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज रंगनाथ पांडे ने रिटायरमेंट से पहले पीएम मोदी को पत्र लिखकर माय लार्ड जजों के बदहाल सिस्टम को ठीक करने की मांग की है. केंद्र सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण में 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के लक्ष्य को हासिल करने के लिए 8 फीसदी विकास दर की बात कही गई है, जिसके लिए न्यायिक सुधार और लंबित मामलों का जल्द निपटारा जरूरी है. सरकार और न्यायपालिका इन कदमों से न्यायिक सुधारों की शुरुआत कर सकती है:

जजों की नियुक्ति प्रणाली में सुधार
मोदी सरकार ने पिछले कार्यकाल में जजों की नियुक्ति प्रणाली के लिए न्यायिक आयोग बनाने के लिए कानून बनाया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में रद्द कर दिया. सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों ने नियुक्ति के लिए बने कॉलेजियम सिस्टम को अपारदर्शी और अन्यायपूर्ण बताया था, जिसमें अभी तक सुधार नहीं हुआ. जस्टिस पांडेय की चिठ्ठी के बाद इस पर सरकार और न्यायपालिका को तुरंत कार्यवाही करनी चाहिए.

वकील के सनसनीखेज आरोप और जस्टिस पटनायक समिति
सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजों द्वारा पिछले साल की प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद बहुत सनसनी हुई थी. इस साल एक वकील उत्सव बेंस के हलफनामे ने, पूरी न्यायिक व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज पटनायक द्वारा आरोपों की जांच हो रही है. सरकारी आयोगों की तरह यह जांच रिपोर्ट भी अगर ठण्डे बस्ते में चली गई तो न्यायपालिका पर आम लोगों का भरोसा और कम हो जाएगा.

हाईकोर्ट के जज शुक्ला की बर्खास्तगी और महाभियोग का झंझट
तीन जजों की कमेटी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज शुक्ला के ऊपर लगे भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों को सही पाया है. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने जस्टिस शुक्ला से वीआरएस लेने का अनुरोध किया था. इसकी बजाए जस्टिस शुक्ला ने चार महीने पहले चिठ्ठी लिखकर न्यायिक कार्य की बहाली की मांग कर डाली. अब चीफ जस्टिस गोगोई ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर शुक्ला को हटाने की मांग की है, पर मामला जस का तस है. हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज संवैधानिक कवच की आड़ में अजर और अमर हो जाते हैं, क्योंकि उन्हें महाभियोग से हटाना लगभग नामुमकिन होता है.

अदालती कार्यवाही के सीधे प्रसारण में बेवजह विलंब
लोकसभा और राज्यसभा तथा राज्यों में विधानसभा की कार्यवाही का सीधा प्रसारण होता है. सेंटर फॉर एकाउंटेबिलिटी एण्ड सिस्टमिक चेंज (सीएएससी) की याचिका पर पिछले वर्ष सुप्रीम कोर्ट ने कार्यवाही के सीधे प्रसारण के लिए सैद्धांतिक मंजूरी दे दी थी. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के अनुसार कार्यवाही के सीधे प्रसारण से अदालतों में सूर्य की रोशनी की तरह ताजगी आएगी, जो अनेक न्यायिक बीमारियों को दूर कर सकती है. इस जरुरी मामले पर फाइल अटकाने की बजाय, केंद्र सरकार द्वारा जल्द कार्यवाही की जाए तो देश में वास्तविक न्यायिक क्रांति की शुरुआत हो सकती है.

सुप्रीम कोर्ट में प्रक्रियाओं के लिए लिखित नियम बने
हर नए चीफ जस्टिस के बाद, सुप्रीम कोर्ट का सिस्टम बदल जाता है. पुराने चीफ जस्टिस ने मामलों की मेन्सनिंग के लिए सीनियर एडवोकेट पर प्रतिबन्ध लगा दिया था. वर्तमान चीफ जस्टिस ने उस प्रतिबंध को खत्म करते हुए एक सीनियर एडवोकेट के बोले बगैर ही उनकी मेन्सनिंग को स्वीकार कर लिया. चीफ जस्टिस के अनुसार सीनियर एडवोकेट ने पिछले साढ़े सात साल में कभी भी मेन्सनिंग नहीं की, इसलिए उनकी अर्जी बगैर सुने ही स्वीकार हो गई. पीआईएल के मामले सिर्फ चीफ जस्टिस की कोर्ट द्वारा सुने जाते थे. आंतरिक दवाबों के बाद अब पांच वरिष्ठ जजों को पीआईएल मैटर सुनने का अधिकार दिया गया है. सुप्रीम कोर्ट के जजों के पास न्यायिक निर्णय के लिए अनेक विशेषाधिकार वैसे भी होते हैं. सामंती व्यवस्था से मुक्त होने के लिए सभी प्रशासनिक और अर्द्धन्यायिक प्रक्रियाओं को लिखित रुप देना जरूरी हो गया है, जिससे मनमर्जियां रोकी जा सकें.

न्यायिक व्यवस्था में अयोग्यता और भ्रष्टाचार
जस्टिस पांडेय ने न्यायिक व्यवस्था को ठीक करने के लिए वंशवाद, जातिवाद और परिवारवाद के वायरस को खत्म करने की मांग की है. उनके अनुसार जजों की पैरवी और भाई-भतीजावाद के हावी होने से वकीलों में भी अयोग्यता बढ़ रही है. क्रिकेट समेत देश की अनेक क्षेत्रों में भ्रष्टाचार पर लगाम के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व जजों को नियुक्त किया है. दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट के भीतर भ्रष्टाचार को रोकने के लिए अब सीबीआई अधिकारियों की नियुक्ति का प्रस्ताव सामने आया है. देश की राजधानी में स्थित सुप्रीम कोर्ट में अगर हालात इतने खराब हैं तो फिर निचली अदालतों का तो भगवान ही मालिक होगा.

सुधारों से भागने के लिए जजों द्वारा लोकप्रियता वाले मामलों की सुनवाई का चलन बढ़ गया है, जो न्यायपालिका के लिए गम्भीर खतरा है. न्यू इंडिया के सपने को साकार करने के लिए मोदी सरकार को अब ठोस न्यायिक सुधारों की पहल करनी ही चाहिए.

(विराग गुप्ता सुप्रीम कोर्ट के वकील और Taxing Internet Giants: American Comapnies & Data Protection in India पुस्तक के लेखक हैं.)