प्रेम और प्रेम दिवस!

आज के लोग कहते पाए जाते हैं कि तबके प्रेमियों में साहस नहीं होता था. बेशक Kiss और Hug का साहस नहीं होता था क्योंकि प्रेमिका के लिए दिल में सम्मान होता था.

प्रेम और प्रेम दिवस!

प्रेम दिवस हर वर्ष आता है और बड़े उत्साह तथा उपहारों के साथ मनाया जाता है या यह कहूं कि सेलीब्रेट किया जाता है तो ज्‍यादा मौजूं लगेगा. प्यार सेलीब्रेट करने के लिए ही प्यार है? यह तो हमने महानगरों में ही सुना जो अब नगरों और कस्बों तक पहुंच रहा है. यह भी यहीं देखा कि love ऐसी शय है जो Kiss और Hug के बिना बेमानी है. हमने अपना दिल टटोला और खुद से ही सवाल किया कि वह क्या था जो आंखों के रास्ते आया था? नजरों से नजरें मिल जाने पर वह क्या कोई जादू था जो दिल तक असर करता हुआ मुकम्मल पैठ बना बैठा!

क्या मैंने उस नशीली नजरों वाले को आज की Love भाषा में Touch भी किया था? नहीं, इतने पास ही नहीं आए हम दोनों. प्यार में ये दूरियां क्या हमारी मजबूरियां रहीं? नहीं, तो फिर क्या था कि kiss और Hug के बानक नहीं बने? असल बात यह है कि बानक बनाए ही नहीं. आंखों से आंखों तक की आवाजाही कितनी दिलफरेबी होती है, तुम क्या जानो kiss और Hug मास्टर लोगों. देखने से ही जो आ जाती है रौनक मुंह पर, प्यार के बीमार का हाल अच्छे से अच्छा होने लगता है.

आज के लोग कहते पाए जाते हैं कि तबके प्रेमियों में साहस नहीं होता था. बेशक Kiss और Hug का साहस नहीं होता था क्योंकि प्रेमिका के लिए दिल में सम्मान होता था. और यह अखण्ड विश्वास भी होता था कि प्रेम सेक्स के लिए नहीं होता, सेक्स के लिए विवाह होता है. हो सकता है कि यह धारणा प्रेमिका को उस स्थिति से बचाने के लिए रही हो, जिसमें लड़की गर्भवती हो सकती है. हां, आज गर्भ निरोधकों ने लड़की को ऐसे अनचाहे हालातों से बचने के उपाय पैदा कर दिए हैं और दैहिक संसर्ग की सुविधा दे दी है. इन दिनों प्रेम के नाम पर सेक्स खूब फलफूल रहा है.

आप कहेंगे मैं प्रेम में सेक्स की एंट्री के निषेध पर क्यों जोर दे रही हूं? सेक्स के बिना प्रेम अधूरा है. बहुत मुमकिन है मैं गलत हूं लेकिन एक बड़ा मामूली सा प्रश्न मन में बार बार उठता है कि जब आप देखादेखी के जादुई माहौल में होते हैं, एक झलक पाने के लिए दीवानावार घूमते फिरते हैं. आपकी प्रेमिका या आपका प्रेमी आंखों से ओझल रहकर भी आपके वजूद का हिस्सा बन जाता है. क्या सेक्स से मिली तृप्ति के बाद भी उस प्रियतमा या प्रेमी के लिये आंखों की भाषा वही रहती है जो सेक्स के पहले थी? नहीं, वह कशिश वैसी नहीं रहती क्योंकि फिर वह मानसिक स्तर पर मोहब्बत नहीं, शारीरिक आनंद के लिए जरूरत का रूप हो जाती है.

हमने देखा है मोहब्बत के जितने भी अफसाने हैं वे सब मोहब्बत पर ही कुर्बान होने के हैं न कि सेक्स के सुख को भोगने के लिए. लैला मजनू, सोहनी महिवाल की दास्तानें इश्‍क के लिए जद्दोजहद करती हैं. राधा और कृष्ण जो हमारे समाज में प्रेम के इष्ट हैं उनके बीच सेक्स के कोई प्रसंग नहीं. मैं यह नहीं कहती कि आज कल हमारे तथाकथित अंग्रेजी दां समाज में जो आयातित कल्चर चलने लगी है और इस कल्चर ने समाज को अत्याधुनिक रूप दिया है जिसे हमारे आगे बढ़ने की दौड़ का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है, इससे मुझे कोई एतराज है. लेकिन प्रेम, संवेदना और करुणा जैसी हमारी नैसर्गिक प्रवृत्तियों का मनुष्य से मनुष्य के प्रति जो रिश्ता होता है और उसका रास्ता भी ऐसा स्थूल नहीं होता.

प्रेम का भी कोई एक दिवस नहीं होता क्योंकि प्यार कोई एक दिन ही करता है क्या? सेक्स जरूर एक ही दिन कर लिया जा सकता है. मोहब्बत में जिन्होंने सारी उम्र गुजारी उनके जन्मदिवस प्रेमदिवस हुआ करते हैं. जो बिछोह में रहे और मिलन के लिए तड़पते रहे, उनकी जिंदगी प्यार के मौसमों में तब्दील हो जाती है. ऐसे लोगों का दर्शन, ऐसे लोगों की संगत इबादत से कम नहीं. ये वो प्रेमी हैं जो प्रेमिका से बिछोह को भी मोहब्बत ही मानते हैं. ये वे Love boy या Love men नहीं जो अपने egoism को प्रेम मानते हैं और असफल होने पर प्रेमिका पर तेजाबी हमला कर देते हैं या कत्‍ल कर डालते हैं.

ऐसा अभी चला है, मैं यह भी नहीं कहती क्योंकि बहुत पहले एक उपन्यास हमारे सामने आया जिसका नाम है- देवदास. देवदास ने भी अपनी प्रेमिका पारो को न पाने की स्थिति में उसके माथे पर डंडे से इतना कठोर प्रहार किया था कि सारी जिंदगी के लिए वह देवदास का दिया ऐसा घाव बन गया जो जिन्दगी भर उसके माथे का दाग बना रहा. क्या आप इसे प्रेम मानेंगे? हम स्त्रियां तो हरगिज मानने वाली नहीं.

प्रेम अधिकार पूर्वक लेने का नाम नहीं है, यह तो त्याग की वह जगह है जहां हमें शारीरिक मनोरंजन नहीं, अपनी आत्मा का निर्माण करना है. आज भी सोचती हूं कि वे प्यार करने वाले किस मिट्टी के बने थे जिन्होंने प्रेमिकाओं पर शादी का दबाव नहीं डाला या वे लड़कियां मोहब्बत को इबादत ही मानती रहीं जो विवाह की विदा के समय अपने प्रेम के तिल चावलों को चादर के छोर में बांध ले जाती हैं और ताउम्र संभालकर रखती हैं. तो ये होते हैं प्रेमदिवस, हमारे भारतीय प्रेम दिवस.