नेता- किसानों के हमदर्द या दुश्मन?

कई बड़े नेताओं से बातचीत करने और किसानों के मुद्दों पर वर्षों से लिखने-छापने के अनुभव रहे हैं. दावे, समर्थन, विरोध के बीच यह भी मुद्दा है कि किसानों के हितों की रक्षा करने वाला असली नेता कौन है?

नेता- किसानों के हमदर्द या दुश्मन?

चौधरी चरण सिंह ने 1978 में एक अनौपचारिक बातचीत के दौरान मुझसे कहा- 'तुम कोट-टाई वाले पत्रकार खेती, किसानी और किसानों के बारे में कुछ नहीं जानते और उनकी समस्याएं नहीं समझ सकते'. उन दिनों वे उप प्रधानमंत्री थे. तब मैंने उनसे विनम्रता से कहा, 'चौधरी साहब, आप किसानों के असली और सबसे बड़े नेता हैं, आपको यह देख-जानकर खुश होना चाहिए कि खेती-किसानी वाले आर्य समाजी दादाजी का पोता कोट-पैंट पहनकर आपके साथ बैठकर बात कर रहा है. बचपन में मैंने खेत, गन्ने, संतरे, गेहूं, आम की फसल और बैलगाड़ी में बैठकर दूर मंडी तक जाने का आनंद भी लिया है. उस समय शिक्षक पिता की जिम्मेदारियों के कुछ कष्ट भी देखे हैं. इसलिए आप किसानों के बारे में जो कुछ कहेंगे, मैं उसे पूरा साप्ताहिक हिंदुस्तान में लिखूंगा-छापूंगा. इस तरह चौधरी साहब, देवीलाल जैसे कई नेताओं से बातचीत करने और किसानों के मुद्दों पर वर्षों से लिखने-छापने के अनुभव रहे हैं. इसलिए इन दिनों किसानों की मेहनत से उपजाई फसल को अधिकाधिक कीमत मिलने और देश भर में कहीं भी किसी को भी बेच सकने के लिए संसद में नया कानूनी प्रावधान होने पर हंगामे को देख-सुनकर थोड़ी तकलीफ सी हो रही है. दावे, समर्थन, विरोध के बीच यह भी मुद्दा है कि किसानों के हितों की रक्षा करने वाला असली नेता कौन है?

खेती-किसानी पर विचार-विमर्श
पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र सहित देश के हर भाग में खेती-बाड़ी, विभिन्न फसल और किसानों की चुनौतियां तथा सफलताएं भी हैं. 1973-74 में भारतीय खाद्य निगम द्वारा अनाज के भंडारण के लिए हरियाणा से शुरू किए गए गोदामों के प्रयोग से लेकर अब तक सही भंडारण, अनाज के सही दाम, मंडियों की सुविधा अथवा मंडियों में तोलने में गड़बड़ी, किसानों को भुगतान में हेरा-फेरी और देरी तथा मंडियों से नेताओं की राजनीति के हथकंडों को हमारी तरह शायद लाखों लोग जानते रहे हैं. इसीलिए पिछले कई वर्षों से केवल भारतीय जनता पार्टी ही नहीं, कांग्रेस, समाजवादी और जनता दल के नाम से प्रभावशाली राजनीतिक संगठन अपने घोषणा पत्रों में किसानों को बिचौलियों से मुक्ति, अधिक दाम, फसल बीमा और हर संभव सहयोग के वायदे करते रहे हैं. संसद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके सहयोगी मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर भी विभिन्न अवसरों पर इन सभी मुद्दों की चर्चा करते रहे हैं. फिर संसद में विधयेक लाने के लिए विभिन्न दलों के नेताओं की संयुक्त समिति में भी उस पर विस्तार से विचार-विमर्श हुआ है. इसके बावजूद श्रेय लेने-देने या विरोध के नाम पर ऐसा हंगामा हो रहा है, मानो किसानों पर विदेशी हमला हो गया है.

समय के साथ हर क्षेत्र में सुधार जरूरी
इसमें कोई शक नहीं है कि स्वास्थ्य का मुद्दा हो या आर्थिक अथवा खेती और किसानों का, समय के साथ हर क्षेत्र में सुधार करने होते हैं. इसलिए मोदी सरकार द्वारा किसानों की फसल से उपजे अनाज की खुली बिक्री-खरीदी, न्यूनतम अथवा अधिकतम मूल्यों के प्रावधान के लिए पहले अध्यादेश और अब संसद से स्वीकृति के बाद आने वाले कुछ महीनों और वर्षों में भी कुछ सुधारों की आवश्यकता हो सकती है. पंजाब-हरियाणा की राजनीति और बड़ी संख्या में बिचौलियों के घर बैठे चलने वाले धंधे पर जरूर असर होने वाला है, लेकिन अधिकांश राज्यों के किसानों को अन्तोगत्वा बहुत बड़ा लाभ होने वाला है. हां, अच्छी बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने स्पष्ट घोषणा कर दी है कि सरकार द्वारा न्यूनतम मूल्यों पर निरंतर खरीद होती रहेगी. खाद्य निगम गेहूं और धान तथा नेफेड, दलहन और तिलहन की खरीदी करते रहेंगे. किसान केवल सरकारों पर ही निर्भर क्यों रहें? वे अपना अनाज लेकर अपने इलाके की मंडी की मेहरबानी और लाइन में लगकर क्यों खड़े रहें? वे अपनी फसल देश के किसी भी हिस्से में पहुंचाकर मनचाहा दाम क्यों न लें? इस सुविधा पर मुझे वर्षों पहले मेरे पिताजी द्वारा दिल्ली आते समय उज्जैन से मालवी गेहूं की बोरी लाने पर रेलगाड़ी में कभी रेल कर्मचारी या रेलवे पुलिस के जवान द्वारा बोरी में कितने किलो गेहूं और कहां-क्यों ले जाने के सवालों की याद आ गई. उन दिनों यह गेहूं दिल्ली तक मुश्किल से आता था. मतलब बेचना तो दूर रहा, हम अपने घर-गांव का अनाज लाने में भी परेशान हो जाते थे.

समाज के हर वर्ग को निभानी होगी जिम्मेदारी
विरोध में हमारे नेता यह चिंता जता रहे हैं कि किसानों से फसल आने के पहले ही खरीदी और कीमत के साथ अनुबंध करने वाले बड़े व्यापारी अथवा कंपनियां ठग लेंगी. समभाव है कि शुरू में अधिक कीमत दें और बाद में कीमत कम देने लगें. लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि अब किसान और दूर-दराज के भोले-भाले परिवार संचार माध्यमों से बहुत समझदार हो गए हैं. वे बैंक, फसल बीमा, खाद, बीज और दुनिया भर से भारत आ रहे तिलहन, प्याज, सब्जी-फल का हिसाब-किताब भी देख-समझ रहे हैं. बिना रासायनिक खाद डाले ऑर्गेनिक खेती का लाभ भी उन्हें कुछ-कुछ समझ में आने लगा है और भंडारण-बिक्री की व्यवस्था होने पर वे अधिक समझ के साथ लाभ उठाने लगेंगे. फिर दलालों, बिचौलियों और ठगों से बचाने के लिए सत्तारूढ़ नेता ही क्यों, प्रतिपक्ष के नेता, कार्यकर्ता, पुलिस, अदालत, मीडिया क्या सहयोग नहीं कर सकते? रक्षा सौदों में दलाली रोकने में क्या सरकारों के साथ या विरोध करके सेना के ईमानदार अधिकारियों, अदालतों के न्यायाधीशों और मीडियाकर्मियों ने भी तो कुछ भूमिका निभाकर योगदान दिया है. अन्नदाताओं के सम्मान और हितों की रक्षा की जिम्मेदारी समाज के हर वर्ग की है.
जहां तक नेता की बात है- डॉ. मनमोहन सिंह सहित कई नेता फोटो खिंचवाने और विज्ञापनों के लिए ट्रैक्टर पर बैठते रहे हैं. फिल्मों में भी ट्रैक्टर, बैलगाड़ी, खेत-खलिहान के लिए नायक, महा नायक और नायिका, अच्छे दृश्य फिल्मा लेते हैं. लेकिन उन्हें जमीनी समस्याओं का अंदाजा नहीं होता है.

किसानों की आत्मनिर्भरता जरूरी
मनमोहन सिंह ने वित्त मंत्री के रूप में 1992 में बजट पेश करने के अगले दिन हिंदी अखबार को दिए इंटरव्यू के दौरान मेरे एक सवाल के जवाब में कहा था- 'नई आर्थिक नीतियों के बाद हमारे देश के किसानों या व्यापारियों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों से मुकाबला करना होगा.' लेकिन उनके या कई प्रधानमंत्रियों के सत्ता काल में किसानों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मुकाबलों के लायक बनाने के प्रयास नहीं हुए. यहां तक कि उनके सत्ता काल में विदेशी हमारे पानी को कौड़ियों के दाम या मुफ्त लेकर अरबों रुपयों की कमाई करते रहे हैं. बिहार-झारखंड की राजनीति करने वाले यशवंत सिन्हा या तमिलनाडु के चिदंबरम ने वित्त मंत्री रहते कौन से लाभ दिए? किसानों के नाम पर राजनीति करने वाले एक बड़े नेता अब दुनिया में नहीं रहे, इसलिए नाम नहीं लिख रहा, लेकिन उन्होंने न केवल कृषि उपकरणों , ट्रैक्टर इत्यादि की सरकारी खरीदी के अलावा सैंकड़ों एकड़ जमीन पूरे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में कब्जाई, बेनामी भी रखी और बेचारे असली खेती करने वालों का शोषण भी किया. चौधरी चरण सिंह की पारिवारिक रियासत वाले अजीत सिंह या गरीब किसानों को गाय-बैल बांटने के नाम पर करोड़ों का चारा घोटाला करने वाले लालू प्रसाद यादव आखिरकार उन्हीं किसानों के कोपभाजन के कारण सत्ता से बाहर हैं. इसे दुर्भाग्य कहा जाएगा कि अल्पसंख्यकों, किसानों, मजदूरों के असली नेता कहे जाने वाले समाजसेवी व्यक्ति देश में नहीं दिखाई दे रहे हैं. केवल भाषण, टीवी चैनल और फेसबुक वाले पांच सितारा शैली के लोग किसानों के नाम पर विरोध कर रहे हैं. यदि सर्व मान्य नेता होते तो चौधरी चरण सिंह या टिकैत की तरह समर्थन या विरोध में लाखों की भीड़ जुटा देते. बहरहाल अब आशा करनी चाहिए कि पश्चिमी देशों की तरह किसान अपने उत्पादन, मेहनत और सम्मान के साथ आत्म निर्भर बनेंगे. अनावश्यक आंदोलनों में अपना समय क्यों बर्बाद करें!

(लेखक पद्मश्री सम्मानित वरिष्ठ पत्रकार एवं एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष हैं)
(इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं)